वाह रे यूपी पुलिस, 'रामवीर' की जगह 'राजवीर' को भेज दिया जेल, खुद को सही साबित करने में लग गये 17 साल
2012 में यह मामला मैनपुरी की अदालत में स्थानांतरित हुआ। अगले 13 साल तक राजवीर को लगभग 300 सुनवाइयों में कोर्ट जाना पड़ा। इस दौरान उनकी जिंदगी पूरी तरह
मैनपुरी में पुलिस की गलती ने बर्बाद किए 17 साल, निर्दोष राजवीर को कोर्ट ने किया बरी
मैनपुरी : उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में पुलिस की एक छोटी-सी गलती ने 62 वर्षीय राजवीर सिंह यादव की जिंदगी के 17 साल बर्बाद कर दिए। पुलिस ने उनके भाई रामवीर सिंह यादव की जगह गलती से उनका नाम गिरोहबंद अधिनियम (गैंगस्टर एक्ट) के एक मामले में दर्ज कर दिया। इस गलती के कारण राजवीर को 22 दिन जेल में बिताने पड़े और 17 साल तक कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े। आखिरकार, 24 जुलाई 2025 को अपर जिला और सत्र न्यायाधीश (विशेष गैंगस्टर एक्ट कोर्ट) स्वप्नदीप सिंहल ने राजवीर को बरी कर दिया और पुलिस की लापरवाही की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश भी दिए।
यह मामला 31 अगस्त 2008 को शुरू हुआ, जब मैनपुरी के शहर कोतवाली थाने में तत्कालीन थाना प्रभारी ओमप्रकाश ने नगला भट गांव के चार लोगों मनोज यादव, प्रवेश यादव, भोला यादव और रामवीर सिंह यादव के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया। यह मामला एक पंचायत चुनाव से जुड़े विवाद के बाद हत्या के प्रयास का था। बाद में इस मामले में गिरोहबंद अधिनियम की धाराएं भी जोड़ी गईं। लेकिन पुलिस ने गलती से रामवीर की जगह उनके बड़े भाई राजवीर का नाम दर्ज कर लिया।
1 दिसंबर 2008 को दन्नाहार थाने के तत्कालीन उपनिरीक्षक शिवसागर दीक्षित ने राजवीर को गिरफ्तार कर लिया। राजवीर ने आगरा की विशेष गैंगस्टर एक्ट कोर्ट में दावा किया कि उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उन्हें गलत फंसाया गया है। 22 दिसंबर 2008 को सुनवाई के दौरान थाना प्रभारी ओमप्रकाश ने स्वीकार किया कि राजवीर का नाम गलती से दर्ज हुआ था और असली आरोपी उनका भाई रामवीर था। इसके बावजूद, जांच अधिकारी ने इस गलती को सुधारने के बजाय राजवीर के खिलाफ ही चार्जशीट दाखिल कर दी। उसी दिन कोर्ट ने राजवीर को जमानत पर रिहा कर दिया, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ।
2012 में यह मामला मैनपुरी की अदालत में स्थानांतरित हुआ। अगले 13 साल तक राजवीर को लगभग 300 सुनवाइयों में कोर्ट जाना पड़ा। इस दौरान उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। उनके बेटे गौरव को स्कूल छोड़कर खेतों में मजदूरी करनी पड़ी। राजवीर की दो बेटियों में से एक विशेष जरूरतों वाली है, और उनके परिवार को सामाजिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। राजवीर का कहना है कि इस गलती ने उनकी जिंदगी को बर्बाद कर दिया। उनकी कमाई खत्म हो गई, और समाज में उनकी इज्जत को ठेस पहुंची।
24 जुलाई 2025 को विशेष न्यायाधीश स्वप्नदीप सिंहल ने राजवीर को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस की घोर लापरवाही के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को 22 दिन जेल में रहना पड़ा और 17 साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। कोर्ट ने मैनपुरी के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि इस गलती के लिए जिम्मेदार अधिकारियों विशेष रूप से तत्कालीन थाना प्रभारी ओमप्रकाश और उपनिरीक्षक शिवसागर दीक्षित के खिलाफ कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह लापरवाही सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी को प्रभावित नहीं करती, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठाती है।
सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर लोगों में गुस्सा दिखा। कई यूजर्स ने लिखा कि पुलिस की गलती ने एक निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी बर्बाद कर दी। एक यूजर ने लिखा, "17 साल कोर्ट के चक्कर काटने के बाद राजवीर को न्याय मिला, लेकिन क्या कोई उनके खोए हुए समय को लौटा सकता है?" एक अन्य यूजर ने सवाल उठाया, "पुलिस की ऐसी गलतियों के लिए जिम्मेदारी कौन लेगा?" कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं सिस्टम में सुधार की जरूरत को दिखाती हैं।
राजवीर के वकील विनोद कुमार यादव ने बताया कि उनके मुवक्किल ने शुरू से ही अपनी बेगुनाही की बात कही थी। उन्होंने कहा कि पुलिस ने न केवल गलत नाम दर्ज किया, बल्कि गलती सुधारने का मौका मिलने के बावजूद चार्जशीट में राजवीर का नाम ही रखा। वकील ने कोर्ट के फैसले की सराहना की और कहा कि यह अन्याय के खिलाफ एक बड़ी जीत है। उन्होंने यह भी मांग की कि राजवीर को उनके नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा दिया जाए।
मैनपुरी पुलिस ने इस मामले पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। हालांकि, पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार को कोर्ट के आदेश के बाद जांच शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की गलतियां आम हैं, और कई बार निर्दोष लोग पुलिस की लापरवाही का शिकार बन जाते हैं।
यह मामला पुलिस सुधारों की जरूरत को सामने लाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस को अपने रिकॉर्ड और जांच प्रक्रिया में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। कई बार जल्दबाजी या लापरवाही में निर्दोष लोग फंस जाते हैं, और उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है। राजवीर का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। उनके बेटे गौरव ने कहा, "मेरे पिता ने 17 साल तक संघर्ष किया। अब हमें न्याय मिला है, लेकिन हमारा परिवार कभी पहले जैसा नहीं हो सकता।"
इस फैसले ने न केवल राजवीर और उनके परिवार को राहत दी है, बल्कि यह भी दिखाया है कि न्याय में देरी कितनी महंगी पड़ सकती है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह मामला पुलिस और प्रशासन के लिए एक सबक है कि वे अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लें, ताकि भविष्य में कोई और निर्दोष व्यक्ति इस तरह की यातना न झेले।
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