हिस्ट्रीशीट रद्द कराने के लिए आशुतोष की हाई कोर्ट में दस्तक, पुलिस की निगरानी को बताया असंवैधानिक।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी याचिका दायर की गई है, जिसने पुलिस प्रशासन

May 6, 2026 - 14:20
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हिस्ट्रीशीट रद्द कराने के लिए आशुतोष की हाई कोर्ट में दस्तक, पुलिस की निगरानी को बताया असंवैधानिक।
हिस्ट्रीशीट रद्द कराने के लिए आशुतोष की हाई कोर्ट में दस्तक, पुलिस की निगरानी को बताया असंवैधानिक।
  • पुलिस रिकॉर्ड से नाम हटवाने के लिए कानूनी लड़ाई, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब
  • मौलिक अधिकारों के हनन का आरोप, आशुतोष ने अपनी हिस्ट्रीशीट को दी उच्च न्यायालय में चुनौती

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी याचिका दायर की गई है, जिसने पुलिस प्रशासन और न्यायिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। बहुचर्चित अपराधी और राजनीतिक गलियारों में अपनी पहचान रखने वाले आशुतोष ने पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज अपनी 'हिस्ट्रीशीट' को चुनौती देते हुए उसे तत्काल प्रभाव से रद्द करने की गुहार लगाई है। आशुतोष का तर्क है कि उनके खिलाफ दर्ज अधिकांश मामलों में या तो उन्हें बरी कर दिया गया है या पुलिस के पास उनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। यह मामला कानून के उन प्रावधानों पर केंद्रित है जो किसी व्यक्ति की निगरानी और उसके मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की व्याख्या करते हैं। प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर की गई इस याचिका में आशुतोष ने उत्तर प्रदेश पुलिस के उस निर्णय को चुनौती दी है, जिसके तहत उन्हें एक आदतन अपराधी मानते हुए उनकी हिस्ट्रीशीट खोली गई थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष यह दलील पेश की है कि पुलिस ने नियमों को ताक पर रखकर यह कार्रवाई की है। याचिका में उल्लेख किया गया है कि हिस्ट्रीशीट खोलने के लिए जो कानूनी प्रक्रिया और शर्तों का पालन होना चाहिए, वह इस मामले में पूरी तरह नदारद है। आशुतोष का कहना है कि वर्तमान में उनके खिलाफ ऐसा कोई सक्रिय मामला नहीं है जो समाज की शांति के लिए गंभीर खतरा पैदा करता हो, फिर भी पुलिस उन्हें बार-बार परेशान करने के उद्देश्य से हिस्ट्रीशीटर की सूची में बनाए हुए है।

याचिका में विशेष रूप से इस बात पर बल दिया गया है कि पुलिस रेगुलेशन के पैरा 228 और उसके बाद के प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा रहा है। आशुतोष का दावा है कि उनके खिलाफ दर्ज पुराने मामलों में न्यायालय द्वारा उन्हें दोषमुक्त किया जा चुका है। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी आपराधिक गतिविधि में संलिप्त नहीं पाया जाता है, तो उसकी हिस्ट्रीशीट बंद की जा सकती है या उसे 'क' श्रेणी से हटाकर निगरानी मुक्त किया जा सकता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि पुलिस केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा को जीवन भर के लिए दांव पर नहीं लगा सकती, क्योंकि इससे व्यक्ति के सामाजिक जीवन और उसके परिवार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। न्यायालय ने इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और संबंधित जिले के पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने पुलिस विभाग से आशुतोष के खिलाफ दर्ज सभी पुराने और वर्तमान मुकदमों का विस्तृत विवरण मांगा है। साथ ही, पुलिस को यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि हिस्ट्रीशीट को जारी रखने के पीछे वर्तमान में क्या ठोस आधार मौजूद हैं। हाई कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी व्यक्त की है कि कई मामलों में पुलिस बिना किसी ठोस जांच के केवल संदेह के आधार पर निगरानी की अवधि को बढ़ाती रहती है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में सरकार को अपना शपथ पत्र दाखिल करना होगा, जिसमें हिस्ट्रीशीट के औचित्य को साबित करना होगा।

क्या होती है हिस्ट्रीशीट और इसके नियम?

पुलिस नियमावली के अनुसार, हिस्ट्रीशीट उन अपराधियों के लिए खोली जाती है जो आदतन अपराध करते हैं या जिनके समाज में सक्रिय रहने से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर होता है। इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों, 'ए' और 'बी' में बांटा जाता है। 'ए' श्रेणी में उन अपराधियों को रखा जाता है जिनकी गतिविधियां अनियंत्रित होती हैं और 'बी' श्रेणी में वे होते हैं जिन पर केवल निगरानी की आवश्यकता होती है। न्यायालय ने पूर्व में कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि हिस्ट्रीशीट किसी व्यक्ति को बदनाम करने का जरिया नहीं बननी चाहिए और इसकी समय-समय पर समीक्षा अनिवार्य है।

आशुतोष के पक्ष की ओर से यह भी कहा गया है कि पुलिस की इस कार्रवाई के कारण उनकी राजनीतिक और सामाजिक छवि धूमिल हो रही है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस राजनीतिक दबाव में काम कर रही है और उन्हें चुनाव लड़ने या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने से रोकने के लिए इस पुराने रिकॉर्ड का सहारा ले रही है। अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि आशुतोष अब एक शांतिप्रिय नागरिक के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं और पिछले कई वर्षों से उनके खिलाफ कोई भी नई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में, पुलिस की निरंतर निगरानी उनके निजता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है।

दूसरी ओर, सरकारी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हिस्ट्रीशीट खोलना पुलिस का एक प्रशासनिक निर्णय है, जो क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाता है। उन्होंने दलील दी कि केवल कुछ मामलों में बरी होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति का आपराधिक स्वभाव बदल गया है। पुलिस का मानना है कि आशुतोष जैसे प्रभावशाली अपराधियों की हिस्ट्रीशीट बंद करने से गवाहों में डर पैदा हो सकता है और क्षेत्र में अपराध की नई लहर शुरू हो सकती है। सरकार का कहना है कि पुलिस के पास ऐसे खुफिया इनपुट हैं जो आशुतोष की गुप्त गतिविधियों की ओर इशारा करते हैं, और इसी आधार पर उनकी निगरानी जारी रखना कानूनन सही है। न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल रिकॉर्ड के आधार पर फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह देखेगा कि क्या वास्तव में याचिकाकर्ता के व्यवहार में सुधार आया है। अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया है कि वे उन सभी साक्ष्यों को पेश करें जिनके आधार पर पिछले तीन वर्षों में आशुतोष की हिस्ट्रीशीट का नवीनीकरण किया गया था। यह मामला अब न केवल आशुतोष के लिए बल्कि उन सभी व्यक्तियों के लिए एक उदाहरण बन सकता है जो पुलिस रिकॉर्ड में सुधार की मांग कर रहे हैं। यदि हाई कोर्ट आशुतोष के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो इससे पुलिस की हिस्ट्रीशीट प्रबंधन प्रक्रिया में बड़े बदलाव की संभावना पैदा हो जाएगी।

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