फॉरेंसिक जांच में तेजी लाएगा एआई, लेकिन साक्ष्यों का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी: टेकसंगम में बोले विशेषज्ञ
यूपीएसआईएफएस के 'टेकसंगम' में फॉरेंसिक जांच में एआई की भूमिका पर मंथन। विशेषज्ञों ने कहा- डीएनए व फिंगरप्रिंट जांच होगी तेज, लेकिन डीपफेक और पक्षपातपूर्ण डेटा से सतर्कता जरूरी।
उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (यूपीएसआईएफएस), लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के अंतर्गत 'टेकसंगम' के प्रथम दिन विशेषज्ञों ने फॉरेंसिक विज्ञान और आपराधिक न्याय प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की असीम संभावनाओं और उससे जुड़ी चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श किया। विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि फिंगरप्रिंट, डीएनए विश्लेषण, सीसीटीवी फुटेज की जांच और अपराध से जुड़े बड़े डेटासेट के विश्लेषण में एआई जांच एजेंसियों की परिचालन क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट चेतावनी भी दी कि एआई से प्राप्त निष्कर्षों को बिना स्वतंत्र सत्यापन के अंतिम मान लेना जांच और न्यायिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकता है। एआई एक सक्षम तकनीकी सहायक है, किंतु यह मानव विशेषज्ञता और न्यायिक विवेक का विकल्प नहीं बन सकता।
आपराधिक न्याय व्यवस्था में तकनीक और बीएनएस के मानक
सत्र की शुरुआत करते हुए मॉडरेटर डीआईजी (टेक्नीकल) आशीष तिवारी ने अतिथियों व वक्ताओं का स्वागत किया। उन्होंने अपराध नियंत्रण, पहचान, त्वरित अनुसंधान और अभियोजन में फॉरेंसिक विज्ञान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के विधिक प्रावधानों का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई कानूनी व्यवस्था में फॉरेंसिक साक्ष्यों की भूमिका अत्यंत केंद्रीय हो गई है। ऐसे में एआई जांच एजेंसियों को तकनीकी मजबूती दे सकता है, बशर्ते डेटा की गुणवत्ता, पारदर्शी मानक और मानवीय निगरानी सुनिश्चित की जाए।
बड़े डेटा के त्वरित विश्लेषण में मददगार: संदीप जोशी
पैनल चर्चा को संबोधित करते हुए संदीप जोशी ने कहा कि एआई भारी-भरकम और जटिल डेटा का न्यूनतम समय में विश्लेषण करने में सक्षम है। पारंपरिक जांच पद्धतियों में जिन कड़ियों और पैटर्न को तलाशने में लंबा समय लगता था, एआई उन्हें तेजी से चिह्नित कर जांच अधिकारियों को सही समय पर सटीक इनपुट उपलब्ध कराता है। उन्होंने बताया कि फिंगरप्रिंट पैटर्न की तुलना, जटिल डीएनए डेटा का मिलान, सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियों की ट्रैकिंग और विभिन्न स्थानों पर संदिग्धों की आवाजाही को मैप करने में यह तकनीक बेहद प्रभावी है। हालांकि, इसकी विश्वसनीयता केवल उच्च गुणवत्ता वाले डेटा, प्रमाणित सॉफ्टवेयर और वैज्ञानिक पद्धति पर ही टिकी है।
डीपफेक और गलत डेटा से साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर खतरा
विशेषज्ञों ने एआई प्रणालियों के अंधानुकरण के खतरों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने सचेत किया कि पक्षपातपूर्ण डेटा पर प्रशिक्षित एआई मॉडल जांच को भटका सकते हैं और ऐसे निष्कर्ष दे सकते हैं जिनका धरातल पर साक्ष्यों से कोई मेल न हो। इसके अलावा, साइबर युग में डीपफेक और मॉर्फ्ड डिजिटल साक्ष्यों के जरिए जांच को प्रभावित करने की आशंकाएं तेजी से बढ़ी हैं। इस खतरे से निपटने के लिए 'सुरक्षा के लिए एआई और एआई की सुरक्षा' के सिद्धांत पर बल दिया गया, ताकि सिस्टम को किसी भी प्रकार की अनधिकृत पहुंच या डेटा हेरफेर से सुरक्षित रखा जा सके। जांचकर्ताओं के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे एआई निष्कर्षों का पारंपरिक फॉरेंसिक विधियों से मिलान करें और संपूर्ण प्रक्रिया का विस्तृत ऑडिट ट्रेल सुरक्षित रखें।
अदालत में स्वतः स्वीकार्य नहीं होंगे एआई के निष्कर्ष: कमोडोर सतीश के. सत्यपथी
संदीप के. सत्यपथी (सेवानिवृत्त) ने व्यावहारिक अनुभव साझा करते हुए वर्ष 2006 के चर्चित निठारी मामले और डॉ. जी.के. गोस्वामी के साथ अपने पेशेवर संस्मरणों का उल्लेख किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत में केवल इस आधार पर कोई साक्ष्य मान्य नहीं होगा कि उसे किसी आधुनिक एआई टूल ने तैयार किया है। न्यायालय में साक्ष्य की कानूनी स्वीकार्यता उसकी मूल सत्यता, अभिरक्षा की अखंड श्रृंखला (चेन ऑफ कस्टडी) और फॉरेंसिक विशेषज्ञ द्वारा दी जाने वाली वैज्ञानिक गवाही पर ही निर्भर करेगी। विशेषज्ञ को यह साबित करना होगा कि विश्लेषण की पद्धति क्या थी और परिणाम कितने प्रामाणिक हैं। उन्होंने निष्कर्ष दिया कि फॉरेंसिक जांच में एआई का सार्थक व सुरक्षित उपयोग तभी संभव है, जब पेशेवर विशेषज्ञता और मानवीय उत्तरदायित्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
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