Special Article: धनतेरस- आरोग्य, समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का महापर्व
भारतीय संस्कृति में धन की सार्थकता उसके संचय में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग में; जीवन की सार्थकता उसकी दीर्घता में नहीं, बल्कि
लेखक- कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
भारतीय संस्कृति में धन की सार्थकता उसके संचय में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग में; जीवन की सार्थकता उसकी दीर्घता में नहीं, बल्कि उसके आरोग्य एवं सदाचार में; और उत्सव की सार्थकता बाह्य आडंबर में नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता में निहित है। धनतेरस इसी उदात्त जीवन-दर्शन का पावन पर्व है। यह वह सांस्कृतिक वेला है, जब दीपावली के मंगलोत्सव का प्रथम आलोक घर-आंगन में उतरता है और भारतीय जनमानस आरोग्य, ऐश्वर्य, आयु तथा सुख-समृद्धि की मंगलकामना से अनुप्राणित हो उठता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल स्वर्ण, रजत अथवा नवीन वस्तुओं के क्रय का अवसर नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक धन को पहचानने का आध्यात्मिक आमंत्रण है। भगवान धन्वंतरि के अमृतकलश में आरोग्य का संदेश, माता लक्ष्मी की उपासना में श्रम और सदाचार से अर्जित समृद्धि का आदर्श तथा यमदीपदान में जीवन के प्रति अटूट आस्था का प्रकाश समाहित है। इस पर्व की अंतर्ध्वनि मानो उद्घोष करती है कि स्वस्थ शरीर, संतुष्ट मन, सदाचारी आचरण और संवेदनशील समाज से बढ़कर कोई संपदा नहीं। जब धन के साथ धर्म, समृद्धि के साथ सेवा और आस्था के साथ विवेक का समन्वय होता है, तभी जीवन में वास्तविक मंगल का अवतरण होता है।
धनतेरस की पौराणिक महत्ता का सर्वाधिक मनोहारी आधार क्षीरसागर के समुद्र मंथन का आख्यान है। श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण सहित विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इस प्रसंग में देवताओं और असुरों द्वारा अमृत की प्राप्ति के लिए किए गए मंथन का विस्तृत वर्णन मिलता है। महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण देवताओं का ऐश्वर्य और तेज क्षीण हो गया था। पराजित एवं शक्तिहीन देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ग्रहण की। भगवान ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने और उससे प्राप्त अमृत के माध्यम से सामर्थ्य पुनः प्राप्त करने का उपाय बताया। मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को नेती बनाकर समुद्र मंथन आरंभ हुआ। भगवान विष्णु ने कूर्मावतार धारण कर मंदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया, जिससे मंथन की प्रक्रिया निर्बाध चल सके।
समुद्र मंथन से क्रमशः अनेक दिव्य रत्नों और विभूतियों का प्राकट्य हुआ। लक्ष्मी, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ मणि तथा अन्य दिव्य पदार्थों के साथ अमृत की प्राप्ति की अभिलाषा ने देवताओं और असुरों को निरंतर मंथन के लिए प्रेरित किया। इसी पौराणिक परंपरा में भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य विशेष महत्त्व रखता है। वे अमृतकलश धारण किए हुए प्रकट हुए और आयुर्वेद की दिव्य परंपरा के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनके प्राकट्य का स्मरण धनतेरस पर आरोग्य और दीर्घजीवन की मंगलकामना से किया जाता है। समुद्र मंथन का यह आख्यान प्रतीकात्मक रूप से यह भी बताता है कि जीवन में अमृत की प्राप्ति के लिए मंथन अनिवार्य है। जैसे समुद्र से अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों को श्रम करना पड़ा, वैसे ही जीवन में स्वास्थ्य, ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति के लिए अनुशासन, परिश्रम तथा निरंतर साधना आवश्यक है।
भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य भारतीय चिकित्सा परंपरा के गौरव का भी स्मरण कराता है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य को केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, इंद्रियों, मन और आत्मा के संतुलित एवं प्रसन्न स्वरूप से जोड़ा गया है। आहार-विहार की मर्यादा, ऋतुचर्या, स्वच्छता, संयम और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्वस्थ जीवन के प्रमुख आधार माने गए हैं। आज जब अनियमित दिनचर्या, मानसिक तनाव और जीवनशैली से संबंधित रोग मानव समाज के सामने गंभीर चुनौती बन रहे हैं, तब धन्वंतरि की आरोग्यपरक चेतना और भी प्रासंगिक हो उठती है। उनके प्रति श्रद्धा का वास्तविक अर्थ केवल पूजन-अर्चन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायित्व, चिकित्सा के प्रति जागरूकता और जीवन में संयम का समावेश है। आरोग्य ही वह आधार है, जिस पर मनुष्य अपने पारिवारिक दायित्वों, सामाजिक कर्तव्यों और आध्यात्मिक साधना का निर्वहन कर सकता है।
धनतेरस की सांस्कृतिक चेतना का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष माता लक्ष्मी की उपासना है। समुद्र मंथन के पौराणिक आख्यान में देवी लक्ष्मी के प्राकट्य को ऐश्वर्य, सौंदर्य, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना गया है। देवी लक्ष्मी के हाथों में कमल उनकी निर्मलता और वैभव के बीच अनासक्ति का बोध कराता है। उनका पूजन इस विश्वास की अभिव्यक्ति है कि समृद्धि का स्थायी निवास वहीं होता है, जहां परिश्रम का सम्मान, सदाचार का पालन और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग होता है। लक्ष्मी की आराधना का अर्थ केवल धन की प्राप्ति की कामना करना नहीं, बल्कि धन को धर्मसम्मत मार्ग से अर्जित करने और उसका उपयोग लोककल्याण में करने का संकल्प भी है। अन्याय, छल और शोषण से प्राप्त संपत्ति बाहरी वैभव तो दे सकती है, किंतु अंतःकरण को शांति प्रदान नहीं कर सकती। भारतीय जीवन-दर्शन में लक्ष्मी और नारायण की संयुक्त अवधारणा इसी तथ्य की ओर संकेत करती है कि ऐश्वर्य का संबंध धर्म और मर्यादा से विच्छिन्न नहीं होना चाहिए।
धनतेरस पर स्वर्ण, रजत, धातु के पात्र और नवीन घरेलू वस्तुएं खरीदने की परंपरा इसी मंगलभावना की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। किंतु वर्तमान उपभोक्तावादी परिवेश में इस परंपरा का विवेकपूर्ण निर्वाह आवश्यक है। उत्सव की सार्थकता अनावश्यक खर्च अथवा आर्थिक प्रदर्शन में नहीं, बल्कि सामर्थ्य के अनुरूप आवश्यक वस्तुओं की खरीद, स्थानीय कारीगरों के प्रोत्साहन और परिश्रम से अर्जित धन के सदुपयोग में है। सच्ची समृद्धि वस्तुओं की अधिकता से नहीं, बल्कि संतुलित आवश्यकताओं, आर्थिक अनुशासन और संतोषपूर्ण जीवन से पुष्ट होती है।
इस पर्व की एक अन्य महत्त्वपूर्ण परंपरा यमदीपदान है। लोकमान्यता के अनुसार, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की संध्या को घर के बाहर दीप प्रज्वलित कर यमराज से परिवार के सदस्यों की मंगलकामना की जाती है। इससे संबद्ध एक प्रचलित कथा राजा हेम के पुत्र से जुड़ी है। कथा के अनुसार, ज्योतिषीय गणना में राजकुमार की मृत्यु विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से होने की आशंका व्यक्त की गई थी। नियत समय आने पर उसकी पत्नी ने अपने पति की रक्षा का संकल्प लिया। उसने घर के द्वार पर स्वर्णाभूषणों और आभूषणों का ढेर लगा दिया, असंख्य दीप प्रज्वलित किए और रात्रि भर गीत-संगीत के माध्यम से जागरण करती रही। जब यमराज सर्प के रूप में वहां पहुंचे, तो दीपों की आभा और स्वर्णाभूषणों की चमक से उनकी दृष्टि विचलित हुई। वे राजकुमार के प्राण नहीं ले सके और रात्रि व्यतीत होने पर लौट गए। इस प्रकार राजकुमार का जीवन सुरक्षित रहने की कथा लोकमानस में प्रचलित हुई। यद्यपि यह आख्यान लोकपरंपरा में विभिन्न रूपों में मिलता है, किंतु इसका मूल संदेश आशा, सजगता, प्रेम और मंगलकामना की महत्ता में निहित है। यमदीपदान मृत्यु के भय के बीच जीवन के प्रति श्रद्धा और प्रकाश के प्रति विश्वास का प्रतीक बन जाता है।
धनतेरस का सामाजिक एवं पारिवारिक पक्ष भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। घरों की स्वच्छता, दीपों की सज्जा, परिजनों का मिलन और परस्पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान इस पर्व को आत्मीयता प्रदान करते हैं। भारतीय संस्कृति में धन की सर्वोच्च सार्थकता दान, सेवा और परोपकार से जुड़ी है। यदि इस अवसर पर संपन्न परिवार जरूरतमंदों की सहायता करें, रोगियों की सेवा करें, निर्धन बच्चों की शिक्षा में योगदान दें और श्रमिकों के श्रम का सम्मान करें, तो उत्सव का प्रकाश समाज के वंचित वर्गों तक भी पहुंच सकता है। समृद्धि तभी मंगलकारी होती है, जब वह केवल व्यक्ति अथवा परिवार तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक कल्याण का माध्यम बने।
वस्तुतः धनतेरस आरोग्य, समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का ऐसा महापर्व है, जो मनुष्य को जीवन के वास्तविक धन की पहचान कराता है। भगवान धन्वंतरि का अमृतकलश स्वास्थ्य का संदेश देता है, माता लक्ष्मी की आराधना धर्मसम्मत समृद्धि का आदर्श प्रस्तुत करती है और यमदीपदान जीवन के प्रति आशा तथा मंगलकामना का आलोक प्रज्वलित करता है। इस पर्व की वास्तविक सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब हमारे घरों के साथ-साथ विचारों में भी स्वच्छता हो, धन के साथ विवेक हो, समृद्धि के साथ संवेदना हो और आस्था के साथ लोककल्याण की भावना जुड़ी हो। दीपावली का प्रथम दीप तभी अपने उद्देश्य को पूर्ण करेगा, जब उसका प्रकाश अभाव, अज्ञान, अस्वस्थता और सामाजिक संवेदनहीनता के अंधकार को दूर करने का संकल्प बने। यही धनतेरस का सनातन संदेश, भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक गरिमा और समृद्ध जीवन की वास्तविक आधारशिला है।
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