शिवसेना UBT में फिर बड़ी बगावत के आसार- उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं से राजनीतिक तापमान चरम पर

भारतीय राजनीति के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण राज्यों में शुमार महाराष्ट्र के भीतर एक बार फिर बहुत बड़े सियासी उलटफेर

Jun 13, 2026 - 11:54
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शिवसेना UBT में फिर बड़ी बगावत के आसार- उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं से राजनीतिक तापमान चरम पर
शिवसेना UBT में फिर बड़ी बगावत के आसार- उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं से राजनीतिक तापमान चरम पर

 By Vijay Laxmi Singh (Editor- In- Chief)

  • महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में मची भारी हलचल- लोकसभा में संख्या बल बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने कसी कमर
  • संसदीय ताकत के पुनर्गठन की रणनीतिक तैयारी- पश्चिम बंगाल के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े सूबे में नए राजनीतिक समीकरण बनाने का प्रयास

भारतीय राजनीति के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण राज्यों में शुमार महाराष्ट्र के भीतर एक बार फिर बहुत बड़े सियासी उलटफेर और अंदरूनी उठापटक की गूंज सुनाई देने लगी है। राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की नजरें अब देश की संसद के निचले सदन यानी लोकसभा के भीतर अपने संख्या बल को और अधिक मजबूत तथा प्रभावी बनाने पर पूरी तरह से टिक गई हैं। इस रणनीतिक योजना के अंतर्गत यह प्रबल संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के भीतर एक बहुत बड़ी और निर्णायक फूट पड़ सकती है। इस संभावित दलबदल और राजनीतिक पुनर्गठन को लेकर राज्य से लेकर देश की राजधानी तक भारी सरगर्मी देखी जा रही है, जो आने वाले समय में सूबे के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नया मोड़ दे सकती है।

इस बड़े सियासी घटनाक्रम की पृष्ठभूमि को देखें तो पूर्वी भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए बड़े राजनीतिक बदलावों और सांगठनिक तोड़-फोड़ के बाद अब एनडीए के रणनीतिकारों ने अपना पूरा ध्यान पश्चिमी भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण और आर्थिक रूप से समृद्ध राज्य पर केंद्रित कर दिया है। लोकसभा के भीतर अपनी सीटों की संख्या और विधायी प्रभाव को एक नए शिखर पर ले जाने के उद्देश्य से एनडीए घटक दल उन विपक्षी सांसदों और जनप्रतिनिधियों से लगातार संपर्क साध रहे हैं जो वर्तमान में अपने मूल दलों के भीतर सांगठनिक निर्णयों या वैचारिक दिशा से असंतुष्ट चल रहे हैं। महाराष्ट्र में अड़तालीस लोकसभा सीटें हैं, जो उत्तर प्रदेश के बाद देश में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है, यही वजह है कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में इस राज्य का हर एक राजनीतिक कदम अत्यंत निर्णायक और दूरगामी साबित होता है।

राजनीतिक गलियारों और नीतिगत चर्चाओं से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, उद्धव ठाकरे के खेमे में मौजूद नौ लोकसभा सांसदों में से एक बहुत बड़ा धड़ा इस समय अपने राजनीतिक भविष्य और पार्टी की रणनीतियों को लेकर गहरे असमंजस और असंतोष की स्थिति से गुजर रहा है। चर्चाएं इस बात की हैं कि इस गुट के लगभग सात सांसद वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली और महाविकास अघाड़ी गठबंधन के भीतर टिकटों और क्षेत्रों के बंटवारे को लेकर पूरी तरह से सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। इन असंतुष्ट सांसदों का झुकाव वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली वास्तविक और चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त शिवसेना तथा भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की तरफ निरंतर बढ़ता जा रहा है, जो ठाकरे परिवार के लिए एक और बहुत बड़ा सांगठनिक झटका साबित हो सकता है। इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि यदि शिवसेना UBT के दो-तिहाई से अधिक सांसद एक साथ पाला बदलते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की तलवार नहीं लटकेगी। वे कानूनी रूप से सीधे तौर पर एनडीए के घटक दल में शामिल हो सकते हैं, जिससे संसद के भीतर विपक्ष का खेमा काफी कमजोर हो जाएगा और सत्तापक्ष को एक अभूतपूर्व सुपर मेजॉरिटी हासिल हो सकती है।

यदि यह संभावित राजनीतिक टूट धरातल पर सच साबित होती है, तो यह शिवसेना के इतिहास में पिछले कुछ वर्षों के भीतर होने वाला दूसरा सबसे बड़ा विभाजन दर्ज किया जाएगा। इससे पहले वर्ष दो हजार बाईस में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों की एक बहुत बड़ी बगावत हुई थी, जिसने राज्य की महाविकास अघाड़ी सरकार को पूरी तरह से अपदस्थ कर दिया था और बाद में असली पार्टी का नाम और सिंबल भी उद्धव ठाकरे के हाथ से निकल गया था। अब ठीक उसी तरह की पटकथा देश की संसद के भीतर सांसदों के स्तर पर दोहराए जाने की सुगबुगाहट है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय दलों के भीतर अपने अस्तित्व और राजनीतिक प्रासंगिकता को बचाए रखने का आंतरिक संकट कितना गहरा चुका है।

एनडीए खेमे के रणनीतिकारों का यह स्पष्ट मानना है कि लोकसभा में अपनी ताकत को लगातार बढ़ाते रहना देश की विकास यात्रा और विधायी सुधारों को बिना किसी अड़चन के गति देने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी योजना के तहत उन सभी क्षेत्रीय ताकतों को कमजोर करने या उन्हें अपने पाले में लाने का प्रयास किया जा रहा है जो केंद्र सरकार की नीतियों का लगातार कड़ा विरोध करती आई हैं। महाराष्ट्र के भीतर इस खेल को अमलीजामा पहनाने के लिए पर्दे के पीछे कई दौर की मैराथन बैठकें आयोजित होने की भी खबरें हैं, जिसमें असंतुष्ट सांसदों को उनके संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के विकास और आगामी चुनावों में उनके राजनीतिक पुनर्वास को लेकर ठोस और लिखित आश्वासन दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

दूसरी तरफ, इस संभावित बगावत और टूट की खबरों के बीच उद्धव ठाकरे गुट के भीतर हड़कंप की स्थिति निर्मित हो गई है और डैमेज कंट्रोल यानी नुकसान की भरपाई के लिए संगठन के शीर्ष नेताओं ने अपने सभी सांसदों से व्यक्तिगत रूप से संवाद साधना शुरू कर दिया है। पार्टी के रणनीतिकार इसे केवल एक मनोवैज्ञानिक युद्ध और विपक्ष को मानसिक रूप से कमजोर करने की सत्तापक्ष की एक सोची-समझी चाल करार दे रहे हैं। हालांकि, इतिहास गवाह है कि महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी इस प्रकार की अफवाहें या चर्चाएं तेजी से फैलती हैं, तो उनके पीछे कोई न कोई बड़ा ठोस आधार अवश्य मौजूद रहता है, जिसे पूरी तरह से खारिज कर पाना किसी भी राजनीतिक विश्लेषक के लिए संभव नहीं होता।

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