13 लाख का कर्ज चुकाया पर नहीं मिली एनओसी: आईडीएफसी बैंक में किसान ने परिवार संग लगाए ठुमके।
मध्य प्रदेश के धार जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विरोध प्रदर्शन के पारंपरिक तरीकों को एक नया मोड़ दे दिया है। अक्सर
- धार के किसान का गांधीगिरी वाला 'डांस प्रोटेस्ट': बैंक की लेटलतीफी के खिलाफ ढोल-नगाड़ों के साथ अनोखा प्रदर्शन
- सिस्टम की सुस्ती पर भारी पड़ा किसान का संगीत: जब डेढ़ महीने के इंतजार के बाद बैंक को मिला 'म्यूजिकल अल्टीमेटम'
मध्य प्रदेश के धार जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विरोध प्रदर्शन के पारंपरिक तरीकों को एक नया मोड़ दे दिया है। अक्सर हम देखते हैं कि लोग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, नारेबाजी करते हैं या तालाबंदी करते हैं, लेकिन ग्राम चंदवाड़ा के एक किसान विजय पाटीदार ने अपनी समस्या के समाधान के लिए 'म्यूजिकल प्रोटेस्ट' का रास्ता चुना। विजय पाटीदार अपने परिजनों और ढोल बजाने वालों के साथ सीधे आईडीएफसी बैंक की शाखा में दाखिल हो गए। बैंक के भीतर जैसे ही ढोल की थाप गूंजी और किसान ने नाचना शुरू किया, वहां मौजूद कर्मचारी और ग्राहक पूरी तरह से हक्के-बक्के रह गए। यह नजारा जितना मनोरंजक लग रहा था, उसके पीछे की पीड़ा उतनी ही गहरी थी, जो बैंकिंग सिस्टम की कछुआ चाल और आम आदमी की बेबसी को बयां कर रही थी।
किसान विजय पाटीदार की इस नाराजगी की जड़ें एक पुराने कर्ज से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया कि खेती-किसानी और अपनी जरूरतों के लिए उन्होंने आईडीएफसी बैंक से 13 लाख रुपये का किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) लोन लिया था। एक अनुशासित कर्जदार की तरह, उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से पाई-पाई जोड़ी और करीब एक महीने पहले ही पूरे 13 लाख रुपये का भुगतान बैंक को कर दिया। नियम के अनुसार, जैसे ही कोई ग्राहक अपना पूरा ऋण चुका देता है, बैंक की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वह उसे तत्काल या एक निश्चित समय सीमा के भीतर 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) जारी कर दे। एनओसी वह दस्तावेज है जो प्रमाणित करता है कि व्यक्ति अब बैंक का कर्जदार नहीं है और उसकी संपत्ति या जमीन अब गिरवी नहीं रही। हालांकि, विजय पाटीदार के लिए एनओसी हासिल करना किसी जंग जीतने जैसा हो गया था। उन्होंने बताया कि लोन चुकाने के बाद वे पिछले डेढ़ महीने से लगातार बैंक के चक्कर काट रहे थे। हर बार जब वे बैंक अधिकारियों के पास जाते, तो उन्हें कोई न कोई बहाना बनाकर वापस भेज दिया जाता। कभी कहा जाता कि सर्वर डाउन है, तो कभी अधिकारी के मौजूद न होने की बात कही जाती। बैंक प्रशासन उन्हें हर बार एक नई तारीख थमा देता था। बार-बार के आश्वासन और टालमटोल की नीति ने किसान को मानसिक रूप से परेशान कर दिया था। उन्हें लगा कि सीधे तरीके से बात करने पर बैंक प्रबंधन उनकी सुनवाई नहीं कर रहा है, इसलिए उन्होंने अपनी आवाज को ढोल की थाप के जरिए बुलंद करने का फैसला किया।
बैंकिंग लोकपाल और ग्राहकों के अधिकार
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार, कर्ज चुकता होने के बाद बैंक को एक समय सीमा के भीतर दस्तावेज लौटाने और एनओसी देनी होती है। यदि बैंक इसमें जानबूझकर देरी करता है, तो ग्राहक बैंकिंग लोकपाल के पास शिकायत दर्ज करा सकता है। धार की इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि कागजी नियमों के बावजूद धरातल पर ग्राहकों को अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। बैंक के भीतर हुए इस अनोखे प्रदर्शन का असर भी तुरंत देखने को मिला। जैसे ही ढोल की आवाज तेज हुई और मामला सोशल मीडिया के माध्यम से प्रशासन तक पहुँचने की संभावना बढ़ी, बैंक प्रबंधन के माथे पर पसीना आ गया। जो काम पिछले डेढ़ महीने से 'कल-परसों' पर टाला जा रहा था, वह अचानक सक्रियता के साथ होने लगा। बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने बीच-बचाव किया और किसान को शांत करने का प्रयास किया। यह घटना दर्शाती है कि कभी-कभी मौन प्रार्थनाओं या साधारण अर्जियों के बजाय, कुछ ऐसा करना जरूरी हो जाता है जो सिस्टम की नींद उड़ा दे। विजय पाटीदार का कहना था कि वे बैंक को नीचा नहीं दिखाना चाहते थे, बल्कि बस अपना अधिकार चाहते थे ताकि वे भविष्य की योजनाओं पर काम कर सकें।
धार जिले का यह वीडियो अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इसे किसान की सूझबूझ और शांतिपूर्ण विरोध का बेहतरीन उदाहरण मान रहे हैं। बिना किसी हिंसा, तोड़फोड़ या गाली-गलौज के विजय पाटीदार ने बैंक के अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करा दिया। इस घटना ने एक बड़े मुद्दे को भी जन्म दिया है कि क्यों एक आम किसान को अपनी जमा पूंजी जमा करने के बाद भी दर-दर भटकना पड़ता है। सरकारी और निजी बैंकों में एनओसी जारी करने की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। किसानों के लिए उनकी जमीन के कागजात ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होते हैं और उसमें देरी करना उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को बाधित करने जैसा है। इस प्रदर्शन के दौरान बैंक में मौजूद अन्य ग्राहक भी कुछ पल के लिए अपना काम भूलकर इस नजारे को देखने लगे। कई लोगों ने इस बात की सराहना की कि किसान ने अपना आपा नहीं खोया और संगीत को अपना हथियार बनाया। बैंक अधिकारियों ने अंततः विजय पाटीदार को आश्वासन दिया कि उनकी तकनीकी समस्याओं का समाधान कर दिया गया है और जल्द ही उन्हें कागजात सौंप दिए जाएंगे। हालांकि, इस पूरे प्रकरण ने आईडीएफसी बैंक की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। क्या बैंक तभी जागेगा जब कोई ढोल बजाकर उनके दरवाजे पर आएगा? यह सवाल केवल धार का नहीं, बल्कि देश के उन हजारों ग्राहकों का है जो रोज दफ्तरों की धूल फांकते हैं।
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