कोरियोग्राफर से बेहतरीन डायरेक्टर बनीं फराह खान की वो चार बड़ी फिल्में, जिन्होंने बड़े पर्दे पर रचा नया इतिहास
भारतीय हिंदी सिनेमा जगत में एक सफल नृत्य निर्देशिका यानी कोरियोग्राफर के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाने के बाद फिल्म
- सिनेमाघरों में असफल होने के बावजूद दर्शकों के दिलों में कल्ट क्लासिक बन गई फराह खान की एक बेहद खास और अनोखी फिल्म
- बॉलीवुड को मसाला और भव्य सिनेमा का असली स्वाद चखाने वाली फराह खान की चुनिंदा कल्ट फिल्में, आज भी हैं सबकी पसंदीदा
भारतीय हिंदी सिनेमा जगत में एक सफल नृत्य निर्देशिका यानी कोरियोग्राफर के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाने के बाद फिल्म निर्देशन की कमान संभालने वाली फराह खान का नाम बेहद आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने पूरे करियर में बहुत अधिक फिल्मों का निर्देशन भले ही न किया हो, लेकिन उन्होंने जितनी भी फिल्में दर्शकों के सामने परोसी हैं, वे सभी अपनी भव्यता, बेहतरीन संगीत और बेजोड़ कहानी के दम पर मील का पत्थर साबित हुई हैं। फराह खान के निर्देशन की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि वे बड़े पर्दे पर सिनेमा के उस पारंपरिक और क्लासिक दौर को वापस लेकर आती हैं, जिसमें भरपूर मनोरंजन, ड्रामा, कॉमेडी और इमोशन का एकदम सटीक मिश्रण होता है। उनके इसी खास हुनर के चलते उनकी बनाई फिल्मों को आज भी कल्ट क्लासिक का दर्जा दिया जाता है, जिन्हें दर्शक टीवी या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बार-बार देखना पसंद करते हैं। उनके फिल्मी सफर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनकी सूची में एक ऐसी फिल्म भी शामिल है, जिसे थियेटर रिलीज के समय बॉक्स ऑफिस पर असफलता का स्वाद चखना पड़ा था, लेकिन समय बीतने के साथ वह फिल्म दर्शकों के बीच इस कदर लोकप्रिय हुई कि आज उसे एक आइकॉनिक कल्ट फिल्म माना जाता है।
फराह खान के निर्देशन करियर की शुरुआत साल 2004 में हुई एक बेहद धमाकेदार और ऐतिहासिक फिल्म 'मै हूं ना' से हुई थी, जिसने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिका में सुपरस्टार शाहरुख खान नजर आए थे और उनके साथ सुष्मिता सेन, जायद खान और अमृता राव की जोड़ी ने बड़े पर्दे पर कमाल कर दिया था। यह फिल्म मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के बीच शांति संबंधों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी, जिसमें एक सैनिक के पारिवारिक रिश्तों और कॉलेज लाइफ के हल्के-फुल्के मनोरंजन को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया था। 'मैं हूं ना' के जरिए फराह खान ने यह साबित कर दिया था कि वे न केवल गानों को बेहतरीन तरीके से कोरियोग्राफ कर सकती हैं, बल्कि एक बड़े कैनवास की कहानी को पूरी भव्यता और सलीके के साथ पर्दे पर उतारने का हुनर भी रखती हैं। इस फिल्म के गाने, एक्शन सीक्वेंस और कॉलेज के रोमांटिक दृश्य आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और इसे फराह खान के करियर की सबसे बेहतरीन शुरुआत माना जाता है।
कल्ट सिनेमा का असली जादू
फराह खान के सिनेमा की यह सबसे बड़ी खूबी रही है कि वे मुख्यधारा के कमर्शियल सिनेमा को भी एक क्लासिक टच देने में माहिर हैं। उनकी फिल्मों के डायलॉग्स, किरदारों के पहनावे और बैकग्राउंड स्कोर को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि वे दर्शकों के दिमाग पर एक गहरी और अमिट छाप छोड़ जाते हैं। यही वजह है कि उनकी फिल्में सालों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक और मनोरंजक लगती हैं, जितनी वे अपनी रिलीज के समय लगती थीं।
'मैं हूं ना' की अपार सफलता के बाद फराह खान ने साल 2007 में एक बार फिर शाहरुख खान के साथ मिलकर सिनेमा प्रेमियों को 'ओम शांति ओम' जैसी एक बेहद भव्य और यादगार फिल्म का तोहफा दिया। यह फिल्म पुनर्जन्म की कहानी पर आधारित थी, जिसमें सत्तर के दशक के बॉलीवुड और आधुनिक दौर के सिनेमा के अंतर को बेहद शानदार तरीके से रुपहले पर्दे पर दिखाया गया था। इसी फिल्म के जरिए बॉलीवुड को दीपिका पादुकोण जैसी बेहतरीन और टॉप की अभिनेत्री मिली, जिन्होंने शांतिप्रिया के किरदार में अपनी एक्टिंग और खूबसूरती से देश भर के दर्शकों को अपना दीवाना बना लिया था। 'ओम शांति ओम' अपने समय की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक साबित हुई थी, जिसके गाने जैसे 'आंखों में तेरी' और 'दर्द-ए-डिस्को' आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं। इसके अलावा, फिल्म का एक गाना 'दीवानगी दीवानगी' विशेष रूप से चर्चा में रहा था, जिसमें फराह खान ने बॉलीवुड के लगभग 31 बड़े सितारों को एक साथ एक ही फ्रेम में नचाकर एक नया इतिहास रच दिया था।
इन दो लगातार सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर फिल्मों के बाद साल 2010 में फराह खान ने एक बिल्कुल अलग मिजाज की कॉमेडी फिल्म बनाई, जिसका नाम था 'तीस मार खां'। इस फिल्म में अक्षय कुमार और कैटरीना कैफ ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं और इसकी कहानी एक ऐसे शातिर चोर के इर्द-गिर्द घूमती थी जो एक पूरी फिल्म की शूटिंग का नाटक रचकर एक ट्रेन को लूटने की योजना बनाता है। जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो समीक्षकों और आम दर्शकों ने इसके अनोखे ह्यूमर को पूरी तरह से नकार दिया, जिसके चलते यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुई। हालांकि, इस फिल्म का एक गाना 'शीला की जवानी' बेहद बड़ा चार्टबस्टर साबित हुआ था, जिसने कैटरीना कैफ के करियर को एक नई ऊंचाई दी थी। लेकिन थियेटरों में फ्लॉप होने के सालों बाद, जब यह फिल्म टेलीविजन और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित होना शुरू हुई, तो इसके मीम्स, मजाकिया डायलॉग्स और अजीबो-गरीब किरदारों को लोगों ने खूब पसंद करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इस फिल्म को एक अलग नजरिए से देखा जाने लगा और आज यह फिल्म फराह खान की सबसे बड़ी आइकॉनिक कल्ट फ्लॉप फिल्मों की सूची में शीर्ष पर शुमार है।
अपनी तीसरी फिल्म के इस उतार-चढ़ाव भरे अनुभव के बाद फराह खान ने साल 2014 में एक बार फिर अपनी पसंदीदा जोड़ी यानी शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण के साथ वापसी की और 'हैप्पी न्यू ईयर' जैसी एक मल्टीस्टारर फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म में इन दोनों सितारों के अलावा अभिषेक बच्चन, सोनू सूद, बोमन ईरानी और विवान शाह जैसे दिग्गज कलाकार भी मुख्य भूमिकाओं में शामिल थे। यह फिल्म मूल रूप से एक हीस्ट-कॉमेडी (डकैती पर आधारित कॉमेडी) थी, जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी डांस प्रतियोगिता की आड़ में हीरों की चोरी करने की एक बेहद दिलचस्प और मजेदार साजिश दिखाई गई थी। यद्यपि कुछ फिल्म समीक्षकों ने इसकी कहानी और तार्किकता पर सवाल उठाए थे, लेकिन आम जनता ने इस फिल्म को अपना भरपूर प्यार दिया। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर छप्परफाड़ कमाई करते हुए सफलता के नए आयाम छुए और दुनिया भर में करोड़ों का बिजनेस किया। इस फिल्म की कॉमेडी टाइमिंग और डांस नंबर्स को दर्शकों ने बेहद चाव से देखा।
फराह खान की इन चार प्रमुख फिल्मों का यदि बारीकी से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि वे बॉलीवुड की उन बेहद कम महिला निर्देशकों में से एक हैं जो विशुद्ध रूप से व्यावसायिक मसाला फिल्में बनाने का माद्दा रखती हैं। जहां आज के दौर के कई फिल्ममेकर्स यथार्थवादी और गंभीर विषयों पर फिल्में बनाना पसंद करते हैं, वहीं फराह खान हमेशा से बड़े पर्दे पर केवल और केवल शुद्ध मनोरंजन परोसने की वकालत करती आई हैं। उनकी फिल्मों का कैनवास हमेशा बहुत बड़ा और रंगीन होता है, जो दर्शकों को ढाई से तीन घंटे के लिए एक अलग ही काल्पनिक और खूबसूरत दुनिया में ले जाता है। उन्होंने अपने निर्देशन के माध्यम से यह साबित किया है कि कमर्शियल सिनेमा बनाना कोई आसान काम नहीं है, इसके लिए स्क्रीनप्ले और दर्शकों की नब्ज पर एक बेहद मजबूत पकड़ होना अनिवार्य है।
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