Lohia Law University: यूपी में ‘रूल ऑफ माफिया’ मिटाकर स्थापित किया ‘रूल ऑफ लॉ’: सीएम योगी
डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पांचवें दीक्षांत समारोह में बोले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, युवा विधिवेत्ताओं से संवैधानिक मूल्यों और निष्पक्षता के प्रति प्रतिबद्ध रहने का किया आह्वान
- यूपी में ‘रूल ऑफ माफिया’ मिटाकर स्थापित किया ‘रूल ऑफ लॉ’: मुख्यमंत्री
- डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पांचवें दीक्षांत समारोह में बोले सीएम योगी आदित्यनाथ
- कानून की सबसे बड़ी पूंजी उसकी धाराएं नहीं, बल्कि आमजन का विश्वास है: सीएम योगी
- एआई को सहायक बनाइए, सारथी नहीं, मशीन सुझाव दे सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय मनुष्य के विवेक से होना चाहिए
- विकसित भारत की पैरवी के लिए युवा विधिवेत्ताओं को सत्य, धर्म, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आह्वान
- मुख्यमंत्री ने युवा विधिवेत्ताओं से कहा- फैसला इतिहास सुनाएगा, लेकिन बहस आपको करनी है
लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पहले माफियाराज का प्रभाव था, लेकिन अब प्रदेश में रूल ऑफ लॉ यानी कानून का राज स्थापित किया गया है। यही विकास, निवेश और आमजन के विश्वास की सबसे मजबूत नींव है। एक समय यूपी को बीमारू राज्यों की श्रेणी में रखा जाता था, निवेश तथा कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रभावी कार्ययोजना से प्रदेश ने अपनी स्थिति बदली है। आज उत्तर प्रदेश देश की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और रेवेन्यू सरप्लस स्टेट के रूप में आगे बढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री शनिवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के पांचवें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने युवा विधि स्नातकों से कहा कि वे कानून को केवल धाराओं और मुकदमों तक सीमित न रखें, बल्कि आम नागरिक के विश्वास, अधिकारों की रक्षा और न्याय की सुलभता को अपने कार्य का आधार बनाएं। विकसित भारत की कल्पना केवल सड़कों, कारखानों और एक्सप्रेसवे के निर्माण से साकार नहीं होगी। इसके लिए न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों पर आधारित व्यवस्था को मजबूत करना होगा। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को बिना भेदभाव सहज और सुलभ न्याय मिलना चाहिए। कानून की सबसे बड़ी पूंजी उसकी धाराएं नहीं, बल्कि आमजन का विश्वास है। यह विश्वास निष्पक्षता, पीड़ित के सम्मान और विधिवेत्ताओं के आचरण से मजबूत होता है। विधिवेत्ताओं को सत्य, धर्म, निष्पक्षता और संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखनी होगी।
- पहले यूपी को लेकर थी नकारात्मक धारणा
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2017 से पहले प्रदेश को लेकर यह धारणा थी कि यहां निवेश सुरक्षित नहीं है, कनेक्टिविटी कमजोर है और विकास की संभावनाएं सीमित हैं। सबको यही लगता था कि उत्तर प्रदेश नहीं सुधर सकता। इस सोच को बदलने के लिए इच्छाशक्ति और परिणाम देने वाली कार्ययोजना जरूरी थी। प्रदेश में कानून का राज स्थापित करना इसी परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमने प्रदेश को माफियाराज से मुक्त कर कानून का शासन स्थापित किया। पहले हाल यह था कि प्रयागराज के एक माफिया के सामने प्रशासनिक और संवैधानिक पदों से जुड़े लोगों के काफिले तक रुक जाते थे। लेकिन, अब कानून के राज में प्रदेश विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है।

- ‘विकसित भारत’ 2047 की पैरवी करेंगे विधि विद्यार्थी
मुख्यमंत्री ने इस दीक्षांत समारोह को एक काल्पनिक मुकदमे के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि यदि ‘विकसित भारत 2047’ एक केस है, तो 140 करोड़ भारतीय उसके याची हैं और युवा विधिवेत्ता उनके अधिवक्ता हैं। इस मुकदमे में तथ्य, साक्ष्य, तर्क और ईमानदार पैरवी की आवश्यकता होगी। इसका प्रतिवादी कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वह यथास्थितिवादी सोच है, जो यह मानने को तैयार नहीं होती कि परिवर्तन संभव है।
- मई 2014 के बाद देश में सुधारों को गति
सीएम योगी ने कहा कि देश की स्वतंत्रता, संविधान का लागू होना, आपातकाल, न्यायपालिका के ऐतिहासिक निर्णयों और देश में हुए सुधारों को हमारी यात्रा की महत्वपूर्ण तिथियों के रूप में देखा जा सकता है। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। 25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने की घटना ने ‘रूल ऑफ लॉ’ और ‘रूलर के लॉ’ के बीच का अंतर स्पष्ट किया। मई 2014 के बाद देश में सुधारों की प्रक्रिया को गति मिली। अप्रासंगिक हो चुके 1,500 से अधिक कानून समाप्त किए गए। जन विश्वास अधिनियम के माध्यम से 42 कानूनों के 183 प्रावधानों में छोटी-छोटी चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, जीएसटी, अनुच्छेद 370 से संबंधित बदलाव और नारी शक्ति वंदन अधिनियम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सुधार का अर्थ केवल नए कानून बनाना नहीं, बल्कि उन पुराने कानूनों को हटाना भी है जिनकी प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है।
- 2029-30 तक वन ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2013 में भारत को दुनिया की पांच नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था, जबकि आज वह दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। इस बदलाव ने भारत के प्रति वैश्विक विश्वास को मजबूत किया है। इसी तरह यूपी को अब वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए विजन डॉक्यूमेंट जारी किया गया है और कार्ययोजना लागू की गई है। उन्होंने विश्वास जताया कि वर्ष 2029-30 तक यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा। कहा कि प्रदेश की आर्थिक प्रगति और विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कानून के शासन, निष्पक्षता और आमजन के विश्वास को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। पीड़ित को सम्मान देना और न्याय को सुलभ बनाना इस विश्वास के प्रमुख आधार हैं।
- एआई सहायक बने, अंतिम निर्णय मनुष्य के विवेक से हो
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की भूमिका पर मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीक ने अपराध और साक्ष्य, दोनों का स्वरूप बदल दिया है। एआई ने शोध, आंकड़ों के विश्लेषण और संभावित परिणामों के आकलन को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। डीपफेक के माध्यम से किसी व्यक्ति का चेहरा और आवाज इस तरह प्रस्तुत की जा सकती है कि देखने-सुनने वाला उसे वास्तविक मान ले। ऐसे में डिजिटल साक्ष्य की प्रामाणिकता की वैज्ञानिक जांच करना आवश्यक होगा। जब किसी दूसरे देश में बैठा अपराधी किसी व्यक्ति की जीवनभर की कमाई एक झटके में उड़ा लेता है, तो उसकी पहचान और उस तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इन परिस्थितियों में युवा विधिवेत्ताओं को तकनीक और कानून, दोनों की समझ विकसित करनी होगी।
- सभी 75 जनपदों में साइबर थाने स्थापित
मुख्यमंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जनपदों में साइबर थाने स्थापित किए गए हैं। प्रदेश के 1,583 थानों में साइबर हेल्प डेस्क की व्यवस्था की गई है। राज्य में फॉरेंसिक संस्थान भी स्थापित किया गया है। एआई प्रज्ञा कार्यक्रम के माध्यम से 10 लाख युवाओं को एआई, डेटा एनालिटिक्स और साइबर सिक्योरिटी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। नए आपराधिक कानूनों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को मान्यता दी गई है। सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले मामलों में फॉरेंसिक जांच अनिवार्य है।

सीएम ने कहा कि एआई न्यायाधीश या विधिवेत्ता के विवेक का विकल्प नहीं हो सकता। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान देने के बाद निर्णय लेने का अधिकार उनके विवेक पर छोड़ते हैं। इसी भाव को आज की तकनीकी भाषा में ‘ह्यूमन इन द लूप’ कहा जा सकता है। मशीन सुझाव दे सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा। एआई को सहायक बनाइए, सारथी नहीं। सारथी आपका विवेक और धर्म होना चाहिए। मशीन ड्राफ्ट तैयार कर सकती है, लेकिन उसमें लापरवाही की कीमत कोई निर्दोष व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता से चुका सकता है। इसलिए मशीन कोड लिख सकती है, लेकिन कोड ऑफ कंडक्ट का पालन विधिवेत्ता को ही करना होगा।
- अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की खुशहाली ही विकास की कसौटी
मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित भारत की वास्तविक कसौटी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन में आने वाला बदलाव है। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय के माध्यम से इसी भावना को व्यक्त किया। विकास का आकलन सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि सबसे नीचे खड़े व्यक्ति की स्थिति से किया जाना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी” स्पष्ट करती है कि शासन और व्यवस्था की सार्थकता जनकल्याण में निहित है।
- युवा विधि स्नातकों से सीएम के चार आग्रह
मुख्यमंत्री ने युवा विधि स्नातकों के सामने चार प्रमुख आग्रह रखे। पहला, वे अन्याय के सामने मूक दर्शक न बनें, बल्कि न्याय की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाएं। दूसरा, अपनी जड़ों और गांवों से जुड़े रहें तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन और परिवार से संबंधित छोटे विवादों के समाधान में योगदान दें। तीसरा, नैतिक चरित्र और पेशेवर साख को सुरक्षित रखें तथा किसी भी अनुचित समझौते या शॉर्टकट से बचें। चौथा, नए कानूनों, न्यायिक निर्णयों और संशोधनों के प्रति स्वयं को लगातार अपडेट रखें और स्वाध्याय की आदत विकसित करें। सत्य बोलना, धर्म का आचरण करना और स्वाध्याय में आलस्य न करना किसी भी अधिवक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य हैं।
- 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास की जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री ने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को बधाई देते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह अभिभावकों के वर्षों के त्याग, प्रार्थनाओं और परिश्रम के साकार होने का अवसर है। विद्यार्थियों की डिग्री के पीछे उनके अभिभावकों की अनगिनत जागी हुई रातें और कठिन परिस्थितियों में किया गया संघर्ष है। युवा स्नातक अपनी डिग्री को केवल शैक्षणिक योग्यता का प्रमाणपत्र न मानें, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के विश्वास के प्रतीक के रूप में देखें। जब भी कोई मुकदमा कठिन लगे या किसी निर्णय का दायित्व भारी महसूस हो, तब भारत के संविधान को अपना मार्गदर्शक बनाएं। फैसला इतिहास सुनाएगा, लेकिन बहस आपको करनी है।
इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली, उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अमर पाल सिंह, विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मनीष सिंह, विश्वविद्यालय के कुलसचिव केशव कुमार व अन्य गण्यमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
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