यूपीएसआईएफएस में 'टेकसंगम': फॉरेंसिक जांच में एआई बढ़ाएगा विश्लेषण की गति, मानवीय विवेक जरूरी

यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में अंतरराष्ट्रीय संवाद 'टेकसंगम' संपन्न। विशेषज्ञों ने कहा- फॉरेंसिक में एआई से तेज होगी जांच, लेकिन साक्ष्य की प्रामाणिकता सर्वोपरि।

By INA News Desk
Oct 23, 2026 - 22:43
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यूपीएसआईएफएस में 'टेकसंगम': फॉरेंसिक जांच में एआई बढ़ाएगा विश्लेषण की गति, मानवीय विवेक जरूरी
प्रतीकात्मक चित्र
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उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (यूपीएसआईएफएस), लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के अंतर्गत आयोजित 'टेकसंगम' सत्र में फॉरेंसिक विज्ञान और आपराधिक अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका पर विशेषज्ञों ने गहन मंथन किया।

पैनल चर्चा में शामिल राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फॉरेंसिक वैज्ञानिकों व कानूनी जानकारों ने स्पष्ट किया कि एआई आपराधिक जांच में साक्ष्यों के संकलन और विश्लेषण की गति को कई गुना बढ़ा सकता है, किंतु यह साक्ष्यों की मूल प्रकृति और न्यायालय में उनकी स्वीकार्यता के तय कानूनी मानकों को नहीं बदल सकता। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि एआई एक अत्यंत प्रभावी सहायक उपकरण है, लेकिन किसी भी निष्पक्ष जांच के अंतिम निष्कर्ष के लिए मानवीय विवेक, पेशेवर विशेषज्ञता और पारदर्शी कानूनी प्रक्रियाएं अनिवार्य हैं।

साक्ष्यों की प्रकृति नहीं बदलता एआई, विश्लेषण होता है तेज

पैनल चर्चा के दौरान मॉडरेटरों ने रेखांकित किया कि एआई साक्ष्य के वास्तविक स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं करता, बल्कि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त भारी-भरकम डेटा को एकीकृत डैशबोर्ड पर प्रस्तुत कर पैटर्न, संबंधों और समानताओं की पहचान को आसान बनाता है।

जिन कड़ियों को पारंपरिक विधियों से जोड़ने में महीनों का समय लगता था, एआई उन्हें न्यूनतम समय में सुलझाने में सक्षम है। हालांकि, न्यायालय में किसी भी साक्ष्य की ग्राह्यता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे खोजने में कितनी आधुनिक तकनीक प्रयुक्त हुई है, बल्कि साक्ष्य की मूल प्रामाणिकता, अखंडता (चेन ऑफ कस्टडी) और जांच प्रक्रिया की विधिक विश्वसनीयता ही अंतिम निर्णय का आधार बनती है।

फिंगरप्रिंट से डीएनए तक, फॉरेंसिक के हर स्तर पर तकनीक की मदद

फॉरेंसिक जांच में एआई के बढ़ते अनुप्रयोगों का उल्लेख करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि अपराध स्थल से साक्ष्य संकलन से लेकर डिजिटल डिवाइसों की पड़ताल तक एआई बेहद उपयोगी है:

  • सीसीटीवी और विजुअल साक्ष्य: निम्न गुणवत्ता वाले सीसीटीवी फुटेज का ऑटोमैटिक रेजोल्यूशन सुधारने, चेहरे और संदिग्ध वस्तुओं की त्वरित पहचान करने में।

  • बायोमेट्रिक मिलान: लाखों फिंगरप्रिंट्स और जटिल डीएनए नमूनों की बड़े डेटाबेस से सटीक व तीव्र तुलना करने में।

  • ऑडियो व वॉयस एनालिसिस: ध्वनि तरंगों की सूक्ष्म जांच, पृष्ठभूमि के शोर को हटाने और आवाज के नमूनों का वैज्ञानिक मिलान करने में।

  • क्राइम मैपिंग और पैटर्न ट्रैकिंग: अलग-अलग थाना क्षेत्रों अथवा जनपदों में घटित अपराधों के तौर-तरीकों (मोडस ऑपरेंडी) के बीच संबंध तलाशने में।

तकनीकी गति के साथ प्रामाणिकता और मानवीय निगरानी अनिवार्य

सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने तकनीक के अंधानुकरण के प्रति सचेत भी किया। उन्होंने कहा कि गति कभी भी सटीकता का स्वतः प्रमाण नहीं हो सकती। एआई प्रणालियां एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह (बायस) या गलत डेटा फीडिंग के कारण भ्रामक निष्कर्ष भी दे सकती हैं। इसके अलावा, डिजिटल साक्ष्यों में छेड़छाड़ या डीपफेक जैसी चुनौतियों के दौर में एआई से मिले निष्कर्षों की स्वतंत्र स्रोतों और मूल भौतिक साक्ष्यों से पुष्टि करना आवश्यक है। जांच एजेंसियों को उपयोग में लाए गए सॉफ्टवेयर, डेटासेट और परीक्षण पद्धति का संपूर्ण ऑडिट रिकॉर्ड संधारित करना होगा।

पैनल का सर्वसम्मत निष्कर्ष रहा कि फॉरेंसिक विज्ञान में एआई की वास्तविक सफलता मानवीय विशेषज्ञता को प्रतिस्थापित करने में नहीं, बल्कि जांचकर्ताओं की विश्लेषणात्मक क्षमता को सशक्त व सुदृढ़ करने में निहित है। जब तक विश्वसनीय डेटा, प्रमाणित उपकरण, प्रशिक्षित फॉरेंसिक वैज्ञानिक और कानूनी जवाबदेही एक साथ कार्य करेंगे, तभी न्याय प्रणाली में एआई का उपयोग सार्थक और सुरक्षित सिद्ध होगा।

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