Sambhal : बुर्के पर बयान बना सियासी मुद्दा, धीरेंद्र शास्त्री व तमन्ना मलिक पर AIMIM ने कहा आस्था और पहनावे पर किसी का हक़ नहीं
सय्यद असलम ने बुर्के के सवाल पर ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि जब रानी लक्ष्मीबाई शहीद हुई थीं, तब उनके साथ एक बुर्का पहनने वाली महिला भी थीं, जो अंत तक उनके
Report : उवैस दानिश, सम्भल
धार्मिक संत धीरेंद्र शास्त्री के देश की बेटियों को दुर्गा-काली बनने और बुर्के से परहेज़ करने संबंधी बयान पर सियासी और सामाजिक प्रतिक्रियाएं तेज़ हो गई हैं। इसी कड़ी में AIMIM के प्रदेश महासचिव सय्यद असलम ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि धीरेंद्र शास्त्री की छवि केवल मुसलमानों में ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हिंदुओं के बीच भी अच्छी नहीं है। उनके मुताबिक़, ऐसे बयान समाज को जोड़ने के बजाय बांटने का काम करते हैं और यह सब सत्ताधारी दल को खुश करने के लिए कहा जाता है।
सय्यद असलम ने बुर्के के सवाल पर ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि जब रानी लक्ष्मीबाई शहीद हुई थीं, तब उनके साथ एक बुर्का पहनने वाली महिला भी थीं, जो अंत तक उनके साये की तरह रहीं और शहीद हुईं। इससे साफ है कि पहनावा किसी की देशभक्ति या साहस का पैमाना नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आज देश बेरोज़गारी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन कुछ लोग इन मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए विवादित बयान देते हैं। वहीं हरिद्वार से कांवड़ लाने को लेकर तमन्ना मलिक के विरोध पर सय्यद असलम ने कहा कि यह उनका निजी विश्वास और भावना है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां हर नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांवड़ियों की सेवा करना सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। सम्भल सांसद और कुछ मौलानाओं द्वारा विरोध और फ़तवों पर AIMIM नेता ने कहा कि इस तरह के फ़तवे इस्लाम की सही भावना को नहीं दर्शाते। संविधान सभी को बराबरी और स्वतंत्रता का अधिकार देता है और किसी की आस्था पर रोक लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
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