बलवंत राजपूत कॉलेज के वास्तुकार एवं  कर्मयोगी पूर्व प्राचार्य स्वर्गीय डॉ0 रामकरन  सिंह एक परिचय।

Jun 25, 2024 - 14:10
Jun 25, 2024 - 17:28
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बलवंत राजपूत कॉलेज के वास्तुकार एवं  कर्मयोगी पूर्व प्राचार्य स्वर्गीय डॉ0 रामकरन  सिंह एक परिचय।

शिक्षा जगत के एक महान आदर्श शिक्षाविद , दार्शनिक,बलवंत राजपूत कॉलेज के वास्तुकार एवं  कर्मयोगी पूर्व प्राचार्य स्वर्गीय डॉ0 रामकरन  सिंह एक परिचय 

"काश मेरे अंदर के तमस (अंधकार) को रोशन किया जा सके और त्रुटियों का पर्दा जार -जार हो सके ।"

Let all that is dark within me burst with flame,And the veil of error be torn away .

शिक्षा हमारे जीवन को पुनर्जीवित करने वाला प्रभाव शाली साधन है जो व्यक्ति के विकास ,उसकी मुक्ति ,उसकी संस्कृति उदभव ,आर्थिक प्रगति और पुरुष और स्त्रियों को सामाजिक धर्मनिरपेक्ष ओर जनतांत्रिक समाज निर्माण में सहयोग देकर वर्तमान ,वैज्ञानिक ,तकनीकी और आणविक युग की संभावनाओं के अनुरूप प्रशिक्षत करती है। 

Education is the most potent and effective tool to redeem our lives--to bring an individual 's development, his emancipation ,his cultural regeneration ,his economic advancement and ,for training men and women for the diverse needs of a socialistic, secular and democratic society in the present scientific ,technological and nuclear age.
 
शिक्षित करने से बढ़कर कोई उचित एवं योग्य कारण नहीं है ।दुर्भाग्य की बात है कि बहुत सारे विद्यार्थी जिनमें ज्ञान और योग्यता का विशाल भंडार होता है लेकिन गरीबी की बजह से शिक्षा से वंचित रह जाते है। 
There is no worthier and more rightful cause than helping education. And yet it is a tragic fact that many students endowed with intellect and talent are denied education and pursuit of learning due to poverty .Very aptly the poet has said.

टॉमसग्रे ने बिल्कुल सही कहा है कि समुद्र की गहरी कंदराओं में बहुत सारे वहुमूल्य रत्न छुपे हुये रहते है ,बहुत सारे पुष्प रेगिस्तान की हवाओं के बीच अपने सौंदर्य एवं सुगंध को यूँही व्यर्थ गवां देते है ।अभिप्राय यह है कि बहुत सारी कलियों को पुष्पन और पल्लवन का मौका भी नहीं मिलता। 
Full many a gem of purest ray sereneThe dark unfathomed caves of ocean bear. Full many a flower is born to blush unseen. And waste it's sweetness on the desert air. The tragedy is that these human buds do not even get the chance to blush.

श्रद्धेय डा o साहिब के 119 वें जन्मदिवस के शुभ अवसर पर एक लेख लिखने के लिए मैंने चिंतन एवं मंथन किया कि क्षत्रिय समाज के इस महान  व्यक्तित्व पर कुछ विचार लिखूं जो कि समाज के शिक्षार्थियों ,शिक्षकों तथा बुद्धिजीवियों को प्रेरणास्पद हो।

तो स्वर्गीय श्रध्येय डा0रामकरन सिंह जी पूर्व प्राचार्य बलवन्त राजपूत कॉलेज /राजा बलवंत सिंह कॉलेज आग0ऑफएलपी।मैं यह अनुभव आm रहाकर हूँ कि डा0 आर0 के0 सिंह जी तो शिक्षा के विविधरुपात्मक ज्ञान के अगाध सागरmपी थे। 
डा0 रामकरन सिंह जी का प्रिय आदर्श था   a "Leave the place better than you found it "  अर्थात जो स्थान आप ने जिस रूप में ग्रहण किया है , उसे उससे अधिक श्रेष्ठ बनाकर छोड़िये "।

डा0 सिंह साहब ने आजीवन इस आदर्श का  अक्षस्थ:पालन किया था ।आपने जहां -जहां भी उत्तरदायित्व पूर्ण पदों पर कार्य किया -चाहे वह बलवन्त राजपूत कालेज ,आगरा हो , चाहे मेरठ विश्व विद्यालय , मेरठ हो अथवा हिमाचल विश्व विद्यालय , शिमला  --सभी स्थानों को श्रेष्ठ बनाकर ही छोड़ा।

  डॉ0 साहिब शैक्षिक दर्शन थे- 

शैक्षिक इंजीनियर थे ।वे शिक्षा और समाज के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को गहराई से समझते थे।समाज शिक्षा से ,शिक्षालयों से तथा शिक्षकों से क्या अपेक्षा करता है इसकी उन्हें बड़ी परख थी ।इसी लिए वे शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न आवश्यक अभिनव प्रयोगों को अपने समूचे साहस व आत्मविश्वास के साथ करते रहे।

वे चाहते थे कि भारतीय समाज के सामने जो -जो समस्याएं है उसे जिन जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनके समाधान शिक्षा के माध्यम से भी खोजें जायँ।वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम मानते थे ।उनके चिंतन में भारत की गौरवशाली चिंतन -परम्परा की मौलिकता थी ,गतिशीलता थी तथा वे प्राचीन और अर्वाचीन शैक्षिक चिंतन -धाराओं के संगम थे। 

राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय आगरा के प्राचार्यकाल में उन्होंने स्वर्गीय राजा बलवंत सिंह जी के छोटे पुत्र राव कृष्णपाल सिंह जी की स्मृति में विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी संस्था  "राव कृष्णपाल सिंह स्टूडेंट एड सोसाइटी "का गठन किया जो गरीब व प्रतिभाशाली छात्रों चाहे वो किसी जाति ,धर्म अथवा कहीं भी जन्म लेने वाला हो उसकी सहायता के लिए तत्पर रहती थी  जिसके संस्थापक के रूप में वे हमेशा जाने जायगे ।उन्होंने ही बलवन्त शैक्षिक संस्थाओं के भूतपूर्व छात्रों की एक सभा "बलवन्त एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन एलुमिनाय एसोसिएशन "भी स्थापित की।

ऐसे सह्रदय विशाल व्यक्तित्व और इस प्रकार के परोपकारी विचार रखने वाले महामना के लिए ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वो सर्व श्रेठ मानव व्यक्तित्व जिसमे उच्च आदर्श नैतिक मूल्य और निस्वार्थ सेवा का अकूत भण्डार था ।शिक्षा के प्रति निस्पर्ह भाव रखने वाले व्यक्तित्व विरले ही होते है ।राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय आगरा का यह सौभाग्य था कि उसे M.A.,l.l.B.,D.Ed .,Harvard University से उपाधियों से विभूषित व्यक्ति का न केवल संरक्षण मिला अपितु बीज के पौधा रोपड़ से लेकर पल्लवन एवं पुष्पन में पूर्ण समर्पण और सहयोग मिला। 

दूसरे शब्दों में ,मैं ये कहूँ कि राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय के वास्तुकार के रूप में उनका जुड़ाव इतना अधिक था कि वो आर0बी0 एस0 कालेज के पर्याय माने जाते थे ।उनके विना कॉलेज की कल्पना और कॉलेज को उनके प्राचार्य के रूप में परिकल्पना असम्भव प्रतीत होती है ।इतने लम्बे समय तक कॉलेज के प्राचार्य पद पर रहते हुये उन्होंने कॉलेज को जिस प्रकार हर क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छूने में सहयोग दिया उसका साक्ष्य तो वे सभी व्यक्ति देते है जिन्होंने उनके कुशल निर्देशन में कार्य किया। आज के प्रचार्यों से इस तरह की आशा करना शिक्षण संस्था के प्रति अथाह लगाव सम्भव सी नहीं प्रतीत होती है। कालान्तर में आर0 बी0 एस0 औऱ आर0 के0 एस0 समानार्थक शब्द माना जाने लगा।

 जीवन परिचय- 

डॉ0 रामकरण सिंह जी का जन्म वाराणसी जनपद के दशरथपुर (उपनाम  पलीवारपुर ) गांव के एक  प्रतिष्ठित पलवार क्षत्रिय परिवार में 3 नवम्बर सन 1904 ई0 में हुआ था और उस माँ की कोख को धन्य किया जिसने ऐसे सपूत को जन्म दिया ।अच्छे संस्कारों से इस नन्हे पौधे को सींचकर एक वृक्ष  के रूप में शिक्षा जगत की सेवा में अर्पित करने वाले माली थे इनके पिता ठाकुर जय मंगल सिंह एवं माता श्रीमती नौलक्खी देवी ।आप की जीवन - संगिनी स्वर्गीय श्रीमती सुरज कुमारी सिंह एक लब्ध प्रतिष्ठित विदुषी महिला थी।

शिक्षा -दीक्षा -

डॉ0 साहिब की प्रारंभिक शिक्षा गांव  के पास के एक अत्यंत साधारण स्कूल में हुई थी ।आस पास कोई अंग्रेजी स्कूल नहीं था , अतः आपको बनारस के हैवत क्षत्रिय हाई स्कूल ( सम्प्रति उदय प्रताप कॉलेज ,वाराणसी ) में प्रवेश दिला दिया गया।

उस समय अनुशासन प्रिय हेडमास्टर मि,क्लार्क के नेतृत्व में उदय प्रताप कॉलेज के छात्रों का जीवन अत्यंत व्यवस्थित एवं अनुशासित था ।आपके कोमल मन -मस्तिष्क पर मि.क्लार्क के चरित्र और गुणों का निर्णायक प्रभाव पड़ा ।वे अपने बाद के जीवन में भी क्लार्क के गुणों का बखान करते रहे ।अंतिम क्षण तक अपने कार्य को पूरी तन्मयता से करने का गुर उन्होने इसी अंग्रेज हेडमास्टर से सीखा था ।

हैवत क्षत्रिय हाई स्कूल के अनुशासनमय वातावरण में अध्ययन करने के बाद आप   काशी विश्वविद्यालय ,बनारस में प्रविष्ट हुए और वहां से सन 1925 ई0 में बी0 ए0 की परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्होंने 1927 ई0 में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से एम0 ए0 ,अर्थशास्त्र एवं एल0 एल0 बी0 की उपाधि प्राप्त की।

इसके पश्चात आप ने 3 वर्ष तक  जौनपुर , ज्ञानपुर ,तथा वनारस में बकालत किया ,परन्तु यह कार्य आपको पसन्द नहीं आया और सन 1930 ई0में  उदय प्रताप कालेज में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता  बन गये ।उस समय उदय प्रताप कालेज के कर्ता -धर्ता वनारस के प्रथम ग्रेजुएट बाबू प्रसिद्धिनारायन सिंह जी जो डा0 साहिब की योग्यता और कार्य कुशलता से बहुत प्रभावित थे ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की सलाह दी ।अन्ततः बाबू प्रसिद्धि नारायण सिंह जी की प्रेरणा एवं क्षत्रिय हितकारिणी महासभा के सहयोग से वे 1931 में अमेरिका चले गये औऱ विश्व प्रसिद्ध "हारवर्ड विश्वविद्यालय से एम0 एड0 की डिग्री लेकर औऱ डी0 एड0( डॉक्टरेट )  का कुछ काम आगे बड़ा कर 1934 में भारत वापस लौटे ।

राव कृष्णपाल सिंह जी अवागढ़ से मुलाकात एवं बलवंत राजपूत कालेज के प्राचार्य का दायित्व-

उस समय बलवंत राजपूत कालेज आगरा के संस्थापक स्वर्गीय राजा बलवंत सिंह के छोटे पुत्र राव कृष्णपाल सिंह जी कालेज के प्रबंधन का कार्य देख रहे थे उनको एक सुयोग्य प्रधानाचार्य की तलाश थी ।बाबू प्रसिद्धिनारायन सिंह जीने किसी कार्य हेतु एक पत्र लेकर डा0 साहिब को सर चिंतामणि जी के पास लखनऊ भेजा।सर चिंतामणी जी उस समय से संयुक्त प्रान्त की सरकार में मंत्री थे और राव कृष्णपाल सिंह जी अवागढ़ के राजनीतिक गुरु भी थे ।चिंतामणी जी ने डा0 आर0 के0 सिंह जी को राव कृष्णपाल सिंह जी से मिलने को कहा ।दोनों शिक्षा जगत की महान हस्तियों का मिलन हुआ और डा0 साहिब एक युवा प्रधानाचार्य के रूप में 1934 में बलवंत राजपूत इंटरमीडिएट कालेज ,आगरा के पद पर आसीन हुये।

कार्यभार ग्रहण करने के प्रथम दिन से ही इस संस्था के प्रगति के स्वपन उनके मानस पटल को रंगीन और सजीव बनाते रहे ।इंटरमीडिएट कालेज को किस प्रकार डिग्री कालेज बनाया जाय ,डिग्री बनने के बाद कैसे इसे पोस्टग्रेजुएट का स्तर बनाया जाय ,फिर इसका स्वरूप राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कैसे किया जाय और अंतोगतत्वा इसे कैसे विश्व विद्यालय बनाया जाय आदि -आदि चिंताएं और कल्पनाएं उन्हें उद्देलित करने लगी ।उन्होंने इन कल्पनाओं को साकार करने के लिए अथक व अगाध परिश्रम करते हुऐ इस संस्था को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय गौरव दिलाकर ही दम   लिया।आज अवागढ़ राज परिवार के योगदान और डॉ आर0 के0 सिंह जी के कठिन परिश्रम व  आशीर्वाद की बजह से यह संस्था दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा कालेज है जिसके पास लगभग ग्यारह सौ एकड़ भूमि है। 

आप 1934 से 1964 तक पूरे 30 वर्ष बलवंत राजपूत कॉलेज /राजा बलवंत सिंह कॉलेज आगरा के प्राचार्य रहे ।उन्होंने तन-मन-धन से 30 वर्षों तक इस संस्था की सेवा की ।वे इस संस्था के हित में ही  अपना हित देखते थे ।उन्होंने भारत केशिक्षा जगत में बलवंत राजपूत कालेज को उस ऊंचाई पर पहुँचा दिया कि अनेक अंतराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय नेता और विद्वान इस परिसर का अवलोकन करने को आये जिनमें अमेरिका के उपराष्ट्रपति मि.जॉनसन ,अमेरिका के राष्ट्रपति मि.आइजनहावर भारत के राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद जी ,भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का नाम उल्लेखनीय है ।

डा0 रामकरन सिंह जी कर्मयोगी थे ।वे गीता के कर्मयोग के साक्षात मूर्ति थे ।जब भारत के कमाण्डर -इन-चीफ जनरल करिअप्पा जी बलवन्त राजपूत कालेज में पधारे तो इसी संस्था में एन0 सी0 सी0 के कैडेट्स ने उन्हें सलामी दी थी ।यह एक बड़ी घटना थी जो डा 0 साहिब के दम-खम से ही सम्भव हो सकी ।जनरल करिअप्पा के कहने पर ही भारतीय सेना के बच्चों  की शिक्षा समस्या के समाधान हेतु डॉ0 आर0 के0 सिंह ने "केंद्रीय विद्यालय प्रणाली "की अवधारणा प्रस्तुत की जो आज भारत के माध्यमिक शिक्षा का आधार स्तम्भ है। 

यह रहस्य भी बहुत कम लोग जानते होंगे कि सैंट जोन्स कालेज ,आगरा में साइंस कांग्रेस के अवसर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू पधारे थे ।उनको बलवन्त राजपूत कालेज आगरा के एन0 सी0 सी0 छात्रों द्वारा कैप्टन गजराज सिंह के नेतृत्व में गार्ड आफ ऑनर दिया गया ।यह भी एक उच्च कोटि की परेड थी जिससे प्रभावित होकर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एन 0 सी0 सी0 को समाप्त करने का निर्णय बदल दिया  था ।भारत में एन0 सी0 सी0 को पुनर्जीवित करने का श्रेय बलवन्त राजपूत कॉलेज एवं उसके नेतृत्वकर्ता डॉ0 रामकरन सिंह जी जैसे प्राचार्य व शिक्षाविद को जाता है। 

डॉ0 आर0 के0 सिंह जी अपने बातके तो धनी थे ही अपनी पसन्द के भी मालिक थे ।वे सच मुच बडे थे सदा बड़ी बात करते थे और बड़प्पन बांटा करते थे ।उनकेसम्पर्क में आने वाला हर व्यक्ति अपने आप को कुछ बड़ा ही समझकर लौटता था ।अपने सहयोगियों की निष्ठा ,योग्यता व ईमानदारी के प्रति विश्वास रख कर काम लेना सम्भवतः उनके कुशल प्रशासन का रहस्य था ।यही कारण था कि उनकी बात पर ,उनके इशारे पर सब कुछ करने को तैयार व्यक्तियों की संख्या बेहिसाब थी। 

उत्तरप्रदेश सरकार नेउनको 1966में मेरठ विश्व विद्यालय का कुलपति पद प्रदान किया ।उनकी कार्यप्रणाली एवं कुशलता से प्रभावित होकर 1971 में हिमाचल प्रदेश सरकार के आग्रह पर एवं उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ0 गोपाल रेड्डी जी के कहने पर 1 जुलाई 1971 में हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय शिमला के कुलपति का पद भार ग्रहण किया और कठिन परिश्रम से इस संस्था को भी आदर्श स्वरूप प्रदान किया ।मेरठ से विदा करते समय उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महोदय डॉ0 गोपाल रेड्डी जी ने अपने भाषण में कहा कि "डा0 रामकरन सिंह जी भारतीय शिक्षा के इतिहास में ऐसे कुलपति के रूप।में जाने जायेंगे जिसे दो विश्वविद्यालयों की स्थापना ओर विकास का श्रेय है।

वे एक ऐसे व्यक्ति के रूपमें भी जाने जायेंगे जिनके व्यक्तित्व एवं विचारों पर पश्चिम का काफी प्रभाव था ,किन्तु अथिति सत्कार के मामले में वे प्राचीन भारतीय परम्पराओं को भी मात देते थे ।"डॉ0 साहिब के व्यवहार में ऐसी सहजता ,ऐसी स्वाभाविकता एवं अपणत्वभाव था कि कुछ ही मिनटों में नये व्यक्ति को भी अनुभव होने लगता था कि वह अपनेघर में ,अपने प्रिय जनों के बीच में आया है ।उनकी वाणी श्रोता को अपनी ओर आकर्षित ही नहीं करती थी अपितु उसको अपना बना लेती थी ।उत्तरप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 संपूर्णानंद जी का कहना था कि डा0 आर0 के0 सिंह की वाणी में जादू था ।अंततः वे जहां भी रहे पर दिलमें उनके हमेशा आर0 बी0 एस0 कालेज की प्रगति ही रही ।

 शिक्षा एवं शिक्षण संस्था के प्रति सच्चा समर्पण भाव की प्रतिमूर्ति-

डॉ0 आर0 के0 सिंह जी अत्यंत उत्साही ,साहसी धैर्यवान निडर ,स्पष्टवादी तथा आशावादी व्यक्ति थे ।आगरा विश्व विद्यालय में उन दिनों व्याप्त घोर भरस्टाचार को बेनकाब करने का साहस केवल उन्हीं में था ।वे शिक्षा के निरन्तर गिरते स्तर और शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार को देख कर दुखी होते थे और हर समय इस सोच -विचार में रहते थे कि क्या इस विषय में कुछ किया जा सकता है।

उनके व्यक्तित्व में कर्मठता ,सहनशीलता ,विनयशीलता तथा शिष्टाचार का अदभुत समन्वय था ।संकट ग्रस्त लड़खड़ाते कितने ही व्यक्तियों को उन्होंने नैतिक बल तथा सहारा देकर खड़ा कर दिया ।उनकी तड़प थी "प्रतिभा"की खोज।इस खोज में उन्होंने किसी प्रकार का समझौता कभी नहीं किया ,यही उनके जीवन की उज्जवलता थी ,यही उनकी उपलब्धि थी।

चुन -चुन कर  बलवन्त राजपूत कॉलेज /राजा बलवन्त सिंह कॉलेज में अच्छे कर्मठ शिक्षा एवं शिक्षण से संस्था के प्रति समर्पण भाव रखने वाले प्राध्यापक एवं कर्मचारी नियुक्त करना उन्हें शोध ,अध्ययन -अध्यापन के लिए तरह तरह से समय समय पर प्रेरित करना उनका विशेष शौक था ।उनके रग रग में यौवन की तरंग प्रवाहित होती थी ।प्रमाद औऱ अभिमान के वे महान शत्रु थे।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी उनका आर0 बी0 एस0 कॉलेज से अमिट स्नेह रहा जिसकी अनुभूति मुझे उनके एक सहयोगी द्वारा लिखे एक लेख में पढ़ने को मिली जब वे कैंसर से पीड़ित थे तो उनके एक सहयोगी डॉ0 आर0 पी0 तिवारी  ,पूर्व प्राचार्य आर0 बी0 एस0 कालेज ने उनसे कहा कि "Sir ,do you feel any pain ,"he wrote on a  piece of paper ,"if you work hard for the College ,you are my Tonic." 

 क्या आज के शिक्षाविदों से ये आशा की जासकती है  कहना मुस्किल ही नहीं नामुमकिन है आज के इस समय में ।वाह क्या समर्पण भाव था उनका उनके द्वारा पाल पोस् कर  बट बृक्ष बनाई गई इस संस्था के विषय में अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी ।अनुशासन उनकी प्रथम प्राथमिकता हमेशा रही ।ऐसे महान मानव कभी  कभी ही अवतरित होकर अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप दूसरों पर छोड़ जाते है। 

At last I can say "Raja Balwant Singh College is the living embodiment of his ideal and vision .
It is not secret that R B S College and Dr R .K.Singh have been synonyms for long.The present august shape of the Balwant Educational Institutions is the result of Dr R .K Singh's imagination and also his practical work .After the gracious benevolence of the Founder ,the Real Maker of R.B .S College has been late Dr R.K.Singh .It is he who has brought R.B.S.on the educational map of India .His being an Educationist of repute and his ardent love for R .B.S .College mingled into one .

मैं शिक्षा ,विद्यानुराग एवं लोककल्याण के लिऐ समर्पित ,कर्तव्य परायण महान आत्मा के119 वें जन्मदिवस के अवसर पर सत सत नमन करता हुआ सादर  श्रद्धा सुमन अर्पित  करता हूँ। मैंने  शिक्षा के इस महान नायक के जीवन परिचय पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास आप सभी मित्रों के सामने  किया जिससे हमारे युवा शिक्षार्थी एवं शिक्षक प्रेरणा ले सकें। जय हिंद ।
 
 लेखक :- प्रो oधीरेन्द्र सिंह जादौन
  गांव:- लढोता ,सासनी 
  जनपद :- हाथरस ,उत्तरप्रदेश 
   प्राचार्य :- राजकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान

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