मऊ कोर्ट की बड़ी कार्रवाई: उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख चेहरों में से एक और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर के लिए कानूनी मुश्किलें खड़ी
- चुनावी जनसभा में 'जूता मारने' की धमकी देना पड़ा महंगा, एमपी-एमएलए कोर्ट ने सुभासपा अध्यक्ष पर कसा शिकंजा
- 2019 के विवादित बयान पर कानूनी तलवार, लगातार अनुपस्थिति के बाद अदालत ने गिरफ्तारी वारंट के दिए आदेश
उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख चेहरों में से एक और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर के लिए कानूनी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मऊ जनपद की एमपी-एमएलए कोर्ट ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया है। यह कानूनी कार्रवाई एक पुराने आपराधिक मामले में बार-बार सम्मन किए जाने के बावजूद अदालत में उपस्थित न होने के कारण की गई है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है, क्योंकि राजभर न केवल एक प्रभावशाली क्षेत्रीय नेता हैं, बल्कि वर्तमान में सरकार का हिस्सा भी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं और बार-बार की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह पूरा मामला आज से लगभग सात साल पहले, यानी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान का है। उस समय चुनावी सरगर्मियां अपने चरम पर थीं और राजनीतिक बयानबाजी की मर्यादाएं टूट रही थीं। 17 मई 2019 को मऊ जिले के हलधरपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रतनपुरा बाजार में सुभासपा की एक विशाल जनसभा आयोजित की गई थी। उस दौर में ओम प्रकाश राजभर भाजपा से गठबंधन तोड़कर अलग चुनाव लड़ रहे थे। आरोप है कि इसी जनसभा के मंच से जनता को संबोधित करते हुए राजभर ने अपना आपा खो दिया और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के प्रति अत्यंत अमर्यादित और भड़काऊ भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने न केवल अपशब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि कार्यकर्ताओं को उकसाते हुए विपक्षी नेताओं को 'जूता मारने' जैसी विवादित धमकी भी दी थी। मंच से दिए गए इस आपत्तिजनक भाषण का संज्ञान लेते हुए प्रशासन ने इसे आदर्श आचार संहिता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन माना था। तत्कालीन उपनिरीक्षक रुद्रभान पाण्डेय ने इस मामले की लिखित शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर हलधरपुर थाने में सुभासपा अध्यक्ष के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया। मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और एमपी-एमएलए कोर्ट डॉ. कृष्ण प्रताप सिंह की अदालत में विचाराधीन है। लंबे समय से इस मामले में कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन मंत्री की ओर से अदालती कार्यवाही में शामिल होने के प्रति उदासीनता बरती जा रही थी।
क्या है गैर-जमानती वारंट (NBW)?
गैर-जमानती वारंट अदालत द्वारा तब जारी किया जाता है जब कोई आरोपी बार-बार सम्मन के बावजूद पेश नहीं होता। इसके जारी होने के बाद पुलिस को अधिकार होता है कि वह संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार कर अदालत में पेश करे। हालांकि, आरोपी उच्च न्यायालय में इसे रद्द कराने या समर्पण कर जमानत लेने का विकल्प चुन सकता है। अदालती कार्यवाही के दौरान यह पाया गया कि ओम प्रकाश राजभर को कई बार कोर्ट में पेश होने के लिए नोटिस जारी किए गए, लेकिन वे निजी व्यस्तताओं या अन्य कारणों का हवाला देकर उपस्थित नहीं हुए। हालिया सुनवाई के दौरान भी जब उनकी ओर से कोई ठोस प्रतिनिधित्व नहीं हुआ, तो न्यायाधीश ने इसे न्याय प्रक्रिया में बाधा माना। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले में आरोप तय होने की प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है और आरोपी की अनुपस्थिति के कारण इसमें देरी हो रही है। इसी के मद्देनजर अदालत ने अब सख्त रास्ता अपनाते हुए उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है और अगली सुनवाई के लिए 16 मई 2026 की तारीख मुकर्रर की है।
इस कानूनी विवाद का एक रोचक पहलू यह भी है कि जिस समय यह बयान दिया गया था, उस समय राजभर और भाजपा के रिश्ते बेहद तल्ख थे। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। सुभासपा अब भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन का हिस्सा है और राजभर स्वयं सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। ऐसे में अपने ही मौजूदा सहयोगियों के खिलाफ अतीत में दिए गए 'जूता मारने' वाले बयान का मामला दोबारा उभरना उनके लिए एक असहज स्थिति पैदा कर रहा है। यह मामला न केवल उनके पुराने तेवरों की याद दिला रहा है, बल्कि गठबंधन की राजनीति के भीतर भी नई चर्चाओं को जन्म दे रहा है। इस तरह के मामलों में अक्सर अदालती वारंट जारी होने के बाद नेता अदालत में आत्मसमर्पण करते हैं और अपनी जमानत याचिका दाखिल करते हैं। राजभर के पास भी यह विकल्प मौजूद है कि वे अगली तारीख से पहले अदालत में हाजिर होकर वारंट को रिकॉल (निरस्त) करवा लें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो पुलिस पर उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने का दबाव बढ़ जाएगा। चूंकि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं, इसलिए यह स्थिति सरकार की छवि के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। उनके वकील अब इस वारंट को चुनौती देने या राहत पाने के लिए कानूनी रास्ते तलाश रहे हैं।
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