हड़प्पा कालीन मनका निर्माण तकनीकों पर लखनऊ में कार्यशाला शुरू, शिल्पकारों ने दिए व्यावहारिक गुर
लखनऊ में राज्य पुरातत्व निदेशालय द्वारा हड़प्पा सभ्यता की प्राचीन मनका निर्माण तकनीकों पर दो दिवसीय कार्यशाला शुरू। खंभात के शिल्पकारों ने दिया व्यावहारिक प्रशिक्षण।
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ के तत्वावधान में "एंशियंट बीड मैन्युफैक्चरिंग टेक्निक्स: विद स्पेशल रेफरेंस टू हड़प्पन बीड्स" विषय पर दो दिवसीय विशेष व्यावहारिक कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। 22 से 23 अक्टूबर तक चलने वाली इस कार्यशाला का उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ पुरातत्व निदेशालय की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी, गुजरात के खंभात से पधारे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मुख्य प्रस्तर शिल्पकार अनवर हुसैन शेख, शिल्पकार प्रताप भाई परमार, अवध बालिका डिग्री कॉलेज की सहायक आचार्य डॉ. नीतू अग्रवाल तथा राम विनय जी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
कार्यशाला के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए पुरातत्व निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी ने बताया कि इसका मुख्य ध्येय सिंधु-सरस्वती (हड़प्पा) सभ्यता की अत्यंत उन्नत मनका निर्माण तकनीकों का सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान शोधार्थियों तक पहुंचाना है। उन्होंने रेखांकित किया कि प्राचीन काल में निर्मित मनके केवल शारीरिक सज्जा या आभूषण मात्र नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन समाज की उन्नत धातु व प्रस्तर तकनीक, सूक्ष्म ज्यामितीय दक्षता, व्यापारिक संपर्कों और आर्थिक संपन्नता के ठोस पुरातात्विक साक्ष्य हैं। इनका तकनीकी विश्लेषण प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और हस्तशिल्प की वैज्ञानिकता को समझने का सशक्त माध्यम है।

कार्यशाला के प्रति शैक्षणिक जगत में भारी उत्साह देखा गया, जहां 300 से अधिक ऑनलाइन आवेदनों में से 'प्रथम आगत, प्रथम स्वागत' के आधार पर 150 प्रतिभागियों का चयन किया गया। व्यावहारिक प्रशिक्षण को प्रभावी और गहन बनाने के लिए प्रतिभागियों को आठ अलग-अलग बैचों में विभाजित कर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यशाला की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रतिभागियों को केवल किताबी या पुरातात्विक व्याख्यानों तक सीमित न रखकर पारंपरिक शिल्प प्रक्रियाओं का सजीव प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण के दौरान खंभात (गुजरात) के दक्ष शिल्पकारों के मार्गदर्शन में प्रतिभागियों को कच्चे प्रस्तर (जैसे अगेट, कार्नेलियन) के चयन, प्राथमिक गढ़ाई, छिलाई, सटीक आकार देने, विशेष रासायनिक/तापीय परिष्करण, पॉलिश और सूक्ष्म छिद्रण (ड्रिलिंग) जैसी जटिल प्रक्रियाओं का व्यावहारिक अभ्यास कराया जा रहा है। इस अनूठी पहल से जहां पुरातत्व के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों को प्राचीन औजारों और निर्माण विधियों की आंतरिक समझ प्राप्त होगी, वहीं सदियों पुरानी लुप्तप्राय पारंपरिक तकनीकों का दस्तावेजीकरण और ज्ञान हस्तांतरण भी सुनिश्चित हो सकेगा। यह आयोजन भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को जीवंत परंपरा के रूप में अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक प्रभावी कदम है।
What's Your Reaction?

