जबलपुर भेड़ाघाट हादसा: 'लाइफ जैकेट की जरूरत नहीं', पर्यटन निगम के अधिकारी के संवेदनहीन बयान ने सुलगाई गुस्से की चिंगारी
जबलपुर के भेड़ाघाट और धुआंधार क्षेत्र में नौकायन केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक जोखिम भरा साहसिक कार्य भी है। संगमरमर की वादियों के बीच बहती नर्मदा कहीं बहुत शांत दिखती है, तो कहीं अत्यधिक गहरी है। ऐसे में यह तर्क देना कि लाइफ
- सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर मौत का सफर: जलक्रीड़ा के नियमों की सरेआम अनदेखी और जिम्मेदार पदों पर बैठे अफसरों की घोर लापरवाही
- पर्यटन विभाग के दावों की खुली पोल: लाइफ जैकेट को लेकर अधिकारी का विवादित तर्क बना चर्चा का विषय, सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल
मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट में हाल ही में हुए एक दर्दनाक हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। नर्मदा नदी की लहरों के बीच नाव पलटने से हुई जनहानि के बाद अब मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम (MP Tourism Corporation) के एक वरिष्ठ अधिकारी का बयान इस समय विवादों के केंद्र में बना हुआ है। अधिकारी ने सुरक्षा मानकों और विशेष रूप से लाइफ जैकेट की अनिवार्यता को लेकर जो तर्क दिए हैं, उन्होंने न केवल पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है बल्कि पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की सुरक्षा को लेकर सरकारी गंभीरता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब पूरे देश में जल पर्यटन के दौरान सुरक्षा उपकरणों के उपयोग को लेकर सख्त दिशा-निर्देश लागू किए जा रहे हैं। हादसे के बाद जब विभाग की जवाबदेही तय करने की मांग उठी, तो पर्यटन निगम के अधिकारी ने मीडिया के सामने बेहद चौंकाने वाला पक्ष रखा। उनके अनुसार, भेड़ाघाट जैसे शांत जल वाले क्षेत्रों में या छोटी दूरी की नौकायन के दौरान लाइफ जैकेट पहनना 'जरूरी नहीं' है। इस बयान के पीछे अधिकारी का तर्क यह था कि लाइफ जैकेट पहनना पर्यटकों के लिए असुविधाजनक हो सकता है और नाव की क्षमता व पानी के बहाव के हिसाब से इसकी हर बार आवश्यकता नहीं होती। इस तरह का बयान उस समय आया है जब नर्मदा की गहराई और वहां के पथरीले धरातल के कारण पहले भी कई हादसे हो चुके हैं। सुरक्षा मानकों की ऐसी व्याख्या ने प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनशीलता और सुरक्षा के प्रति उनके नजरिए को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है।
जबलपुर के भेड़ाघाट और धुआंधार क्षेत्र में नौकायन केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक जोखिम भरा साहसिक कार्य भी है। संगमरमर की वादियों के बीच बहती नर्मदा कहीं बहुत शांत दिखती है, तो कहीं अत्यधिक गहरी है। ऐसे में यह तर्क देना कि लाइफ जैकेट अनिवार्य नहीं है, तकनीकी और कानूनी दोनों आधारों पर गलत प्रतीत होता है। विशेषज्ञों और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पानी चाहे कितना भी कम हो या शांत हो, मानवीय भूल या तकनीकी खराबी कभी भी नाव को पलट सकती है। ऐसे में लाइफ जैकेट ही वह एकमात्र उपकरण है जो व्यक्ति को डूबने से बचा सकता है। अधिकारी का यह बयान नियमों की अनदेखी करने वाले नाविकों को और अधिक बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है, जिससे भविष्य में बड़े हादसों का खतरा बना रहेगा। पर्यटन निगम के इस रुख के बाद स्थानीय प्रशासन और सरकार की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं। मध्य प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पर्यटकों की जान की सुरक्षा के इंतजाम बेहद लचर नजर आते हैं। अधिकारी द्वारा सुरक्षा मानकों की खुद ही व्याख्या करना और नियमों में ढील देने की बात कहना यह दर्शाता है कि विभाग के भीतर सुरक्षा को लेकर कोई कड़ा प्रोटोकॉल नहीं है। यह पहली बार नहीं है जब भेड़ाघाट में ऐसा हादसा हुआ हो, लेकिन हर बार जांच के नाम पर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। अधिकारी का ताजा बयान अब राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच विरोध का कारण बन गया है, जिससे विभाग के शीर्ष नेतृत्व को सफाई देना भारी पड़ रहा है।
हादसे की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि अक्सर नावों में क्षमता से अधिक पर्यटकों को बैठाया जाता है। भेड़ाघाट में चलने वाली कई नावें पुरानी हैं और उनके पास आधुनिक सुरक्षा उपकरण भी नहीं हैं। जब जिम्मेदार विभाग का बड़ा अधिकारी ही लाइफ जैकेट को गैर-जरूरी बताएगा, तो निजी नाव संचालक नियमों का पालन क्यों करेंगे? इस बयान ने नाविकों को एक तरह से 'क्लीन चिट' देने का काम किया है। अधिकारी के तर्क ने उस सुरक्षा तंत्र की चूलें हिला दी हैं, जिसे सरकार सुरक्षित पर्यटन का आधार बताती है। लोग अब यह पूछ रहे हैं कि क्या पर्यटन निगम किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है या फिर वह लाइफ जैकेट जैसी बुनियादी जरूरत को भी एक 'विकल्प' मानता है। इस विवाद के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार और पर्यटन विभाग पर चौतरफा दबाव बढ़ गया है कि वे इस बयान पर कार्रवाई करें और भेड़ाघाट में नौकायन के नियमों को फिर से परिभाषित करें। सार्वजनिक सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जल पर्यटन स्थलों पर 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाई जानी चाहिए। अधिकारी का यह कहना कि पर्यटकों को असुविधा होती है, जान की कीमत पर दी जाने वाली एक खोखली दलील है। सुरक्षा कभी भी सुविधा के अधीन नहीं हो सकती। जबलपुर प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि धुआंधार और भेड़ाघाट के पूरे स्ट्रेच में बिना लाइफ जैकेट के एक भी नाव पानी में न उतरे। इसके साथ ही, ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करना भी आवश्यक हो गया है ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
What's Your Reaction?









