Prayagraj : प्रयागराज में नाटक ‘कथा’ ने प्रेम और पानी बचाने का मार्मिक संदेश दिया
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के संयुक्त आयोजन में चल रहे भारत रंग महोत्सव के दौरान बिहार की द फैक्ट आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी ने
प्रयागराज के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में मंच पर धुंधली रोशनी फैली। ढोलक की धीमी थाप के साथ कथाकार की आवाज गूंजी कि कहानी सिर्फ शब्द नहीं होती, वह समय की सांस होती है जो हर दौर में जिंदा रहती है। फिर खुला एक ऐसा रंगमंच जहां शब्द जीवंत दृश्य बन गए। संवेदनाएं पात्रों में उतर आईं और पुरानी यादें आज के समय से टकराने लगीं। दर्शक खुद को उस दुनिया में पाए जहां प्रेम सूखते नदियों की तरह पुकार रहा था और पानी अधूरे रिश्तों की तरह बचाव की मांग कर रहा था। नाटक ने याद दिलाया कि मानवता बचानी है तो सबसे पहले प्रेम और पानी को बचाना होगा क्योंकि ये जीवन के दो सबसे जरूरी आधार हैं।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के संयुक्त आयोजन में चल रहे भारत रंग महोत्सव के दौरान बिहार की द फैक्ट आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी ने नाटक ‘कथा’ का मंचन किया। प्रवीण कुमार गुंजन के निर्देशन में यह प्रस्तुति बहुत प्रभावशाली रही। नाटक में कथिक गुरिया और लोचन के जीवन के जरिए प्रेम और जल संरक्षण जैसे गहरे विषयों को संवेदनशील ढंग से दिखाया गया। कथिक का मानना है कि दुनिया बचानी है तो प्रेम और पानी इन दो तत्वों को पहले बचाना जरूरी है।
प्रस्तुति में दिखाया गया कि समय की कठोर गति अक्सर नरम भावनाओं को कुचल देती है या उन्हें कठोर बना देती है। पानी के संघर्ष को प्रेम के संघर्ष के प्रतीक के रूप में पेश कर नाटक ने सामाजिक और वर्गीय मुद्दों पर गहरा विमर्श किया। कविता की लय, संगीत की धुन, मजबूत संवाद, भावुक अभिनय और संतुलित रंग प्रयोग ने नाटक को दमदार बनाया। दर्शक भावुक होकर इसे देखते रहे और अंत तक जुड़े रहे।
मंच पर शिवांगी त्रिपाठी, चंदन कुमार वत्स, वैभव सिंह, आयशा सिंह यादव, कमलेश ओझा और देवानंद सिंह ने शानदार अभिनय किया। सबने अपनी भूमिकाओं में जान डाल दी और दर्शकों की तारीफ बटोरी। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आभा मधुर ने किया।
नाटक ने प्रेम की सूखती भावनाओं और पानी की तड़प को जोड़कर एक गहरा संदेश दिया। यह बताता है कि दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं और इन्हें बचाने की जिम्मेदारी सबकी है। प्रस्तुति ने रंगमंच की ताकत दिखाई कि कैसे एक कहानी समाज को सोचने पर मजबूर कर सकती है।
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