Gorakhpur News: राष्ट्रधर्म और शिक्षा क्रांति के शिल्पी ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं पुण्यतिथि, CM योगी की अध्यक्षता में श्रद्धांजलि सभा कल
गोरक्षपीठ के पूर्व पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं पुण्यतिथि पर मंगलवार को गोरखनाथ मंदिर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में विशाल श्रद्धांजलि सभा आयोजित होगी।
सांस्कृतिक स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता और गुरु-परंपरा की ऐतिहासिक ध्वजवाहक गोरक्षपीठ में इन दिनों पूर्व पीठाधीश्वरों की पावन स्मृति में अध्यात्म और राष्ट्रचेतना का समागम देखने को मिल रहा है। नाथपंथ की विश्वविख्यात पीठ पर युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में वार्षिक साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह पूरी श्रद्धा व गरिमा के साथ आयोजित किया जा रहा है।
इसी क्रम में आश्विन कृष्ण तृतीया यानी मंगलवार, 29 सितंबर को युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं पुण्यतिथि पर गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में एक भव्य श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाएगा। सभा की अध्यक्षता गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे। इस गरिमामयी समारोह में देश के विभिन्न प्रांतों से आए विशिष्ट साधु-संत, अखाड़ों के महामंडलेश्वर, प्रबुद्ध विचारक और हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहकर युगपुरुष के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। पीठ में 23 सितंबर से श्रीमद्भागवत महापुराण कथा और 24 सितंबर से समसामयिक राष्ट्रीय विषयों पर विद्वत सम्मेलन अनवरत चल रहा है।
मेवाड़ से गोरक्षपीठ तक: स्वाभिमान और त्याग की यात्रा
1935 से 1969 तक गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज का संपूर्ण जीवन राष्ट्रधर्म, सामाजिक एकता और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा। उनका जन्म वैशाख पूर्णिमा के पावन दिन वर्ष 1894 में राजस्थान के मेवाड़ ठिकाना अंतर्गत ककरहवां (चित्तौड़गढ़) में हुआ था। उनके बाल्यकाल का नाम नान्हू सिंह था। मेवाड़ की ऐतिहासिक माटी में जन्म लेने के कारण अटूट स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति अगाध निष्ठा उनके संस्कारों में रची-बसी थी।
मात्र पांच वर्ष की आयु में 1899 में उनका आगमन गोरखपुर की तपोभूमि पर हुआ। यहीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा संपन्न हुई। युवावस्था में उनका रुझान योग, साधना और राष्ट्रसेवा की ओर उन्मुख हुआ। 15 अगस्त 1933 को गोरक्षपीठ में उनकी योग दीक्षा हुई और इसके ठीक दो वर्ष बाद 15 अगस्त 1935 को उन्होंने विधिवत गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर का दायित्व संभाला। पीठाधीश्वर बनते ही उन्होंने मंदिर परिसर के वर्तमान भव्य स्थापत्य का खाका तैयार कराया और उसे एक प्रमुख सामाजिक-आध्यात्मिक केंद्र में रूपांतरित किया।
स्वतंत्रता संग्राम और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका
महंत दिग्विजयनाथ जी का व्यक्तित्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था; उन्होंने स्वतंत्रता समर में भी मुखर और निर्भीक भूमिका निभाई। राष्ट्र को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने की प्रबल आकांक्षा के चलते उन्होंने वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर अपने अध्ययन का परित्याग कर दिया था।
गोरखपुर और आसपास के अंचलों में क्रांतिकारियों को आश्रय, संरक्षण और संबल देने के कारण वे लगातार अंग्रेजी हुकूमत के निशाने पर रहे। वर्ष 1922 के ऐतिहासिक चौरीचौरा जनविद्रोह के दौरान भी ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें संदिग्ध मानकर घेराबंदी की थी, किंतु अपनी अप्रतिम सूझबूझ और तर्कों के बल पर वे निर्दोष साबित हुए और औपनिवेशिक सत्ता को उनके समक्ष नतमस्तक होकर उन्हें रिहा करना पड़ा।
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की नींव के पत्थर
अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के शताब्दियों पुराने संघर्ष में गोरक्षपीठ का योगदान सर्वविदित है। इतिहास गवाह है कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज इस पुनर्जागरण आंदोलन में नींव के मजबूत पत्थर बनकर उभरे। वर्ष 1934 से 1949 के दौरान उन्होंने जनजागरण अभियान चलाकर राम मंदिर आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया।
दिसंबर 1949 में जब अयोध्या में विवादित ढांचे के भीतर प्रभु रामलला का प्राकट्य हुआ, उससे नौ दिन पूर्व महंत दिग्विजयनाथ जी के निर्देशन में वहां अखंड रामायण पाठ का अनुष्ठान शुरू हुआ था। रामलला के प्राकट्य के ऐतिहासिक क्षण पर वे स्वयं अयोध्या में उपस्थित रहकर संतों का नेतृत्व कर रहे थे। आज जब पांच सौ वर्षों की प्रतीक्षा के उपरांत प्रभु श्रीराम अपनी जन्मभूमि पर भव्य गर्भगृह में विराजमान हो चुके हैं, तो इस संकल्प यात्रा के अग्रदूत के रूप में महंत दिग्विजयनाथ जी और उनके पट्टशिष्य राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी का योगदान इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। सुखद संयोग यह भी है कि मंदिर निर्माण की शुभ घड़ी में राज्य की सत्ता की बागडोर स्वयं उनके पौत्र-शिष्य योगी आदित्यनाथ के हाथों में है।
पूर्वांचल में शिक्षा क्रांति: महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की नींव
शिक्षा को समाज परिवर्तन और बौद्धिक स्वतंत्रता का सबसे सशक्त माध्यम मानते हुए महंत दिग्विजयनाथ जी ने 1932 में 'महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद' की स्थापना की थी। एक किराए के छोटे से मकान में महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल के रूप में शुरू हुआ यह प्रकल्प आगे चलकर 1936 में हाईस्कूल और देश की आजादी के समय सिविल लाइंस में महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
महंत जी की दृष्टि कितनी दूरगामी और स्वार्थहीन थी, इसका प्रमाण 1958 में मिला। जब गोरखपुर में विश्वविद्यालय की स्थापना की बात आई, तो उन्होंने महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज और महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय के विशाल भवन एवं संसाधन नवगठित गोरखपुर विश्वविद्यालय को सहर्ष दान में दे दिए। आज महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत चार दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थाएं संचालित हो रही हैं, जो प्राथमिक विद्यालयों से लेकर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, नर्सिंग, आयुर्वेद, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के माध्यम से पूरे पूर्वांचल की शैक्षणिक तस्वीर बदल रही हैं।
राजनीति को बनाया लोककल्याण और सेवा का माध्यम
महंत दिग्विजयनाथ जी ने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, अपितु समाज सुधार और लोककल्याण का मंच माना। वर्ष 1937 में हिंदू महासभा से जुड़कर उन्होंने राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई और 1944 में हिंदू महासभा का ऐतिहासिक प्रांतीय सम्मेलन गोरखपुर में आयोजित कराया। वर्ष 1961 में वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
धार्मिक व सामाजिक दृष्टि से उन्होंने 1939 में 'अखिल भारतीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा' का गठन किया, जिससे देशभर के नाथ संप्रदाय के मठ-मंदिर एक सूत्र में बंधे। वर्ष 1967 में गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की जनता ने उन्हें भारी मतों से विजयी बनाकर लोकसभा भेजा। 1969 में उनके ब्रह्मलीन होने तक उनका हर क्षण राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक गरिमा के संरक्षण को समर्पित रहा। उनका यह तपोनिष्ठ जीवन आज भी समाज और राष्ट्र को सही दिशा प्रदान कर रहा है।
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