'दो कचौड़ी, एक समोसा… मर्दों का क्या भरोसा' — नारे से आगे, हमें असल सवाल पर भी सोचना चाहिए
सोशल मीडिया पर चर्चा में आए एक अजीब नारे पर देवबंदी उलेमा क़ारी इसहाक़ गोरा ने दी प्रतिक्रिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की शुरुआत घर से अच्छी तरबियत के साथ होनी चाहिए।
देवबंद: दो कचौड़ी, एक समोसा… मर्दों का क्या भरोसा”—इस तरह के नारे इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे नारे सुनकर उन्हें हैरत हुई। उनके मुताबिक़, जब उन्होंने इस मामले के बारे में तहक़ीक़ की तो उन्हें बताया गया कि यह नारा कुछ लड़कियों की ओर से अपनी सुरक्षा और तहफ़्फ़ुज़ से जुड़ी चिंता व्यक्त करने के लिए लगाया जा रहा है।
इस नारे की भाषा और अंदाज़ पर अलग-अलग राय हो सकती है और इसे लेकर बहस भी की जा सकती है। लेकिन अगर इसके पीछे सुरक्षा और सम्मान से जुड़ी कोई चिंता व्यक्त की जा रही है, तो उस चिंता को समझने की कोशिश करना भी ज़रूरी है। यहीं से बात सिर्फ़ एक नारे की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और पारिवारिक तरबियत की भी हो जाती है।
हमें अपने बच्चों, खास तौर पर बेटों को यह सिखाना चाहिए कि महिलाओं और लड़कियों के साथ सम्मान, शालीनता और ज़िम्मेदारी के साथ पेश आना कितना ज़रूरी है। उन्हें यह समझाना चाहिए कि किसी भी महिला के साथ ऐसा व्यवहार न हो जिससे उसे असहजता या असुरक्षा महसूस हो।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ख़वातीन में हमारी अपनी बहनें, माँएँ, नानियाँ और दादियाँ भी होती हैं। जिस सम्मान और सुरक्षा की हम अपने घर की महिलाओं के लिए उम्मीद करते हैं, वही सम्मान समाज की दूसरी महिलाओं के लिए भी हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। हम अपने बच्चों को बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ तो दिलाते हैं, लेकिन साथ ही उनकी तरबियत, अख़लाक़, संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी पर भी ध्यान देना उतना ही ज़रूरी है।
क्योंकि तालीम इंसान को क़ाबिल बनाने में मदद करती है, लेकिन अच्छी तरबियत उसे अपने व्यवहार और ज़िम्मेदारियों को समझने वाला इंसान बनाने में अहम भूमिका निभाती है।
इसलिए बहस सिर्फ़ इस बात तक सीमित न रहे
“यह नारा सही है या ग़लत?”
बल्कि हमें यह भी सोचना चाहिए
“हम अपने घरों में अगली नस्ल को महिलाओं के सम्मान, तहज़ीब और इंसानी रिश्तों की क़द्र करना कितना सिखा रहे हैं?”
किसी भी समाज में बेहतर माहौल बनाने की शुरुआत केवल नारों या बहसों से नहीं, बल्कि घर से मिलने वाली सही तरबियत और हमारे अपने व्यवहार से भी होती है।
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