भवानीपुर का महासंग्राम- ममता बनर्जी ने खुद संभाला मोर्चा, पोलिंग बूथ के बाहर कुर्सी लगाकर बैठीं मुख्यमंत्री

भवानीपुर सीट पर मुख्यमंत्री का मुकाबला उनके पुराने सहयोगी से हो रहा है, जो अब विपक्षी खेमे के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। सुबह से ही इस विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न वार्डों में तनाव की खबरें आ रही थीं। जब ममता बनर्जी खुद बूथ पर पहुंचीं, तो वहां पहले से ही सुरक्षा

Apr 29, 2026 - 13:39
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भवानीपुर का महासंग्राम- ममता बनर्जी ने खुद संभाला मोर्चा, पोलिंग बूथ के बाहर कुर्सी लगाकर बैठीं मुख्यमंत्री
भवानीपुर का महासंग्राम- ममता बनर्जी ने खुद संभाला मोर्चा, पोलिंग बूथ के बाहर कुर्सी लगाकर बैठीं मुख्यमंत्री

  • बंगाल चुनाव का अंतिम प्रहार: हाई-प्रोफाइल सीट पर भारी तनाव, ममता और विपक्ष के बीच 'बूथ युद्ध' से गरमाया माहौल
  • लोकतंत्र के उत्सव में शक्ति प्रदर्शन: भवानीपुर के रण में ममता बनर्जी का अनोखा अंदाज, गड़बड़ी रोकने के लिए खुद जमीन पर उतरीं

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और निर्णायक चरण के दौरान राज्य की सबसे चर्चित सीट भवानीपुर में सियासी तापमान अपने चरम पर पहुंच गया है। मतदान के दिन एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला जब राज्य की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार ममता बनर्जी स्वयं एक मतदान केंद्र के बाहर कुर्सी लगाकर बैठ गईं। यह घटना भवानीपुर के मित्रा संस्थान स्कूल स्थित पोलिंग बूथ की है, जहां मुख्यमंत्री ने लगभग दो घंटे से अधिक समय बिताया। उनका यह कदम केवल सांकेतिक नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक और रणनीतिक मंशा थी। मुख्यमंत्री का कहना था कि उन्हें कई बूथों से धांधली और मतदाताओं को रोकने की शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद उन्होंने खुद स्थिति का जायजा लेने का निर्णय लिया। उनकी उपस्थिति ने न केवल उनके समर्थकों में उत्साह भर दिया, बल्कि चुनाव अधिकारियों और सुरक्षा बलों पर भी एक मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया।

भवानीपुर सीट पर मुख्यमंत्री का मुकाबला उनके पुराने सहयोगी से हो रहा है, जो अब विपक्षी खेमे के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं। सुबह से ही इस विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न वार्डों में तनाव की खबरें आ रही थीं। जब ममता बनर्जी खुद बूथ पर पहुंचीं, तो वहां पहले से ही सुरक्षा बलों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का भारी जमावड़ा था। मुख्यमंत्री ने वहां बैठकर न केवल अपने चुनावी एजेंटों से फीडबैक लिया, बल्कि मोबाइल के जरिए चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों को सीधे तौर पर अपनी शिकायतें भी दर्ज कराईं। उन्होंने आरोप लगाया कि गैर-बंगाली भाषी लोग और बाहरी गुंडे मतदाताओं को डरा-धमका रहे हैं। उनका बूथ के बाहर बैठना इस बात का प्रमाण था कि वे इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही हैं और अपने गढ़ को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इस घटना के दौरान पोलिंग बूथ के बाहर का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया था। एक तरफ मुख्यमंत्री और उनके सुरक्षाकर्मी थे, तो दूसरी तरफ विपक्षी दलों के समर्थक भी नारेबाजी कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने वहां बैठे-बैठे ही मीडिया से बात करते हुए कहा कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए यहां खड़ी हैं। उन्होंने दावा किया कि केंद्रीय सुरक्षा बल निष्पक्ष होकर काम नहीं कर रहे हैं और कुछ खास क्षेत्रों में मतदाताओं को वापस भेजा जा रहा है। इस दौरान उन्होंने कई बार अपनी घड़ी देखी और अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे एक-एक मतदाता को सुरक्षित बूथ तक लाने की व्यवस्था करें। मुख्यमंत्री का यह 'कुर्सी सत्याग्रह' बंगाल की राजनीति में एक नई चर्चा का विषय बन गया है, जिसने अंतिम चरण के मतदान को और भी दिलचस्प बना दिया है।

भवानीपुर का राजनीतिक कद

भवानीपुर केवल एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह बंगाल की सत्ता का केंद्र मानी जाती है। ममता बनर्जी यहां से कई बार चुनाव जीत चुकी हैं। इस बार इस सीट पर मुकाबला इसलिए भी खास है क्योंकि यह मुख्यमंत्री की अपनी प्रतिष्ठा और उनके राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन गई है। 11 बजे तक यहां लगभग 37 प्रतिशत मतदान हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री के बूथ पर पहुंचने के बाद मतदान की गति में और तेजी देखी गई। मतदान केंद्र के बाहर ममता बनर्जी के इस रुख ने चुनाव आयोग को भी हरकत में आने पर मजबूर कर दिया। आयोग ने तुरंत मामले का संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की। प्रशासन के लिए चुनौती यह थी कि एक सिटिंग मुख्यमंत्री की सुरक्षा और मतदान प्रक्रिया की निष्पक्षता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। मुख्यमंत्री के समर्थकों ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल के कार्यकर्ता पास की गलियों में छिपकर मतदाताओं को आतंकित कर रहे हैं। वहीं विपक्ष ने दावा किया कि मुख्यमंत्री खुद पोलिंग बूथ पर बैठकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रही हैं। इन आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच भवानीपुर की गलियां नारों और विरोध प्रदर्शनों से गूंजती रहीं, जिससे पुलिस को कई बार भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मोर्चा संभालना पड़ा।

जैसे-जैसे दोपहर का समय करीब आया, तनाव और बढ़ गया। मुख्यमंत्री के वहां से जाने के बाद भी उनके समर्थक भारी संख्या में डटे रहे। भवानीपुर के इस संग्राम का असर आसपास की अन्य सीटों पर भी देखने को मिला, जहां मतदाताओं के बीच भारी ध्रुवीकरण साफ तौर पर महसूस किया जा रहा था। इस बार के चुनाव में भाषा और संस्कृति के मुद्दे हावी रहे हैं, और भवानीपुर की घटना ने इन मुद्दों को और हवा दे दी है। मुख्यमंत्री का वहां बैठकर सीधे चुनाव आयोग को चुनौती देना यह संकेत था कि उन्हें प्रशासन पर पूरा भरोसा नहीं है। यह स्थिति राज्य में कानून-व्यवस्था और स्वतंत्र चुनाव कराने की क्षमता पर भी बड़े सवाल खड़े करती है, जिसका उत्तर अब चुनाव के नतीजों में ही छिपा है। तकनीकी तौर पर देखें तो इस बार चुनाव आयोग ने चप्पे-चप्पे पर कैमरे और ड्रोन की मदद से निगरानी की व्यवस्था की थी। इसके बावजूद भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर मुख्यमंत्री का सड़क पर उतरना यह दर्शाता है कि जमीनी हकीकत कागजी दावों से अलग हो सकती है। 142 सीटों पर चल रहे इस दूसरे चरण के मतदान में भवानीपुर की घटना ने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा आम है कि यदि मुख्यमंत्री को अपने ही क्षेत्र में बूथ पर बैठना पड़ रहा है, तो अन्य इलाकों में संघर्ष कितना भीषण होगा। यह चुनाव न केवल नेतृत्व की परीक्षा है, बल्कि बंगाल की जनता के मिजाज को समझने का एक बड़ा अवसर भी है।

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