पश्चिम बंगाल में CBI के हाथ खोले, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने केंद्रीय एजेंसी के लिए 'जनरल कंसेंट' किया बहाल
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य में शुचिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अत्यंत ऐतिहासिक
- भ्रष्टाचार के मामलों पर त्वरित कार्रवाई के लिए राज्य सरकार का बड़ा फैसला, केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ बिना बाधा शुरू हो सकेगी सीधी जांच
- वर्ष 2018 में पूर्ववर्ती सरकार द्वारा लगाई गई कानूनी पाबंदी प्रभावी रूप से समाप्त, प्रादेशिक लोक सेवकों के लिए पूर्व अनुमति का नियम रहेगा बरकरार
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य में शुचिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अत्यंत ऐतिहासिक और दूरगामी नीतिगत फैसला लिया गया है। राज्य के नवनिवेशित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नवनिर्वाचित राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के लिए 'जनरल कंसेंट' यानी सामान्य सहमति को पूरी तरह से बहाल कर दिया है। सरकार द्वारा जारी की गई नई आधिकारिक अधिसूचना के बाद अब देश की यह शीर्ष केंद्रीय जांच एजेंसी बिना किसी प्रादेशिक बाधा या राजनीतिक अनुमति के राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर अपने वैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर सकेगी। इस क्रांतिकारी और बड़े नीतिगत फैसले को राज्य के भीतर संस्थागत भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने और केंद्रीय जांच प्रणालियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने की दिशा में वर्तमान सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का एक बेहद अहम हिस्सा माना जा रहा है।
इस बड़े फैसले के लागू होते ही पश्चिम बंगाल के भीतर वर्ष 2018 से चली आ रही एक दीर्घकालिक और अत्यंत विवादित प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभावी रूप से अंत हो गया है। पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने सोलह नवंबर दो हजार अट्ठारह को एक कड़ा राजनीतिक और कानूनी निर्णय लेते हुए सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति को पूरी तरह वापस ले लिया था। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम, 1946 की धारा 6 के तहत किए गए उस पुराने फैसले के कारण केंद्रीय एजेंसी के हाथ पूरी तरह बंध गए थे, क्योंकि उसे राज्य के भीतर किसी भी नए भ्रष्टाचार के मामले की जांच शुरू करने, छापेमारी करने या प्राथमिक दर्ज करने से पहले प्रत्येक मामले के लिए राज्य सरकार से अलग-अलग और विशिष्ट रूप से औपचारिक अनुमति लेनी पड़ती थी। इस पुरानी विधिक पाबंदी के समाप्त होने से अब जांच की प्रक्रिया में होने वाली प्रशासनिक देरी और फाइलों के चक्कर पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे।
नई प्रशासनिक व्यवस्था और विधिक अधिसूचना के प्रावधानों को देखा जाए तो सरकार ने इसमें बेहद कूटनीतिक और स्पष्ट संतुलन बनाने का प्रयास किया है, जिसके तहत क्षेत्राधिकार को दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है। नए नियमों के अनुसार, पश्चिम बंगाल के भीतर विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, रेलवे, डाक विभाग और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में तैनात सभी श्रेणी के केंद्रीय अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ यदि भ्रष्टाचार की कोई शिकायत मिलती है, तो सीबीआई उनके खिलाफ बिना किसी प्रादेशिक हस्तक्षेप के सीधे मुकदमा दर्ज कर त्वरित दंडात्मक कार्रवाई कर सकेगी। हालांकि, इसके समानांतर राज्य सरकार के सीधे नियंत्रण में काम करने वाले प्रादेशिक लोक सेवकों, राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है; उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक जांच या चार्जशीट दाखिल करने से पूर्व अभी भी राज्य प्रशासन से औपचारिक अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) और अनुमति प्राप्त करना कानूनी रूप से अनिवार्य बना रहेगा। देश की संघीय व्यवस्था में केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई अपनी शक्तियां दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम से प्राप्त करती है। कानून के मुताबिक, किसी भी राज्य की सीमा के भीतर जांच करने के लिए राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य होती है। देश के ग्यारह से अधिक राज्यों ने समय-समय पर केंद्रीय सत्ता से राजनीतिक मतभेदों के चलते इस सहमति को वापस लिया था, जिसके कारण सैकड़ों गंभीर और अंतर-राज्यीय वित्तीय घोटालों की फाइलें लंबे समय से धूल फांक रही थीं और जांच की गति पूरी तरह से अवरुद्ध हो चुकी थी।
इस ऐतिहासिक प्रशासनिक निर्णय की तात्कालिक आवश्यकता और पृष्ठभूमि पर दृष्टि डाली जाए तो राज्य में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुए कई बड़े भर्ती घोटालों और सहकारी घोटालों ने पूरे राज्य के बुनियादी ढांचे को झकझोर कर रख दिया था। शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर पालिका भर्ती घोटाला और विभिन्न कॉपरेटिव सोसायटियों में हुए कथित वित्तीय गबन के मामलों की जांच अदालती आदेशों के कारण केंद्रीय एजेंसियां कर तो रही थीं, लेकिन सामान्य सहमति न होने से उन्हें नए सह-आरोपियों और भ्रष्ट लोक सेवकों के खिलाफ सीधे कार्रवाई करने में भारी विधिक अड़चनों का सामना करना पड़ रहा था। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने स्वयं इस बात पर विशेष बल दिया है कि पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा जांच पर लगाई गई पाबंदी असल में जनहित में नहीं थी, बल्कि उसका एकमात्र गुप्त उद्देश्य बड़े और रसूखदार भ्रष्ट चेहरों तथा नौकरशाहों को कानूनी शिकंजे से बचाना था, जिसे अब किसी भी कीमत पर जारी नहीं रहने दिया जा सकता।
प्रशासनिक सुधारों की इस कड़ी में राज्य सरकार ने केवल सीबीआई को खुली छूट ही नहीं दी है, बल्कि इसके समानांतर संस्थागत भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ हुए पुराने अपराधों की तह तक जाने के लिए दो अत्यंत उच्च स्तरीय विशेष जांच पैनलों का भी गठन कर दिया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के कुशल नेतृत्व में काम करने वाले ये विशेष आयोग राज्य में पूर्व में हुए प्रशासनिक कदाचारों, 'कट मनी' संस्कृति और विभिन्न विभागों में हुए वित्तीय लेन-देन की गहनता से स्क्रूटनी करेंगे। इन आयोगों के गठन और सीबीआई की बहाली को एक साझा रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिससे राज्य के प्रशासनिक अमले और नौकरशाही के भीतर एक स्पष्ट संदेश गया है कि कर्तव्य निर्वहन के दौरान किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमिता पाए जाने पर उन्हें किसी भी प्रकार का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नहीं होगा।
इस बड़े नीतिगत फैसले को लेकर राज्य के सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्रों से भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, क्योंकि केंद्रीय कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों में होने वाले भ्रष्टाचार का सीधा असर राज्य के औद्योगिक विकास और निवेश के माहौल पर पड़ता था। कोयला सिंडिकेट, मवेशी तस्करी और सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाले अवैध कारोबारों की जांच में अब केंद्रीय सुरक्षा बलों और सीबीआई के बीच एक बेहतर और सीधा कूटनीतिक समन्वय स्थापित हो सकेगा, जिससे राजस्व की चोरी को प्रभावी रूप से रोका जा सकेगा। राज्य के वित्त और गृह विभागों को भी निर्देश जारी किए गए हैं कि वे केंद्रीय एजेंसियों द्वारा मांगी जाने वाली आवश्यक भू-अभिलेखों की प्रतियां और डिजिटल डेटा बिना किसी देरी के त्वरित गति से उपलब्ध कराएं ताकि विधिक प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सके।
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