केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का बड़ा फैसला, अब बिना डॉक्टर के पर्चे के नहीं मिल सकेगी कफ सिरप, बिना प्रिस्क्रिप्शन बिक्री पर पूरी तरह रोक
भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश में आम जनता के स्वास्थ्य, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा को
- ओटीसी दवाओं की सूची से बाहर होगी कफ सिरप, दवा दुकानों पर बिना प्रिस्क्रिप्शन बिक्री पर सरकार ने लगाई पूरी तरह रोक
- दवाओं के गलत इस्तेमाल और बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन सख्त, ड्रग्स रूल्स के शेड्यूल के (Schedule K) में संशोधन की तैयारी
भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश में आम जनता के स्वास्थ्य, विशेषकर बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा नीतिगत निर्णय लिया है। सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब देश भर में कफ सिरप यानी खांसी की दवाओं की बिक्री को पूरी तरह से विनियमित (Regulate) कर दिया गया है। इस नए आदेश के लागू होने के बाद, अब कोई भी मरीज या आम नागरिक किसी भी मेडिकल स्टोर या रिटेल फार्मेसी से सीधे जाकर ओटीसी (ओवर-द-काउंटर) दवा के रूप में कफ सिरप नहीं खरीद सकेगा। खांसी के इलाज में इस्तेमाल होने वाले इन ओरल लिक्विड फॉर्मूलेशन को प्राप्त करने के लिए अब किसी भी पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी (रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर) का वैध पर्चा यानी प्रिस्क्रिप्शन दिखाना पूरी तरह से अनिवार्य होगा। सरकार के इस सख्त रुख का मुख्य उद्देश्य देश में बड़े पैमाने पर हो रहे कफ सिरप के अनियंत्रित उपयोग, इसके कारण होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों और इसके जरिए होने वाले नशों के कारोबार पर पूरी तरह से नकेल कसना है।
प्रशासनिक स्तर पर इस बड़े फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए ड्रग्स रूल्स, 1945 के तहत बने पुराने नियमों में एक व्यापक संशोधन की रूपरेखा तैयार की गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए मसौदे (Draft Notification) के तहत ड्रग्स रूल्स के 'शड्यूल के' (Schedule K) की क्रम संख्या 13, प्रविष्टि संख्या 7 से 'सिरप' शब्द को पूरी तरह से हटाने का प्रस्ताव रखा गया है। पुराने नियमों के अनुसार, शेड्यूल के (Schedule K) के तहत आने वाली घरेलू उपचार की कुछ सामान्य दवाओं जैसे सिरप, लोजेंज, गोलियों को डॉक्टर के पर्चे की अनिवार्यता से कुछ छूट प्राप्त थी, जिसके चलते खुदरा दुकानदार इन्हें बिना किसी डॉक्टर की सलाह के आम जनता को आसानी से बेच सकते थे। लेकिन अब कफ सिरप को इस विशेष श्रेणी से बाहर कर दिया गया है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि कफ सिरप का दर्जा अब एक सामान्य घरेलू उपचार की दवा से बदलकर पूरी तरह से केवल डॉक्टर के पर्चे पर दी जाने वाली दवाओं जैसा हो गया है। पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न राज्यों, विशेष रूप से मध्य प्रदेश और राजस्थान में दूषित और घटिया कफ सिरप के सेवन से बच्चों की अचानक तबीयत बिगड़ने और मौत होने की गंभीर घटनाएं प्रकाश में आई थीं। इसके अलावा, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारतीय दवाओं के निर्यात और उनमें प्रोपलीन ग्लाइकोल जैसे सॉल्वैंट्स में पाए जाने वाले डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे हानिकारक तत्वों की मिलावट को लेकर चिंता व्यक्त की थी। इसी सुरक्षा संकट को स्थायी रूप से दूर करने के लिए शीर्ष ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (DCC) की सिफारिश पर सरकार ने यह सख्त कदम उठाया है।
इस नई व्यवस्था के लागू होने से देश की खुदरा और थोक दवा वितरण प्रणाली में एक बहुत बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के ड्रग कंट्रोलर्स को यह कड़ा निर्देश जारी किया है कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में आने वाली तमाम रिटेल फार्मेसी और मेडिकल स्टोर्स पर इस नियम का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करवाएं। यदि कोई भी दवा विक्रेता इस आदेश का उल्लंघन करते हुए बिना वैध पर्चे के किसी भी प्रकार का कफ सिरप बेचता हुआ पाया जाता है, तो उसके खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें भारी जुर्माने के साथ-साथ दुकान का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द करना भी शामिल हो सकता है। सरकार का मानना है कि इस सख्त नियंत्रण से न केवल दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी आसान होगी, बल्कि मरीजों में खुद से दवा लेने (Self-Medication) की बेहद खतरनाक आदत पर भी प्रभावी रोक लग सकेगी।
बच्चों के स्वास्थ्य और बाल चिकित्सा (Paediatric Care) के दृष्टिकोण से भी इस फैसले को बेहद क्रांतिकारी और आवश्यक माना जा रहा है। कफ सिरप में अक्सर कुछ ऐसे तत्व जैसे कोडीन या डेक्सट्रोमेथॉर्फन हाइड्रोब्रोमाइड शामिल होते हैं, जिनका अधिक मात्रा में या बिना डॉक्टरी सलाह के सेवन करने पर बच्चों के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने पहले ही एक विस्तृत एडवाइजरी जारी कर डॉक्टरों को यह सलाह दी थी कि वे दो वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को किसी भी प्रकार की कफ और कोल्ड की दवाएं न लिखें और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के मामले में भी इसका अत्यंत सीमित और चिकित्सकीय निगरानी में ही उपयोग किया जाए। चूंकि बच्चों में होने वाली अधिकांश सामान्य खांसी और सर्दी की बीमारियां स्वतः ही ठीक होने वाली (Self-Limiting) प्रकृति की होती हैं, इसलिए बिना किसी ठोस नैदानिक मूल्यांकन (Clinical Evaluation) के कफ सिरप पिलाना बच्चों के नाजुक गुर्दों और लिवर के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।
इस नीतिगत बदलाव के साथ ही दवा निर्माण की प्रक्रिया (Manufacturing Process) और गुणवत्ता मानकों को लेकर भी सरकार ने विनिर्माण इकाइयों पर अपना शिकंजा पूरी तरह से कस दिया है। संशोधित शेड्यूल एम (Revised Schedule M) के तहत अब देश के सभी दवा निर्माताओं के लिए यह पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है कि वे कफ सिरप के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की सघन प्रयोगशाला जांच करें। इसके अतिरिक्त, इंडियन फार्माकोपिया कमीशन ने भी नियमों में संशोधन करते हुए ओरल लिक्विड के तैयार माल यानी फिनिश्ड प्रोडक्ट स्टेज पर बाजार में रिलीज करने से पहले डीईजी और एथिलीन ग्लाइकोल जैसी अशुद्धियों की जांच को शत-प्रतिशत अनिवार्य बना दिया है। देश के विभिन्न राज्यों में संदिग्ध मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के खिलाफ जोखिम-आधारित निरीक्षण (Risk-Based Inspections) भी शुरू कर दिए गए हैं, ताकि बाजार में केवल उच्च मानकों वाली और पूरी तरह से सुरक्षित जीवन रक्षक दवाएं ही उपलब्ध रहें।
फार्मास्युटिकल जगत और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विभिन्न संगठनों ने सरकार के इस दूरदर्शी फैसले की सराहना करते हुए इसे एक बेहद जरूरी कदम बताया है। हालांकि, कुछ ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में जहां डॉक्टरों की उपलब्धता कम है, वहां शुरुआती दौर में आम लोगों को खांसी की सामान्य दवा खरीदने में थोड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी औषधालयों के माध्यम से ग्रामीण आबादी तक आवश्यक दवाओं की सुलभ पहुंच बनाने के लिए एक वैकल्पिक ढांचा भी तैयार कर रही है। साथ ही, आम जनता के बीच जागरूकता फैलाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान भी चलाया जा रहा है ताकि लोग खुद से दवा खरीदने की बजाय नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाकर डॉक्टर से उचित परामर्श लेने के महत्व को समझ सकें।
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