अवागढ़ रियासत एक परिचय- राष्ट्रवादी विचारधारा के अनुयायी राजा  सूरज पाल सिंह आवागढ का जीवन परिचय।

Jun 10, 2024 - 17:53
Jun 10, 2024 - 18:40
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अवागढ़ रियासत एक परिचय- राष्ट्रवादी विचारधारा के अनुयायी राजा  सूरज पाल सिंह आवागढ का जीवन परिचय।

अवागढ़ रियासत एक परिचय- अठारह सौ के दशक में उत्तर प्रदेश में अवागढ़ एटा जनपद में एक प्रमुख धनाढ्य रियासत थी। आवागढ़ रियासत का किला 1803 में एक कच्ची  गढ़ी के रूप में बना था जो वर्तमान में में एक भव्य पक्का किला के रूप में विद्यमान है जिसमें राजा साहिब अवागढ के वंशज रहते हैं।

राजा बलवन्त सिंह जी के पूर्वज ठाकुर पीताम्बर सिंह जी को "राजा "की उपाधि मेवाड़ (उदयपुर) के महाराणा फतेहसिंह जी ने प्रदान की थी। 30दिसम्बर 1839 कोअंग्रेज गवर्नर जनरल ऑकलैंड ने पीताम्बर सिंह जी को अवा तालुका का राजा की मान्यता प्रदान की थी।

सन् 1880 ई0 में राजा प्रथी सिंह के समय में अवागढ़ परिवार सम्पूर्ण अपर इंडिया  में सबसे धनी जमींदार थे।"Raja of Awa  was one of the Wealthiest Landed Proprietors in the Whole of Upper India ". अवागढ़ रियासत यूनाएटिड प्रोविन्सेस  में  क्षेत्रफल में सबसे बड़ी रियासत थी।

जिसका क्षेत्रफल 350 वर्ग मील था जो एटा ,अलीगढ ,मैनपुरी ,मथुरा, फरुखाबादऔर आगरा जिलों में फ़ैला हुआ था। इस रियासत से रेवेन्यु उस समय बलरामपुर रियासत का अधिक था लेकिन क्षेत्रफल बलरामपुर का अवागढ़ से कम था।इस आवागढ़ रियासत के अंतर्गत 230 गांव तथा 292 हैमलेट्स आते थे। उस जमाने में अवागढ़ रियासत अपनी सालाना आय लगभग 8 लाख में से 3.5 लाख रुपये अंग्रेज सरकार को प्रदान करती थी। 

  •  पारवारिक पृष्ठभूमि 

राजा सूरजपाल सिंह का जन्म वैभव -सम्पन्न जादों राजपूत  अवागढ़  -राज -परिवार में 28 अक्टूबर सन् 1896 में हुआ था ।आप यशस्वी स्वर्गीय राजा बलवंत सिंह जी  (सी0 आई0 ई0 ) एवं उनकी पत्नी कलावती देवी के सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्र थे।

उस समय के  राजा - रहीस प्रायः लोक -हितकारी कार्यों से विमुख होकर वैभव -जन्य विलासता पूर्ण  जीवनयापन के अभ्यस्त थे। उनके पास लोक -हितकारी कार्यों के लिए समय और पैसा न था। परन्तु अवागढ़ के राजा सूर्य पाल सिंह जी इसके अपवाद थे।

आप ने लोक हितकारी कार्यों में समय और पैसा बहुत दिया जिसके लिए आवागढ़ राजपरिवार पहले से ही जाना जाता है। आपने अपने पिता स्वर्गीय राजा बलवंत सिंह जी की शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए काफी शैक्षणिक एवं सामाजिक  संस्थानों  की धन से आर्थिक मदद की थी।

  •  शिक्षा - दीक्षा

अजमेर के मेयो कालेज अजमेर में हुई थी । आधिकांश बड़े राजघरानों के बच्चे मेयो कालेज में ही अध्ययन करते थे ।आप मेयो कालेज में घुड़सवारी के चैंपियन भी रहे थे।सन् 1917 ई0 में कोर्ट ऑफ़ वार्ड हटी और सूर्य पाल सिंह को अवागढ़ का राज्याधिकार मिला ।

  • सामंतवादी विचारधारा के विरोधी

यहाँ मैं ये उल्लेख करना चाहूँगा कि श्रीमान् अवागढ़ -नरेश को सब लोग "श्री हुज़ूर ,श्री महाराज ,महाराज "आदि सम्मानपूर्ण शब्दों से सम्बोधित किया करते थे। श्री राजा साहब को ,ये वैभव तथा राज -सत्ता सूचक सम्बोधन रुचिकर न जंचे।

उन्होंने अपने लिए "दादाजी "शब्द सबसे अच्छा समझ कर ,उन्हें इसी शब्द से सम्बोधित करने का आदेश दिया ।वे सभी लोगों के द्वारा "दादाजी "शब्द से पुकारे जाने लगे ।अतः मैं उनके लिए इस लेख में भी "दादाजी "शब्द प्रयोग करूँगा ।

सन् 1917 ई0 में कोर्ट आफ वार्ड हटी और उन्हें अवागढ़ का राज्याधिकार मिला उस समय उ0 प्र0 के गवर्नर लार्ड मैस्टन ने दादाजी को पत्र लिखा कि आप उनके अंग्रेज आदमी को रियासत का मैनेजर नियुक्त कर दें ,किन्तु इस बात को उन्होंने पसन्द नहीं किया और गवर्नर साहब को यह उत्तर दिया कि मैं अपनी रियासत में अपनी पसन्द का मेनेजर रखना चाहता हूँ।

इस उत्तर से दादाजी की निर्भीकता ,स्वाभिमान तथा दृढ़ता का परिचय मिलता है और ज्ञात होता है कि वे प्रारम्भ से ही अटल विचार के महानुभाव थे ।इसी प्रकार की एक घटना ईसाई मिशन बरहन के प्रसंग में है ,जिससे उनकी दृढ़ -चित्तता का और पता चलता है ।

  • अजेय संकल्प शक्ति के प्रणेता 

राजा सूरजपाल सिंह जी अंगेजों की ईसाई मिशनरी के विरोधी। उस समय अँग्रेज ईसाई धर्मावलम्बी थे ।शासन के अतरिक्त ईसाई धर्म का प्रचार करना उनका मुख्य उद्देश्य था। इस उद्देश्यपूर्ति के लिए ईसाई मिशनरियों का देश में जाल फैला हुआ था। अँग्रेज अधिकारी उनकी प्रच्छन्न रूप से सहायता करते और सभी संभव सुविधाएँ उनको प्रदान करते थे ।ईसाई मिशन के प्रचार के प्रसार में एक बात दादा जी के सामने आयी।

बरहन गांव जिला आगरा में ,ईसाई मिशन का एक सेंटर था।सेंटर की भूमि के पटटे की अवधि जब समाप्त हुई तब ,राजा साहिब ने उन पादरियों को वहां से हटने के लिए लिखा। उस समय भारत के वाइसराय तथा गवर्नर जनरल के अधीनस्थ ईसाई धर्म का प्रचार विभाग आता था।

इस लिए बरहन के सबसे बड़े पादरी साहब सीधे वाइसराय के पास पहुंचेऔर उनसे अनुनायन -विनय की कि इस मामले में सहायता करें तथा उन्हें बरहन से न हटने दें। वाइसराय महोदय ने तत्काल उ0 प्र0 के गवर्नर को लिखा कि आप इनकी सहायता करें और राजा साहिब अवागढ़ को समझाइये कि वे पादरियों को बरहन से न हटायें।

गवर्नर दादाजी के स्वभाव व् प्रभाव से परिचित थे ,इस लिए उन्होंने सीधा दादाजी को लिखना पसंद नही किया।उन्होंने आगरा के कमिश्नर को पत्र लिखा कि आप राजा साहिब को संझाएं कि वे इन पादरियों को बरहन से न हटायें। कमिशनर साहिब मि0 ग्रांट जो राजा साहिब के साथ पोलो खेलते थे ,वे हिचकिचाये और उन्होंने राजा साहिब से न कह कर उनके छोटे भाई राव कृष्ण पाल सिंह जी को बुलाकर वायसराय व् गवर्नर साहिब के पत्र दिखाए। 

पत्रों को देख कर राव साहिब भी घबराये ,क्यों कि वह समय प्रथम विश्व युद्ध के बाद का समय था ,जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य का प्रताप -सूर्य अपनी चरम सीमा पर पहुंचा हुआ था। उनके प्रभाव से सभी आतंकित थे ,फिर भला किसका साहस जो प्रभु -सत्ता संपन्न भारत सम्राट के प्रतिनिधि तथा गवर्नर के आदेश की अबहेलना करे। भारत के सभी राजा -महाराजा उनकी कृपा -दृष्टि के अभिलाषी थे। 

उनके आदेशों अथवा परामर्शों की अबहेलना करना ,संकट को निमंत्रण देना था ।राव साहिब ने अवागढ़ जाकर अपने बड़े भाई राजा साहिब को बहुत समझाया परन्तु दादाजी टस से मस नहीं हुए और अपनी बात पर दृढ़ रहे।उन्होंने स्पस्ट कहा कि मैं तो इन पादरियों को बरहन से हटा कर मानूंगा। श्री राव कृष्णपाल जी साहिब ने आगरा आकर सब बातें कमिश्नर से कहीं।

राजा सूरजपाल जी की बातें सुनकर कमिश्नर भी स्तब्ध रह गया। राजा सुरजपाल जी दादाजी की बात कानूनन सही थी इस लिए अंग्रेज कमिश्नर चुप रहे और पादरियों को सलाह दी कि वे अपना सेंटर दूसरी जगह हटालें।इस प्रकार रियासत की वह जमीन  ,जहाँ अब बरहन इण्टर कालेज है ईसाईयों से खाली कराई थी ।इस घटना से राजा साहिब के अदम्य साहस ,स्वाभिमानी ,आत्म -विस्वास ,निर्भीकता एवं दृढ़ -निश्चयी -नीति का पता चलता है ।वे आजीवन इन्हीं शौर्यपूर्ण पर्वर्तियों से ओत प्रोत रहे और निश्चय स्वनिर्मित कर्तव्य -पथ से विचलित न हुए ।वस्तुतः उनकी संकल्प -शक्ति अजेय थी।

  •  भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक 

आवागढ़ रियासत का कार्य भार सम्हालने के कुछ ही समय बाद उन्होंने अँग्रेज मेनेजर को हटाकर ,उसके स्थान पर सुयोग्य भारतीय मेनेजर को नियुक्त किया। उनमें स्वदेशानुराग ,जन्म से ही कूट -कूट कर भरा था। उन्होंने अपने भारतीयों के सामने अंग्रेजों को कभी अहमीयत नहीं दी ।वे भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक एवं पोषक थे।

  • दान देने के प्रबल समर्थक 

अवागढ़ राज परिवार में दान देने की प्रवर्ति सर्वोपरि रही है ।राजा साहिब राज्य की बचत का बहुत बड़ा भाग सार्वजनिक कार्यों में व्यय किया करते थे। जनता के लिए कल्याणकारी -कार्य उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता रहती थी ।सन् 1914 से 1928 तक यानि 14 वर्ष  का समय बलवंत राजपूत कॉलेज का वड़ा नाजुक दौर रहा।

इसके बाद जब राजा सूर्य पाल सिंह जी को संस्था का उपाध्क्ष बनाया गया तो उन्होंने उसी समय 144000 रूपये की आर्थिक मदद करके संस्था को पुनः नवज्योति प्रदान की।इसके बाद  पुनः आरम्भ हुआ इस संस्था का नया विकास का युग  ।राजा सूर्यपाल सिंह जी का इस संस्था के विकास में महान योगदान रहा है।

  • राजा साहिब की लोकहितकारी कार्यों में रुचि

राजा साहिब सूर्य पाल सिंह जी ने बाहर के अनेक मेघावी छात्रों को छात्रवृत्ति  देकर उनको विद्यापार्जन में सहायता दी। राजा साहिब प्रत्येक समाज के गरीवऔर असहाय लोगों को जन्म -विवाह ,शोक आदि जीवन की प्रत्येक दशा के अवसर पर सहायता करते थे ।विधवाओं तथा दीन व्यकितियों को जीवन -निर्वाह के लिए स्थाई आर्थिक सहायता देते थे। 

  • शिक्षण संस्थानों को देते थे आर्थिक सहयोग

राजा साहिब  द्वारा सहायता प्राप्त संस्थाओं में काशी विस्वविद्यालय बनारस ,शांतिनिकेतन ,सोंगरा पाठशाला ,राम -कृष्ण मिशन ,महाविद्यालय ज्वालापुर ,किशोरीरामन् हाईस्कूल  मथुरा ,धर्म समाज कॉलेज अलीगढ ,सावरमती आश्रम गुरुकुल ,वृंदावन आदि है।

इन सब संस्थाओं के विकास में राजा साहिब अवागढ़ ने आर्थिक मदद की। अवागढ़ में शिक्षित लोगों के ज्ञानार्जन के लिए एक सार्वजनिक बृहद पुस्तकालय निर्मित करबाया जिसमें स्वदेशी पुस्तकों के आलावा देशी समाचार -पत्र आते थे। राजा साहिब ने जनता को साक्षर बनाने के लिए गांवों में रात्रि -पाठशालाएं भी स्थापित की थी ।

  • अंग्रेज़ी शासन में भी स्वदेशी निर्मित वस्तुओं के प्रबल समर्थक

अंग्रेजों के समय में भी राजा साहिब सूर्य पाल सिंह जी ने स्वदेशी वस्तु निर्माण को पूरी शक्ति से प्रोत्साहन दिया।प्रदर्शनियों का आयोजन किया और स्वदेशी वस्तु निर्माताओं को पुरस्कृत करके उनके साहस को भी बढ़ाया।राष्ट्रीय आंदोलन से केबल सहानुभूति ही नही प्रकट की ,वरन उसे प्रकट या अप्रकट रूप से आर्थिक सहायता भी प्रदान की और किया खुले रूप से अपने राष्ट्रीय नेताओं का अभिनन्दन।

  •   राष्ट्रपिता  बापू के अनन्य भक्त 

यह बात किसी से छिपी नहीं है जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी एटा पधारे थे ,तब वे राजा अवागढ़ के अतिथि हुए थे और राजा साहिब ने श्राद्धावनत होकर राज्य की एक दिन की आय उन्हें गुप्तरूप से प्रदान की गई थी ।यही नही समय -समय पर उन्हें और भी आर्थिक सहायताएं अवागढ़ राज परिवार ने दी। बापू के वे अनन्य भक्त थे और राजा साहिब को भी बापू का वरद आशीर्वाद प्राप्त था।

राष्ट्रपिता गांधी जी राजा साहिब अवागढ़ से बहुत प्रसन्न थे और उनके प्रजानुरंजन कार्यों के प्रशंसक थे। यह उस समय की बात है जब गाँधी जी भक्त राज -द्रोही समझे जाते थे उनके साथ कठोरता का व्यवहार किया जाता था।ऐसे समय में अवागढ़ राजा सदृश वैभव -संपन्न महानुभावों द्वारा स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे राज नेताओं को सहयोग प्रदान करना अथवा उन्हें किसी प्रकार की  आर्थिक सहायता पहुँचाना बड़े साहस का काम था। 

  • शान्ति निकेतन संस्थान को तत्कालीन समय में एक आलीशान इमारत भेट की थी

राजा सूरजपाल सिंह साहिब कवीन्द्र रवींद्र नाथ टैगौर जी के महान व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने गुरुदेव से कई बार भेंट की और शान्ति निकेतन को बहुत अधिक आर्थिक अनुदान दिया तथा एक  आलीशान भवन भी संस्थान  को दान मे दिया।

  • अंग्रेज अधिकारियों को नहीं देते थे तवज्जो

अवागढ़ राजा सूर्य पाल सिंह जी ने अपने राष्ट्रीय नेताओं को सहयोग हमेशा दिया ,उनसे भेंट भी की और उन्हें आर्थिक सहयोग भी किया ,परन्तु जीवन पर्यन्त किसी अंग्रेज अधिकारी से न भेंट की और न उन्हें कोई भोज ही दिया ।ये बातें उनके सत्साहस ,आत्मगौरव ,तथा विशुद्ध स्वदेशाभिमान की परिचायका है ।

  • संगीत एवं हिन्दी प्रेमी

दादा जी (राजा साहिब) संगीत के बड़े प्रेमी थे और वे भी संगीतज्ञ थे। वे हिंदी के अनन्य प्रेमी थे। राजा साहिब स्वराज्य प्राप्ति से पूर्व ही ,जबकि हिंदी को राजकीय क्षेत्र में कोई विशेष सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त न था ,उसे अपने यहाँ सर्बोच्च स्थान दे चुके थे।राज्य की कार्यालयीय भाषा हिंदी थी। हिंदी के लेख ,कविताओं की धूम रहती थी ।दरबार में कवि -सम्मलेन होते थे और कवियों को पुरुस्कृत करके सम्मानित किया जाता था ।

  •  मानवता के सच्चे पुजारी

व्यकित्व तथा कर्तव्य का  राजा साहिब  में विचित्र समन्वय था ।उनका तपस्वियों  जैसा साधारण रहन -सहन  और जीवन सयमशील था। श्रृंगारप्रियता एबं फैशनपरस्ती के वे प्रबल विरोधी थे ।राज -वैभव का मादक प्रभाव उनको प्रभावित न कर सका था। वे हिंदी साहित्य व् संगीत के प्रेमी थे। 

ईश्वर भक्ति तथा देश -भक्ति उनकी जीवन सहचरी थी। उनका सात्विक सरल स्वभाव था। उनमें मानवता के प्रति करुणा ,प्रेम और संबेदना थी। कर्तव्य और अधिकार में उन्होंने कर्तव्य को ही प्राथमिकता हमेशा दी ।लोक सेवा और कर्तव्य पालन उनके जीवन का व्रत था।

आत्म -प्रशंसा से उन्हें नफरत थी ।साधू महात्माओं और सज्जनों के प्रति सम्मान उनमे बहुत था ।अन्याय ,असत्याचारण ,क्रूरता ,अहंकार, छलदाम्य ,मिथ्यावादिता आदि असद् व्रतियों के प्रबल शत्रु थे ।वे मानवता और सदाचार के प्रबल समर्थक एवंप्रतिष्ठानक थे।

राजा साहिब ने अपने धार्मिक एवं सामाजिक व् आर्थिक सहयोग के कार्यों की कभी बिज्ञापन नही दिया और न अपने कर्तव्य की डींग मारी ।वे चापलूसी कभी पसंद नही करते थे ।प्रजा -पालन ,जन -सेवा उनके जीवन का पवित्र व्रत था ।उन्होंने प्रजा का पैसा प्रजा -हित में ही लगाया। उन्होंने लोक -कल्याणकारी कार्यों में अपना सारा कोष समाप्त कर दिया। वे अनन्य देशभक्त और प्रजा  -प्रेमी थे ।उन्होंने प्रजाहित तथा देशोत्थान के महत्वपूर्ण कार्य किये ।

  •  सादा  जीवन उच्च विचार के अनुयायी

अवागढ़ राजा साहिब ने त्यागमय लोक -सेवा -निरत पवित्र जीवन का आदर्श उपस्थित करके आज के पथ -भृष्ट मानव को कर्तव्य पाठ पढ़ाया है। उनका -व्रत आचार तथा कर्तव्य शास्त्र का एक उज्जवल अध्याय है ,शासनाधिकारी और नागरिक के लिए एक प्रशस्त पाठ है। 

आज लोगों ने कर्तव्य को भुला कर अधिकार का अतिक्रमण करके लोक -जीवन में अस्तव्यस्तता उत्पन्न करदी है ,वे कर्तव्यपरायण मुख होकर अधिकार का दुरपयोग और अतिक्रमण करते हुए भी देखे जाते है ।वे अवागढ़ नरेश के जीवन से पाठ पढ़ें ,शिक्षा लें और उनकी शिक्षा को आत्मसात् करके अपने नागरिक जीवन को सर्व कल्याणकारी बनायें।

आज देश को जन -सेवा  -निरत -कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों की आवश्यकता है ।बिना उनके राष्ट्र के लोक -जीवन में पवित्रता और शांतिमय सुस्थिरता नहीं आ सकती ।देश को अवागढ़ -नरेश सदृश लोक -सेवा -ब्रती तपस्वी महानुभावों की सर्वाधिक आवश्यकता है। 

  •  विवाह एवं परिवार

राजा सूरजपाल सिंह के का विवाह  1913 ई0 में राजकुमारी बालेश्वरी कुमारी पुत्री महाराजा रघुनाथ शरण सिंह जूदेव सरगुजा स्टेट (आज के मध्य प्रदेश में) के साथ हुआ था। राजा सूरजपाल सिंह के तीन पुत्र कुँवर दिग्विजयपाल सिंह ,कुँवर धर्मपाल सिंह तथा कुँवर योगेन्द्र पाल सिंह थे। रानी साहिबा बलेश्वरी कुमारी का स्वर्गवास 71 वर्ष की आयु में  5 मई सन 1967 ई0 की तिथि बैसाख कृष्णा एकादशी संवत  2024विक्रम  को आगरा में मझले राजकुमार धर्मपाल सिंह के पास हुआ था। 

  • स्वर्गवास

राजा सूर्यपाल सिंह जी को अपने छोटे भाई राव 

कृष्ण पाल सिंह जी से  अत्यधिक प्रेम था। दोनो भाइयों की राम और  लक्ष्मण जैसी जोड़ी थी ।राजा सूरजपाल सिंह का निधन 74 वर्ष की आयु में छोटे भाई राव कृष्ण पाल सिंह के पास मथुरा में 12 जुम 1971 ई0 को हुआ और एक दिन बाद 13 जून को  यमुना में जल प्रवाह द्वारा  अन्त्येष्ठि संस्कार किया गया।

लेखक प्रोफ़ेसर डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव -लढोता ,सासनी ,जिला -हाथरस ,उत्तरप्रदेश 
प्राचार्य ,राजकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय सवाईमाधोपुर,राजस्थान 

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