Special Article: यदुकुल शिरोमणी श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ के वंशज हैं- मथुरा , बयाना एवं करौली जादों राजपूत....

प्रभास क्षेत्र में हुए जदुवंश संहार के बाद द्वारिका से सुने ब्रज में प्रकाश-पुंज बनकर आये थे श्री कृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्रनाभ। इन्होंने ही निर्जन अवस्था में पड़ी हुई  ब्रजभूमि को पुनः

Oct 25, 2025 - 21:40
Oct 26, 2025 - 11:13
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Special Article: यदुकुल शिरोमणी श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ के वंशज हैं- मथुरा , बयाना एवं करौली जादों राजपूत....
यदुकुल शिरोमणी श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ के वंशज हैं- मथुरा , बयाना एवं करौली जादों राजपूत....
लेखक – डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन  

" प्रभास क्षेत्र में हुए जदुवंश संहार के बाद द्वारिका से सुने ब्रज में प्रकाश-पुंज बनकर आये थे श्री कृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्रनाभ। इन्होंने ही निर्जन अवस्था में पड़ी हुई  ब्रजभूमि को पुनः पुनर्जीवित करके वहां पर जादों राज वंश की पुनः स्थापना की थी।इनको यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण का प्रतिरूप माना गया है। वज्रनाभ को ही ब्रज का पुनः निर्माता भी कहा गया है। करौली एवं दक्षिण में देवगिरि के यादव-राजवंशों को इतिहासवेत्ताओं ने भी वज्रनाभ के  ही वंशज माना  है ।"

मुक्ति कहै गोपाल सों मेरी मुक्ति बताय ।
ब्रज रज  उड़ि मस्तक लगै ,मुक्ति मुक्त है जाय ।।

ब्रज की पावन पवित्र रज में मुक्ति भी मुक्त हो जाती है। ऐसी महिमामयी है ये धरा। ब्रज वसुधा को जगत अधीश्वर  भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं से सरसाया ।"ब्रज "शब्द का अर्थ है व्याप्ति ।इस व्रद्ध वचन्  के अनुसार व्यापक होने के कारण ही इस भूमि का नाम "ब्रज "पड़ा है ।सत्व ,रज ,तम इन तीनों गुणों से अतीत जो परमब्रह्म है। वही व्यापक है। इस लिए उसे "व्रज"कहते है । 

ब्रज मथुरा, उत्तर प्रदेश तथा उसका परिवर्ती प्रदेश (प्राचीन शूरसेन), जो श्रीकृष्ण की लीला भूमि होने के कारण प्राचीन साहित्य में प्रसिद्ध है। ब्रज का विस्तार 84 कोस में कहा जाता है। यहाँ के 12 वनों और 24 उपवनों की यात्रा की जाती है। 'व्रज' का अर्थ 'गोचर भूमि' है और यमुना के तट पर प्राचीन समय में इस प्रकार की भूमि की प्रचुरता होने से ही इस क्षेत्र को 'व्रज' कहा जाता था। विशेष रूप से भारतीय मध्यकालीन 'भक्ति साहित्य' में व्रज का वर्णन प्रचुरता से मिलता है। वैसे इसका उल्लेख कृष्ण के संबंध में 'श्रीमद्भागवत' तथा 'विष्णुपुराण' आदि प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है- "जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिराशश्वदत्रहि। श्रीमद्भागवत 10.31.1. "विना कृष्णेन को व्रज:।" विष्णुपुराण 5,7,27 "तयोर्विहरतोरेवं रामकेशवयोर्वृजे।" विष्णुपुराण 5,10,1 "तत्याज व्रजभूभागं सहरामेण केशवः।" विष्णुपुराण 5,18,32 "प्रीतिः सस्त्री-कुमारस्य व्रजस्य त्वयि केशव।" विष्णुपुराण 5,13,6

हिन्दी में सूरदास आदि भक्ति कालीन कवियों ने तो व्रज की महिमा के अनंत गीत गाए है- "ऊधो मोहि व्रज बिसरत नाही।" इस पद में सूरदास के कृष्ण का ब्रज के प्रति बालपन का प्रेम बड़ी ही मार्मिक रीति से व्यक्त किया गया है।

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भगवान् श्री कृष्ण के तिरोधाम गमन के बाद बिना श्री कृष्ण जी के ऐश्वर्य के ब्रजभूमि सूनी हो गयी थी ।जगत अधीश्वर कृष्ण के सभी लीला स्थल लुप्त हो गये। तब उनके प्रपौत्र वज्रनाभ जी सूने अंधकारमयी ब्रज में प्रकाश पुंज बनकर आये ।प्रभास -क्षेत्र में यदुवंशियों के संहार में बचे हुए लोगों में वज्रनाभ जी भी प्रमुख थे। जिनकी मथुरा का राजा बनाने की घोषणा स्वयं यदुकुल शिरोमणि श्री कृष्ण जी ने अपने तिरोधाम -गमन से पूर्व ही करदी थी और इस विषय में अपने सारथी दारुक से अर्जुन को संदेश भी भिजवाया था कि अब हमारे पीछे शुरसेनाधिपति के रुप में मथुरा का राजा वज्र होगा ।

त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम ।
गृहीत्वा याहि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति।। 63
विष्णु पुराण सैंतीसवें अध्याय में वर्णित है।

बज्रनाभ के माता -पिता -

वज्रनाभ जी श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र, प्रधुम्न के पौत्र एवं  अनिरुद्ध जी के पुत्र थे। वज्रनाभ जी की माता विदर्भराज रुक्मी की पौत्री थी जिनका नाम रोचना या सुभद्रा था।

वज्रनाभ जी की मथुरा में शासन-सत्ता-

स्कन्दपुराणोक्त श्रीम‌द्भागवत-माहात्म्य, अ०१ में इसका वर्णन विस्तारसे है। वज्रनाभके मथुरा में राज्यारोहण के कुछ दिन बाद सम्राट् परीक्षित् वज्रनाभ से मिलने मथुरा गये। वज्रनाभ ने उनका बड़ा स्वागत किया। तब राजा परीक्षित् ने कहा-'हे तात। तुम्हारे पिता और पितामह ने मेरे पिता-पितामह को बड़े-बड़े संकटों से बचाया है। मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है। प्रिय वज्रनाभ। यदि मैं उनके उपकारों का बदला चुकाना चाहूँ तो किसी प्रकार नहीं चुका सकता। इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राज-काज में लगे रहो। तुम्हें अपने खजाने की, सेना की तथा शत्रुओं की कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। यदि कभी तुम्हारे ऊपर कोई आपत्ति-विपत्ति आये अथवा किसी कारणवश तुम्हारे हृदयमें अधिक क्लेशका अनुभव हो तो मुझसे बताकर निश्चिन्त हो जाना, मैं तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर कर दूँगा।' तब वज्रनाभ ने कहा- महाराज! आपका कथन सत्य है।

यद्यपि मैं मथुरामण्डलके राज्य पर अभिषिक्त हूँ, फिर भी मैं यहाँ निर्जन वनमें ही रहता हूँ। इस बात का मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँ की प्रजा कहाँ चली गयी, क्योंकि राज्यका सुख तो तभी है, जब प्रजा रहे। जब वज्रनाभने परीक्षित् से यह बात कही, तब उन्होंने इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से हजारों बड़े-बड़े सेठों को बुलाकर मथुरा में रहने की जगह दी। इसके अलावा मथुरामण्डलके ब्राह्मणों, व्यापारियों तथा कारीगरोंको बुलवाया और मथुरामें बसाया। इस प्रकार मथुरा पुनः एक समृद्ध नगरीका रूप धारण करने लगी, यद्यपि उसे पहले जैसा (उग्रसेनके राज्यकी भाँति) गौरव प्राप्त नहीं हो सका था।

श्रीकृष्णलीला-स्थलोंकी खोज तथा स्थापना-

मथुरामें राजकीय व्यवस्था कायम करनेके बाद वज्रनाभ की इच्छा हुई कि अपने गौरवशाली प्रपितामह भगवान् श्रीकृष्णके लीला-स्थलोंकी खोजकर स्मृति-चिह्न बनवाये जायें, जिससे श्रीकृष्ण-भक्ति का प्रचार हो। शूरसेनप्रदेश और मथुरा नगर को विगत वर्षों में जिन विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था उसके कारण श्री कृष्ण के प्राचीन लीला -स्थल नष्ट हो गये थे। उन्हें बताने वाला वहां कोई उपर्युक्त व्यक्ति भी नहीं था ।तब राजा परीक्षत  ने वज्रनाभ से परामर्श कर नन्द आदि गोपों के कुल पुरोहित वयोवृद्ध महर्षि शांडिल्य को बुलाया । राजा परीक्षत ने वज्रनाभ की अभिलाषा शांडिल्य जी को बताई। वज्रनाभ से कहा कि हे राजन्। 'व्रज' शब्दका अर्थ है 'व्याप्ति'।

इस पुरातन वचनके अनुसार व्यापक होनेके कारण ही इस भूमिका नाम 'व्रज' पड़ा है। सत्त्व, रज, तम-इन तीन गुणोंसे अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक है, इसलिये उसे 'व्रज' कहते हैं। इस परब्रह्मस्वरूप व्रजधाममें नन्दनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निवास है। प्रेमरसमें डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं। तुम दोनों भगवान्‌की जिस लीलाको देख रहे हो, यह व्यावहारिकी लीला है। यह पृथ्वी और स्वर्गलोक आदि लोक इसी लीलाके अन्तर्गत हैं। इस पृथ्वीपर यह मथुरामण्डल है। यहीं वह ब्रजभूमि है, जिसमें भगवान्‌की वह वास्तविक रहस्य-लीला गुप्तरूपसे होती रहती है। जिन विषम परिस्थितियोंका सामना करना पड़ा था, उसके कारण श्रीकृष्णके वे प्राचीन लीला-स्थल नष्ट हो गये थे। उन्हें बतानेवाला वहाँ कोई उपयुक्त व्यक्ति भी नहीं रहा था। तब राजा परीक्षित्ने वज्रनाभसे परामर्शकर नन्द आदि गोपोंके कुलपुरोहित वयोवृद्ध महर्षि शाण्डिल्यको बुलवाया। राजा परीक्षित्ने वज्रनाभकी बात उन्हें कह सुनायी। तब शाण्डिल्यजीने

इसलिये वज्रनाभ! तुम मेरी आज्ञासे यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने जहाँ-जैसी लीला की है, उसके अनुसार उस स्थानका नाम रखकर तुम अनेकों गाँव बसाओ और इस दिव्य ब्रजभूमिका भलीभाँति सेवन करते रहो। गोवर्धन, दीर्घपुर (डीग), मथुरा, महावन (गोकुल), नन्दिग्राम (नन्दगाँव) और बृहत्सानु (बरसाना) आदिमें तुम्हें अपने लिये छावनी बनवानी चाहिये। उन-उन स्थानोंपर रहकर भगवान्‌की लीलाके स्थल, नदी, पर्वत, घाटी, सरोवर, कुआँ, कुण्ड और कदम्बखण्डी तथा कुंजवन आदिका सेवन करते रहन चाहिये। मैं आशीर्वाद देता हूँ कि मेरी कृपासे भगवान्‌क लीलाके जितने भी स्थल,नदी ,पर्वत ,घाटी ,सरोवर ,कुंआ ,कुण्ड, और कदम्बखंडी ,तथा कुंजवन आदि का सेवन करते रहना चाहिए। मै आशीर्वाद देता हूँ कि मेरी कृपा से भगवान की लीला के जितने भी स्थल हैं ,सबकी तुम्हें ठीक -ठीक पहचान हो जायगी।

इस प्रकार राजा परीक्षित्‌की सहायता और महर्षि शाण्डिल्यकी कृपासे वज्रनाभने क्रमशः उन सभी स्थानोंकी खोज की, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रेमी गोप-गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी लीलाएँ करते थे। लीला-स्थलोंका ठीक-ठीक निश्चय हो जानेपर उन्होंने वहाँ-वहाँकी लीलाके अनुसार उस उस स्थानका नामकरण किया, भगवान्‌के लीला विग्रहोंकी स्थापना की तथा उन-उन स्थानोंपर अनेकों गाँव बसाये। स्थान-स्थानपर भगवान्‌के नामसे कुण्ड और कुएँ खुदवाये गये, कुंज और बगीचे लगवाये, शिव आदि देवताओंकी स्थापना की। गोविन्ददेव, हरिदेव आदि नामोंसे भगवद्विग्रह स्थापित किये। इन सब शुभ कर्मोंके द्वारा वज्रनाभने अपने राज्यमें सब ओर एकमात्र श्रीकृष्ण भक्तिका प्रचार किया तथा भागवत-धर्मकी स्थापना की। उनके प्रजाजनोंको भी बड़ा आनन्द था और वे सदा ही वज्रनाभके राज्यकी प्रशंसा किया करते थे।

गर्गसंहिता, अश्वमेधखण्ड, अध्याय दोमें भी वज्रनाभद्वारा श्रीकृष्णके विभिन्न विग्रहोंकी स्थापनाका वर्णन मिलता है- 'नृपश्रेष्ठ वज्रनाभके कुलगुरु गर्गाचार्यद्वारा गर्ग संहिता नौ दिनोंतक सुनायी गयी। उस समय वज्रनाभकी अवस्था सोलह वर्षकी थी। गर्गजीके कहनेपर वज्रनाभने मथुरामें उसी प्रकार अश्वमेध यज्ञ किया, जैसे हस्तिनापुरके राजा युधिष्ठिरने किया था। इसके बाद मथुरामें 'दीर्घविष्णु' और 'केशवदेव', वृन्दावनमें 'गोविन्ददेव', गिरिराज गोवर्धनपर 'हरिदेवजी', गोकुलमें 'गोकुलेश्वर' और एक योजन (चारकोस) दूर बलदेवमें 'बलदाऊजी' के अर्चाविग्रहोंकी उन्होंने स्थापना की। ये श्रीहरिकी छः प्रतिमाएँ राजा वज्रनाभद्वारा स्थापित की गयी हैं। वज्रनाभने हर्षसे भरकर लोकोंके कल्याणके लिये ब्रजमण्डलमें बलदाऊजीकी पाँच अन्य प्रतिमाएँ भी स्थापित की।

 ब्रजमन्डल में वज्रनाभजी द्वारा किये गये श्रीकृष्ण भक्ति एवं धार्मिक  कार्य-

श्री वज्रनाभ जी के कार्यों का उल्लेख विभिन्न सनातन धार्मिक शोध ग्रन्थों में प्राप्त होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है-'ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास' तथा 'ब्रजके धर्म-सम्प्रदायोंका इतिहास' शोध ग्रन्थोंमें डॉ० प्रभुदयाल मीतलजीने श्रीवज्रनाभद्वारा किये गये श्रीकृष्णभक्तिके प्रचार तथा उनके धार्मिक कार्योंका वर्णन किया है-' श्रीकृष्णके प्रपौत्र वज्रनाभने मथुरामें श्रीकृष्ण जन्मस्थानपर श्रीकेशवदेवजीकी मूर्ति स्थापित की थी। गोवर्धनमें श्रीवज्रनाभके पधराये श्रीहरिदेवजी थे, परंतु औरंगजेबके शासनकालमें वह वहाँसे जयपुर  चले गये, बादमें उनके स्थानपर दूसरी मूर्ति स्थापित की गयी। गोवर्धनमें वज्रनाभके पधराये हुए चक्रेश्वर महादेवका मन्दिर है। गोकुलमें गोकुलेश्वर मन्दिरका निर्माण कराया। वृन्दावनमें मदनमोहन मन्दिर भी इनके द्वारा स्थापित है।'

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अन्य ग्रन्थोंके अनुसार वृन्दावनमें रंगजी मन्दिरके सामने श्रीगोविन्ददेवजी (भूतोंवाला मन्दिर) का प्राचीन मन्दिर है। श्रीगोविन्ददेवजी वज्रनाभद्वारा स्थापित थे, जिनकी मूर्ति सोलहवीं सदीमें चैतन्य महाप्रभुके शिष्य रूपगोस्वामीको मिली थी। मुगल उपद्रवके समय (औरंगजेबके कालमें) यह मूर्ति जयपुरनरेश जयसिंहद्वारा जयपुर ले जायी गयी और वर्तमानमें वहाँके राजमहलमें विराजमान है। इसके बाद वृन्दावनमें गोविन्दराजजीका दूसरा विग्रह है। मथुरामें ही होली दरवाजाके पास श्रीकंसनिकन्दन मन्दिर तथा महौलीकी पौरमें श्रीपद्मनाभ मन्दिरका निर्माण वज्रनाभजीने कराया था। श्रीकामेश्वर महादेव मन्दिर, श्रीकाशीनाथ मन्दिर-कॉमा (राजस्थान) एवं श्रीरणछोड़राय मन्दिर, द्वारका वज्रनाभजीद्वारा स्थापित हैं।

ब्रज के अन्य स्रोतोंसे प्राप्त जानकारी-

महाराज वज्रनाभने गोकुलमें कर्णबेध कूपका निर्माण कराया। श्रीगिरिराज परिक्रमाके आन्यौर गाँवमें राधा-गोविन्दजीका प्राचीन मन्दिर बनवाया। महावनमें कोले-घाटका निर्माण कराया। आदि बद्री (कॉमा) में बूढ़ा बद्री मन्दिर बनवाया। इनके अलावा श्रीगणेश्वर महादेव मन्दिर-गणेशरा (मथुरा), श्रीदावानलबिहारी मन्दिर-दावानल कुण्ड (वृन्दावन), श्रीर्वशीवट वृन्दावन, गोपेश्वर महादेव मन्दिर-मृन्दावन, श्रीभूतेश्वर महादेव मन्दिर मथुरा, बन्दी-आनन्दी देवी मन्दिर बन्दीग्राम, बड़े दाऊजी-नरीग्राम, श्रीदाऊन्नी मन्दिर-कमई ग्राम (बरसाना) आदि मन्दिरोंका निर्माण कराया। प्राचीन खम्भ खामीग्राम (हरियाणा) का निर्माण कराया। एक अन्य विवरणमें दतिहा ग्राम-सतोहाके पासको बसानेका उल्लेख भी मिलता है।

वज्रनाभजीने ब्रजमें कुण्डोंका भी निर्माण कराया। राधाकुण्ड कस्बेमें स्थित राधाकुण्ड तथा उसके अन्तर्गत कंकणकुण्ड एवं श्यामकुण्ड तथा उसके अन्तर्गत वज्रनाभकुण्ड और गोवर्धन-राधाकुण्ड परिक्रमा मार्गके मध्य कुसुम-सरोवरके पश्चिममें उद्धवकुण्डका निर्माण कराया था। कुसुम-सरोवरका निर्माण भी वज्रनाभने कराया था। आज भी उद्धवकुण्डके शिलापट्टपर लिखे विवरणको परिक्रमार्थी पढ़कर जान सकते हैं कि यह वज्रनाभजीद्वारा निर्मित है। एक बार राधाकुण्ड करबेमें तमालतला घाटपर आकर चैतन्य महाप्रभु (सोलहवीं सदी) दोनों कुण्डोंका आविर्भाव करनेसे पहले बैठे थे।

जिस समय श्रीमहाप्रभुने वहाँकी रज उठायी और उसका तिलक किया तो इसी स्थानपर श्रीकृष्णजीके द्वारा निर्मित एक रमणीय कुण्ड प्रकट हुआ। उसे देखकर सबको श्रीराधाकुण्ड और श्यामकुण्डका स्थान निश्चित हो गया, जो अबतक लुप्तप्राय थे। वह वज्रनाभकुण्ड इस समय श्रीश्यामकुण्डके बीचोबीच डूबा हुआ था। वज्रनाभके नामानुसार इस कुण्डका नाम भी श्रीवज्रनाभकुण्ड पड़ा। ग्रीष्मकालमें जब जल कम हो जाता है, तब वज्रनाभकुण्डके दर्शन हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त आन्यौर गाँवमें गोविन्दकुण्ड, वृन्दावनमें दावानल कुण्ड, गणेशरा (मथुरा)-में गन्धर्वकुण्ड, जतीपुरामें सुरभिकुण्ड, कामवन (कॉमा) में विमलकुण्ड, नन्दगाँवमें पावनकुण्ड आदिका निर्माण कराया।

श्रीवज्रनाभने भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओं के  अनुसार समस्त व्रजक्षेत्रमें अनेक वन, उपवन तथा कदम्बखण्डीमें अनेक प्रकारके वृक्ष लगवाये, जो स्मृतिरूपमें आज भी विद्यमान हैं। सर्वप्रथम ब्रजयाश करनेका श्रेष श्रीवज्रनाभ जी को है। कालकी विपरीत गतिके चलते सुप्त ब्रजयात्राको सोलहवीं सदी में श्रीनारायण भट्ट तया चैतन्य महाप्रभुके शिष्ययों ने पुनः प्रकट किया।

श्री वज्रनाभ का महाप्रस्थान - 

श्रीकृष्ण वज्रनाभ हैं और वज्रनाभ ही श्रीकृष्ण हैं, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण श्रीमद्भागवतम् के महात्म्य खण्ड, अध्याय 3, श्लोक 65-72 में स्पष्ट रूप से मिलता है, जहाँ उद्धवजी कहते हैं: इसलिए राजेन्द्र परीक्षित। तुम जाओ और कलियुग को जीतकर उसका दमन करो। उद्धवजी के वचनों पर राजा परीक्षित ने उन्हें प्रणाम किया और दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। उधर वज्रनाभ ने भी अपने पुत्र प्रतिबाहू को अपनी राजधानी मथुरा का राजा बना दिया और अपनी माताओं को साथ लेकर उसी स्थान पर पहुँचे जहाँ उद्धवजी प्रकट हुए थे और श्रीमद्भागवतम् सुनने की इच्छा से वहीं रहने लगे। तब उद्धवजी ने गोवर्धन पर्वत (वर्तमान में कुसुम-सरोवर के निकट उद्धवकुण्ड) के पास एक माह तक श्रीमद्भागवतम् कथा का रसपान किया। उस समय रसास्वादन करते हुए, प्रेमी श्रोताओं के नेत्रों में भगवान की सच्ची आनंदमयी लीलाएँ सर्वत्र प्रकाशित हो उठीं और कृष्ण सर्वत्र साक्षात होने लगे। उस समय सभी श्रोताओं ने स्वयं को भगवान के रूप में देखा। वज्रनाभ ने भी स्वयं को कृष्ण के दाहिने चरणकमलों में खड़ा हुआ तथा कृष्ण वियोग के दुःख से मुक्त होकर उस स्थान पर अत्यन्त शोभायमान देखा।

६२ में भी मिलता है। उद्धवजी गरम भागवत थे तथा यदुवंशमें उत्पन्न हुए थे। ये वसुदेवजीके भाई देवभागके पुत्र थे तथा श्रीकृष्णके चचेरे भाई थे। होने लगे। प्रागः ऐसा ही विवरण गर्गसंहिता, अध्याय

वज्रनाभ-कालगणना -

वज्रनाभके जन्मकाल का निर्णय करनेके लिये पौराणिक विवरणोंके साथ-साथ ऐतिहासिक ज्योतिषीय शोधोंका सहारा लेना आवश्यक है। प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीचिन्तामणि विनायक वैद्य, डॉ० प्रभुदयालमीतल एवं श्रीलज्जाराम मेहता आदि इतिहासकारोंने श्रीकृष्णकाल, महाभारतकाल तथा परीक्षित्‌कालसे सम्बन्धित कालगणनाकी विवेचना की है।पौराणिक विवरणोंके अनुसार श्रीकृष्ण द्वापरयुगके अन्त और कलियुगके आरम्भके सन्धिकालमें विद्यमान थे। श्रीकृष्णके महाप्रयाणके बाद सम्राट् युधिष्ठिरके समय में ही कलियुगका प्रवेश हो चुका था। उसी समय पाण्डवोंने अर्जुनके पौत्र परीक्षित्‌को हस्तिनापुर तथा द्वारकासे लाये श्रीकृष्ण प्रपौत्र वज्रनाभको इन्द्रप्रस्थका राज्य देकर हिमालयके लिये स्वर्गारोहण किया। उस समय राजा परीक्षित्‌की उम्र ३६ वर्ष थी तथा वज्रनाभकी उम्र १६ वर्ष थी। ज्योतिषीय गणनाके अनुसार आज वि०सं० २०७८, सन् २०२१ ई०को कलियुगके ५१२२ वर्ष बीत चुके हैं। अतः ५१२२ वर्ष १६ वर्ष ५१३८ वर्ष पूर्व वज्रनाभका जन्मकाल सिद्ध होता है।

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श्रीवज्रनाभ जी की महत्ता- 

  • भक्ति -रत्नाकर में श्री वज्रनाभ जी की महिमा--

'भक्ति-रत्नाकर' की पंचम तरंगमें श्रीवज्रनाभजीकी महत्ताको स्पष्ट किया है (बंगला भाषामें) -

मथुरा  मण्डले  राजा वज्रनाभ का  हैला ।
कृष्णलीला नामे बहु ग्राम बसाइला ।।
श्रीविग्रह सेवा कैला कुण्डादि प्रकाश।
नाना रूपे पूर्ण हैल  तांर  अभिलाष ॥
कत दिन परे सब हैल गुप्त पाय।
तीर्थ प्रसंगादि केह न करे को धाय॥
श्रीकृष्ण चैतन्यचन्द्र ब्रजेन्द्र कुमार।
मथुरा आइला हैला कौतुक अपार।।
करिया भ्रमण किछु दिग् दर्शाइला।
सनातन रूपा द्वारे सब प्रकाशिला ॥

आधुनिक खड़ी बोलीके आविष्कारकर्ता श्रीभारतेन्दु हरिश्चन्द्रजीने वज्रनाभजीका उत्पत्ति-स्थान, उनकी महत्ता तथा कलियुगमें पृथ्वीपर अपने यदुवंशकी स्थापनाहेतु श्रीकृष्णके चरणोंमें स्थित एवं श्रीकृष्णद्वारा वज्रनाभजीको अपने स्थायी चरण-चिह्नके रूपमें रखना दोनोंकी एकरूपता तथा अभिन्नताको इस पद्यमें स्पष्टतः दर्शाया है-

चरन परस नित जें  कंरत इन्द्रतुल्य ते होत।
वज्र-चिन्ह हरि-पद-कमल जो हिय करत उदोत ॥
पर्वत से निज-जननके पापहिं काटन काज।
वज्र-चिन्ह पद में धरत कृष्ण चन्द्र महाराज ॥
वज्रनाभ यासों प्रगट जादव सेस लखाहिं।
पायन-हित निज वंश भुवि वत्र चिन्ह पद माहिं ॥

गर्गसंहिता में श्री वज्रनाभ -

गर्ग-संहिता अश्वमेध खण्ड, अ० १ में श्रीवज्रनाभजीकी महिमाका वर्णन विस्तारसे दिया है। यादवकुल (यदुवंश) के परम गुरु तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीगर्गाचार्यजीने आठ दिनोंतक अश्वमेध यज्ञकी कथा कही, फिर वे नरेश्वर वज्रसे मिलनेके लिये श्रीहरिकी मथुरापुरीमें आये। सोलह वर्षकी अवस्था और सुपुष्ट शरीरवाले विशालबाहु श्यामसुन्दर कमलनयन वज्रनाभने गुरुके चरणोदकको लेकर सिरपर रखा। वज्रनाभ सौ सिंहोंके समान उद्भट शक्तिशाली थे। तब गर्गमुनि बोले- 'हे यदुकुलतिलक। युवराज । महाराज। यदुवंश-शिरोमणि । नृपेश्वर वज्रनाभ! तुमने सब सत्कर्म ही किया है, पृथ्वीपर रहनेवाले लोगोंका पालन किया है। वत्स ! तुमने भूतलपर धर्मको स्थापित किया है। विष्णुरात (परीक्षित्) तुम्हारे मित्र होंगे तथा अन्य नरेश भी तुम्हारे वशमें रहेंगे। नृपश्रेष्ठ। तुम धन्य हो, तुम्हारी मथुरापुरी धन्य है, तुम्हारी सारी प्रजाएँ धन्य हैं तथा तुम्हारी ब्रजभूमि धन्य है। तुम श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध (चतुर्व्यहावतार) का भजन करते हुए उत्तम भोग भोगो। नरेश्वर। निःशंक होकर राज्य करो।'

श्रीनिम्बार्काचार्य' शोधग्रन्थमें करौलीके प्राचीन संस्कृत विद्वानों के श्लोकोंमें भी श्रीवज्रनाभजीको महिमा-मण्डित किया है

कृष्णा-प्रपौत्रो नृप वज्रनाभः संदीक्षितों निम्बदिवाकराय।

अद्यापि तत्पद्‌गतिवर्तमानाः वंशजा भूपवराः प्रजाश्व ॥

इसी ग्रन्थमें आगे लिखा है-'करौलीका राजपरिवार भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी वंश-पराम्परा में  है। श्रीवज्रनाभजी श्रीकृष्णके प्रपौत्र थे। श्रीवज्रनाभजीकी प्रार्थनानुसार भगवान ने दर्शन देकर प्रस्तर (पत्थर)-चौकी प्रदान की तथा आदेश दिया कि यह मेरे स्नान करनेकी चौकी है, इसमें मेरी आकृति की आठ प्रतिमाएँ बनवाकर ब्रज-वृन्दावन में स्थापित करो, उन प्रतिमाओं में मेरे साक्षात् विग्रहके दर्शन होंगे। भगवद् आज्ञानुसार श्रीवज्रनाभने आठ मूर्तियाँ बनवाकर ब्रजमें स्थापित कीं, जो विख्यात हैं-

चार देव दुइ नाथ हैं, दुइ हैं श्री गोपाल।

वज्रनाभ प्रकट करी अष्टमूर्ति भगवान् ।।

अर्थात् चार देव-गोविन्ददेव (वृन्दावन), केशवदेव (मथुरा), हरिदेव (गोवर्धन), बलदेव (दाऊजी)।

दो नाथ' श्रीनाथ (जतीपुरा), गोपीनाथ (वृन्दावन)'।

दो गोपाल- 'मदनगोपाल एवं साक्षीगोपाल (वृन्दावन)'।

अन्तमें, श्रीवज्रनाभ तो श्रीकृष्णकी साक्षात् परम्पर हैं। भले ही वे द्वारकासे ब्रज आकर उन श्रीकृष्णके पाद-प‌द्मोंमें अपना स्थान प्राप्त कर लें, किं ब्रजभूमिकी श्रीकृष्ण-विहार-भूमियोंका प्रथम दर्शन-परिचय संसारको उनके अनुग्रहसे प्राप्त हुआ । श्रीवज्रनाभने उन लीलामय श्रीकृष्णके धामका सम्पन सुलभ कराया। वज्रनाभ महान् आदर्शके प्रतीक उन्होंने गर्गमुनिके निर्देशनमें अश्वमेध यज्ञ भी कि था। उनका शासन धर्मका शासन था। वे मह वीर, दानशील, परोपकारी, दयालु एवं परम कृष् भक्त थे। इसीलिये वज्रनाभजी अपने महान्  कार्यों के कारण युग-प्रवर्तक कहे जाते हैं।

बज्रनाभ जी की  जयन्ती-

भारतीय साहित्य एवं संस्कृति शोध् कर्ता डा0 अशोक वुश्वामित्र कौशिक के अनुसार वज्रनाभ जी का जन्म चैत शुक्ल प्रतिपदा युधिष्ठर संवत 27 को द्वारिका में हुआ और 10 वर्ष की आयु में ही संवत 38 को दिन के मध्यकाल में वह इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर विराजमान हुए थे ।जन्मतिथि के दिन ही वज्रनाभ जी का राज्याभिषेक हुआ था ।इस लिए वज्रनाभ जी को ही यदुकुलक पुनः संस्थापक एवं ब्रज का पुनःनिर्माता माना जाता है।ब्रज में ही यदुवंशियों के गाँव करहला में वज्रनाभ जी की समाधि है ।अब इस वज्रनाभ जी की समाधि स्थल को उत्तर प्रदेश सरकार भव्यता से निर्मित करवा रही है। बहुत शीघ्र यह समाधि स्थल व्रज क्षेत्र का  दार्शनिक स्थल होगा।
   
यदुवंशी क्षत्रियों के मुगलों के आगमन से पूर्व विभिन्न राज्य-

भारत में मुसलमानों के आने के पहले शूरसैनी शाखा के क्षत्रिय यदुवंशियों का राज्य काठियावाड़ 'कच्छ , पंजाब , हिमाचल हरियाणा जम्बू , यहां तक कि दक्षिण में भी इसके राज्य होने के प्रमाण प्राचीन शिलालेखों व् ताम्रपत्रों से मिलते है ।दक्षिण का सेउन प्रदेश जो नासिक से दौलताबाद (निजाम राज्य )तक का भू -भाग है ,वह भी किसी समय यदुवंशी क्षत्रियों के अधिकार में था ।दक्षिण में ,देवगिरि , द्वार समुद्र ,जो मैसूर राज्य के अंतर्गत है तथा विजयनगर (दक्षिण )यदुवंशी राजवंश के अधिकार में थे ।इनका प्रभुत्व सिंधु नदी के दक्षिणी भाग में तथा पंजाब में भी रहा था ।वहां पर जाधव क्षत्रिय पाये जाते हैं जिनके पूर्वज पूर्व काल में यादव ही लिखते थे । मैसूर में यदुवंशी क्षत्रिय वाडियार  अपना टाइटिल लिखते हैं।

जादों क्षत्रियों ने अपने पूर्वजों के द्वारा वसायी एवं शासित मथुरा नगरी को कभी नहीं छोड़ा ।

मथुरा से महमूद गजनवी के  आक्रमण के पूर्व एवं बाद में हुआ जदुवंशियों  का विभिन्न क्षेत्रों में  पलायन एवं पुनः मथुरा पर शासन सत्ता रखी।

यदुवंशियों का राज्य ब्रज प्रदेश में सिकंदर के आक्रमण के समय भी होना पाया जाता है ।समय -समय पर शक ,मौर्य गुप्त और शिएथियन आदि ने इन शूरसेन वंशी यादव क्षत्रियों के मथुरा राज्य को दबाया /छीना गया लेकिन मौका पाते ही यदुवंशी फिर स्वतंत्र हो जाते थे ।जब चीनी यात्री सन 635 में भारत आया था उस समय मथुरा का शासक कोई सूद्र था ।लेकिन मथुरा के आस पास के क्षेत्र जैसे  मेवात ,भदानका/शिपथा (आधुनिक बयाना) ,कमन (8 वीं तथा 9 वीं सदी ) के शासक शूरसैनी शाखा के ही थे जिनके नाम भी प्राप्त है । इस काल में मथुरा पर शासन कनौज के गुजरप्रतिहार शासकों था ।इस काल में यदुवंशी उनके अधीनस्थ रहे हों ।लेकिन इसी समय में मथुरा के शासक यदुवंशी राजा धर्मपाल भगवान श्रीकृष्ण के 77वीं पीढ़ी में मथुरा के आस पास के क्षेत्र के शासक रहे है जिनके कई प्रमुख वंशज ब्रह्मपाल ,जयेंद्र पाल मथुरा के शासक 9 वीं सदी तक मिलते है। 

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जब महमूद गजनवी ने सन् 1018 ई0 के आस पास मथुरा पर आक्रमण किया था उस समय महावन का यदुवंशी राजा कुलचंद था ।उसने गजनवी के साथ भयंकर युद्ध किया किन्तु अंत में हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी शूरसेन शाखा के भदानका /शिपथा (आधुनिक बयाना );त्रिभुवनगिरी (आधुनिक तिमनगढ़ ) के कई शासको जैसे राजा विजयपाल (1043),राजा तिमानपल (1073), राजा कुंवरपाल प्रथम (1120), राजा अजयपाल जिनको महाराधिराज की उपाधि थी (1150) नें महावन के शासक थे इनके बाद इनके वंसज हरिपाल (1180), सोहनपाल (1196)महावन के शासक थे ।इसी समय बयाना और त्रिभुवनगिरी पर राजा धर्मपाल के बेटे कुंवरपाल द्वितीय का शासन था जिसका युद्ध मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक से हुआ था ।इसके बाद भी मथुरा क्षेत्र में  जादों  ठाकुरों की सत्ता कायम रही ।महावन के राजा महिपाल यदुवंशी जादों क्षत्रिय रहे है ।बाद में   उनके कुछ वंशज  हंगा जाट(महावन  एवं  सादाबाद  क्षेत्र) एवं ठकुरेले जाट (छाता,इगलास ,खैर  क्षेत्र) बन गये।

जब महमूद गजनवी ने सन् 1018 ई0 के आस पास मथुरा पर आक्रमण किया था उस समय महावन का यदुवंशी राजा कुलचंद था ।उसने गजनवी के साथ भयंकर युद्ध किया किन्तु अंत में हार का सामना करना पड़ा ।करौली  पौराणिक यादव /जादौन राजवंश का मूल पुरुष राजा बिजयपाल मथुरा के इसी यादव /शूरसैनी   /जादौन राजवंश से था ।जो बज्र नाभ जी के  ही इस यदु वंश  में  इनके  85 पीढ़ी बाद  मथुरा के राजा बने । वह  गजनवी के आक्रमणों के कारण पूर्व में ही अपनी राजधानी मथुरा से हटाकर पास की मानी पहाड़ी पर लेगये क्यों कि ये स्थान पर्वत श्रेणियों से घिरा रहने के कारण आक्रमणों से सुरक्षित था।उस समय मैदानों की राजधानियाँ सुरक्षित नहीं समझी जाती क्यों कि गजनी (कावुल )की तरफ से मुगलों के हमले होने शुरू हो गये थे। राजा बिजयपाल ने वहां एक किला "विजय मंदिर गढ़ "सन् 1040 में बनवाकर अपनी राजधानी स्थापित की ।यही किला बाद में बयानाके गढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।बिजयपाल को भगवान् श्री कृष्ण के 88 वीं पीढ़ी में होना बतलाया जाता है ।

बहुत बार हुआ बयाना एवं तिमनगढ़ (त्रिभुवनगिरी)  से यदुवंशि क्षत्रियों (जादों ) का विभिन्न क्षेत्रों में पलायन-

  •  राजा बिजयपाल की मृत्यु के बाद पलायन-

-बयाना के राजा बिजयपाल का समय स0 1150 (ई0 सन् 1093के आस पास रहा होगा।उनकी मुठभेड़ गजनी के मुसलमानों से बयाना में हुई थी जिसमें उनकी मृत्यु होगयी थी ।उस समय बयाना पर मुगलों का अधिकार हो जाने के कारण काफी यदुवंशी क्षत्रिय उत्तर की ओर पलायन कर गये । जिनमे मुख्य पलायन उस समय एटा जिले के जलेसर क्षेत्र, मध्य प्रदेश के होसंगावाद के शिवनी मालवा क्षेत्र 'एवं गोंडवाना के अन्य क्षेत्रों में हुआ जिसके प्रमाण जगाओं और ताम्र पत्रों से मिल चुके है ।
  
सन् 1196 में राजा कुंवरपाल ( द्वितीय )के बाद पुनः बयाना और तिमनगढ़ से यदुवंशियों का द्वितीय पलायन- 

राजा बिजयपाल के बाद उनके बड़े पुत्र तिमन पाल ने तिमन गढ़ का किला बनबाया।इनके राज्य में वर्तमान अलवर 'राज्य का आधा हिस्सा ,भरतपुर 'धौलपुर व् करौली के राज्य तथा गुणगाँव व् मथुरा से लेकर आगरा व् ग्वालियर के  कुछ क्षेत्र सामिल  थे ।सन् 1158 के आस पास इन्होंने पुनः बयाना पर कब्ज़ा कर लिया था। बाद में इनके वंशधर कुंवरपाल द्वितीय को सन् 1196 में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुउद्दीन ऐबक से हारकर बयाना और तिमनगढ़ छोड़ने पड़े थे और बयाना व् तिमनगढ़ पर पुनः मुगलों (मुहम्मद गौरी एवं उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ) का अधिकार होगया था । इस लिए महाराजा कुंवरपाल द्वितीय नेअपने साथियों सहित अपने मामा के घर रीवां के अन्धेरा कटोला नामक गांव में जाकर निवास किया ।सन् 1196 से सन् 1327 तक इस क्षेत्र पर मुगलों का अधिकार रहा।मुगलों के अत्याचार भरे शासन के कारण बयाना और तिमनगढ़ के काफी यदुवंशी क्षत्रिय  उत्तर -पश्चिम की ओर पलायन कर गये ।इनमे कुछ तिजारा व् सरहत् (उत्तरी अलवर )में जा रहे ।बाद में उनमें से कुछ ने मुस्लिम धर्म अपना लिया और मेव तथा खान जादा कहलाने लगे जो आजकल अलवर व् मेवात क्षेत्र में पाये जाते है।

इसी समय भरतपुर के सिनसिनवार  जाटों का यदुवंशियों में से ही निकास हुआ है ।इसी समय बहुत से यदुवंशी राजपूत पुनः व्रज क्षेत्र मथुरा के विभिन्न भागों में जैसे महावन ,छाता ,वरसाना ,शेरगढ़ आदि क्षेत्र ,भरतपुर शहर के आस-पास के क्षेत्र  , कामा और डींग के क्षेत्र , आगरा जिले मे शमसाबाद ,फतेहाबाद ,किरावली ,अछनेरा व् मथुरा तथा भरतपुर सीमा के फरह क्षेत्र ,  बुलहंदशहर के जेवर क्षेत्र ,हरियाणा के पलवल और नूह जिलों  के जादौ राजपूत जो अपने को अब छौंकर राजपूत कहते है वे भी इसी समय तिमनगढ़ व् बयाना क्षेत्र से अहरदेओ या द्रोपाल यदुवंशी जादों राजपूत सरदार के वंशज है जिनको जेवर के ब्राह्मणों ने मेवातीओं से लड़ने के लिए जेवर में बसाया था ।उन्होंने जेवर को मेवातीओं से मुक्त कराया था। इसके अलावा  जादों राजपूत अलीगढ ,हाथरस, हापुड ,बुलहंदशहर , फ़िरोजावाद मैंनपुरी ,इटावा ,औरैया ,कौशाम्बी जिलों ,भदावर क्षेत्र में।पाए जाते हैं।और हाथरस के पोर्च और वागर यदुवंशी जादों राजपूत जो हसायन ,गिडोरा ,मेंडू ,दरियापुर में पाये जाते है उनका भी पलायन तिमनगढ़ से इसी समय पृथ्वीपाल यदुवंशी जादों और उनके वंशज इस क्षेत्र में आये ।इसके अलावा उत्तरप्रदेश के अन्य जिलों जैसे कानपुर ,इटावा ,जालौन(कालपी),हमीरपुर, बाँदा ,महोबा,छत्तरपुर , कौशाम्बी,में भी काफी यदुवंशी(जादौ ) क्षत्रिय पाये जाते हैं।    कुछ यदुवंशी तिमनगढ़ से राजस्थान के चित्तौड़ ,उदयपुर ,भीलवाड़ा ,पाली ,कोटा , बारां जिलों में भी कुछ ठिकानो में जा बसे है ।

करौली राज्य की स्थापना (सन 1348 ) में राजा अर्जुनपाल के द्वारा की गई -
   
कुंवरपाल 2  के भाई के वंशज अर्जुनपाल जी ने सन् 1327ई0 के लगभग मंडरायल के शासक मिया मक्खन को मार के उस क्षेत्र पर अधिकार किया और सरमथुरा के 24 गांवों को बसाया और धीरे  धीरे अपने पूर्वजों के राज्य पर पुनः अधिकार किया ।सन् 1348ई0 में इन्होंने कल्याणजी का मंदिर बनवाकर कल्याणपुरी नगर बसाया जो अब करौली कहलाता है ।यही इस राज्य की राजधानी बना  ।आज लगभग यहाँ  जादों राजपूतों के 100 गांव है ।इसी के आस पासके क्षेत्र सरमथुरा के पास धौलपुर जिले में भी 24 -30 के लगभग जादौ राजपूतों के गांव है।
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के सबलगढ़ /सुमावली-जौरा क्षेत्र में 50 तथा कुछ गांव श्योपुर जिले में तथा इंदौर,शाजापुर, देवास जिलों में भी जादौ राजपूत पाये जाते है जो पाल ,हरिदास एवं मुक्तावत शाखा के जादौ राजपूत है ।इसके अलावा कुछ करौली एवं मथुरा क्षेत्र से विस्थापित मध्यप्रदेश के ही  भिंड ,गुना ,विदिशा ,अशोकनगर ,शिवनी मालवा होसंगवाद तथा रायसेन जिलों में भी बहुत से जादौ राजपूतों के गांव है ।

बिहार राज्य में मुक्तावत जादों  राजपूत-

बिहार राज्य के मुंगेर ,भागलपुर ,बांका तथा जमुही जिलों में  जादों राजपूत बहुतायत में पाए जाते हैं जो 18 सौके दशक मुरैना जिले के सबलगढ़ क्षेत्र से गये हुए हैं।

मथुरा /बयाना / तिमनगढ़  के जादों क्षत्रियों की रियासतें-

उत्तर प्रदेश में जादों राजपूत रियासते-

सोनगढ़ (जलेसर ) संवत 1173 के जादों-

  1. उमरगढ़ जादों रियासत(संवत1225)
  2. ओखरा जादों रियासत (संवत 1225)
  3. नारखी जादों  रियासत (संवत 1225)
  4. जौन्धरी जादों रियासत (संवत 1225)
  5. नीमखेड़ा जादों रियासत(संवत1225) 
  6. फरिहा-कोटला जादों रियासत ( 15 वीं सदी )
  7. अवागढ़ जादों रियासत (18 वीं सदी)
  8. मांगरौली जादों रियासत (18 वीं सदी )
  9. कौरह-रूस्तमपुर जादों रियासत(18 वीं सदी)
  10. बरानदी जादों रियासत (18वीं सदी)
  11. सोमना ,बीरपुरा एवं गभाना  जादों रियासत (18 वीं सदी)
  12. अशरफपुर जलाल जादों रियासत(18वीं सदी ,अलीगढ़)
  13. पचों जादों रियासत (18वीं सदी ,अलीगढ़)
  14. हसायन ,14 मेंडु एवं 15-गिडोरा रियासत ( पोर्च एवं बांगर जादों , 18 वीं सदी ,हाथरस)

राजस्थान में जादों राजपूत रियासतें-

  1. करौली जादों  राजपूत राज्य( सन 1348)--- करौली राज्य में 37  जादों जागीरें तथा उनके मातहत बहुत से ठिकाने हैं।
  2. सरमथुरा जादों रियासत
  3. बिलौनी जादों रियासत
  4. रिझौनी जादों रियासत
  5. कनवारी एवं मौकनपुर जादों जमींदारी (अलवर ,राजस्थान)

मध्य प्रदेश में जादों राजपूत रियासतें-

  1. सबलगढ़/ सुमावली के जादों ( मुरैना ,मध्य प्रदेश)
  2. काथोंन  जादों रियासत ( 18 वीं सदी ,मुरैना  ,मध्य प्रदेश )
  3. गोबर-गोंडी जादों रियासत (18 वीं सदी मुरैना मध्यप्रदेश )
  4. काठीवारा जादों रियासत (अलीराजपुर ,मध्यप्रदेश )
  5. दताना  जादों रियासत (18वीं) (इन्दौर ,मध्यप्रदेश )
  6. नौगोन जादों रियासत (18वीं सदी मध्य प्रदेश
  7. पालपुर जादों ठिकाना ( श्योपुर , मध्य प्रदेश )---

यदुवंशी (पौराणिक यादव ) राजपूतों की अन्य शाखा व् उपशाखायें -
 
जब अर्जुन ने यदुवंशियों को द्वारिका से पचनंद (पंजाब )में बसाया था तो उन्होंने अपने आप को अपने पूर्वजों के नाम से अलग अलग शाखाओं में विभाजित कर लिया जिनमें मुख्यरूप से शूरसेनी (हरियाणा ,पंजाब ,हिमाचल जम्बू क्षेत्र के यदुवंशी क्षत्रिय ) जादौ ,बनाफर ,काबा ,जाडेजा ,भाटी ,हाल ,छौंकर ,जस्सा ,उनड़ ,केलण ,रावलोत ,
चुडासमा ,सरबैया ,रायजादा ,पाहू ,पुंगलिया ,
जैसवार ,पोर्च ,बरगला ,जादव/जाधव ,जसावत ,
बरेसरी, टांक  ,आदि आते है।  जय यदुवंश ।जय राजपूताना।।

सन्दर्भ-

  1. ऋग्वेद -दयानद संस्थान ,दिल्ली
  2. यजुर्वेद -दयानन्द संस्थान ,दिल्ली
  3. मनुस्मति -मनु कृत-वेंकटेश्वर प्रेस ,बम्बई
  4. श्रीमद्भागवत महापुराण -गीताप्रेस ,गोरखपुर
  5. संक्षिप्त महाभारत-गीता प्रेस ,गोरखपुर
  6. वायुपुराण
  7. विष्णुपुराण
  8. हरिवंश पुराण
  9. मत्स्यपुराण
  10. अग्नि पुराण
  11. रामायण तुलसी एवं बालमिक कृत
  12. सूरसागर महात्मा सुरदास
  13. राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
  14. हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
  15. हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
  16. भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
  17. राजपूताने का प्राचीन इतिहास -पं0 गौरीशंकर ओझा
  18. गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
  19. राजपूताने का इतिहास -जगदीस सिंह गहलोत
  20. यदुवंश का इतिहास - महावीर सिंह यदुवंशी
  21. ब्रज का सांस्कृतिक इतिहास प्रथम भाग -प्रभु दयाल मित्तल
  22. मथुरा -ए डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर -ग्रोउस
  23. ब्रज का इतिहास प्रथम खण्ड-कृष्णदत्त वाजपेयी
  24. मथुरा जनपद का राजनैतिक इतिहास-प्रो0 चिन्तामणि शुक्ल
  25. प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग-,सत्यकेतु विद्याशंकर
  26. विद्याभवन राष्ट्रभाषा ग्रंथमाला पुराण -विमर्श -आचार्य बलदेव उपाध्याय
  27. प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य -बाबू बृन्दावन दास
  28. प्राचीन भारत का इतिहास रमाशंकर त्रिपाठी
  29. पाणिनीकालीन भारतवर्ष -डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल
  30. दकन का प्राचीन इतिहास -जी0 यजदानी
  31. राजपूत आफ सौराष्ट्र -वीरभद्र सिंह
  32. सुर वंश का इतिहास -डा0 शिव बिन्देश्वरी प्रसास
  33. गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट - पी 0 पोवलेट
  34. भारतीय पूरा -इतिहास कोश-अरुण
  35. ऐष्यन्त इंडियन हिस्टारिकल ट्रेडिसन -पाजितर
  36. अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजपूत -सी0 वी0 वैद्य
  37. जादों वंशियों का इतिहास -करौली का विजयपाल ,न019/27 ,अलवर पुरालेखय ,राजस्थान ,आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
  38. यादव वंशों  का इतिहास  संवत 867 विक्रमी से 1094 तक ,न0 269,8/27 ,अलवर पुरालेखीय , राज0 आर्काइव्ज आफिस ,बीकानेर
  39. जैसलमेर ख्यात --डा0 नारायण सिंह भाटी
  40. करौली ख्यात एवं करौली पोथी

लेखक – डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन  
गांव-लढोता, सासनी 
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश,
प्राचार्य ,राजकीय कन्या महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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