प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए बुरी खबर- कीमतों में उछाल के बीच केंद्र सरकार ने गरीब परिवारों को दिया एक और बड़ा झटका
देश की गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित की
- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की संख्या सालाना नौ से घटाकर की गई मात्र चार
- सालाना कोटे की सीमा समाप्त होने के बाद पांचवें घरेलू सिलेंडर के लिए उपभोक्ताओं को चुकानी होगी बिना सब्सिडी वाली पूरी बाजार कीमत
देश की गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित की जा रही केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को लेकर एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला नीतिगत बदलाव सामने आया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नए आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकार ने उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को मिलने वाले रियायती यानी सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की वार्षिक संख्या में एक बार फिर से भारी कटौती कर दी है। इस नए और कड़े फैसले के लागू होने के बाद अब इस योजना के अंतर्गत आने वाले करोड़ों परिवारों को एक वित्तीय वर्ष के भीतर केवल पहले चार गैस सिलेंडरों की रीफिलिंग पर ही तीन सौ रुपये की प्रत्यक्ष नकद सब्सिडी (डीबीटी) प्रदान की जाएगी। सरकार के इस बड़े कदम से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के उन लाखों गरीब परिवारों के घरेलू बजट पर अत्यधिक विपरीत असर पड़ने की संभावना है जो पूरी तरह से इस योजना पर निर्भर थे।
इस बड़े और कड़े नीतिगत बदलाव की पृष्ठभूमि और इसके क्रमिक इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो यह साफ होता है कि समय के साथ इस जनकल्याणकारी योजना के विधिक स्वरूप में काफी बदलाव आ चुके हैं। जब वर्ष दो हजार सोलह में इस योजना की शुरुआत की गई थी, तब इसके लाभार्थियों को साल भर में कुल बारह घरेलू सिलेंडरों पर पूरी सब्सिडी देने का प्रावधान सुनिश्चित किया गया था, ताकि लोग पारंपरिक चूल्हों को छोड़कर पूरी तरह गैस की ओर आकर्षित हो सकें। हालांकि, पिछले वर्ष सरकार ने बजटीय संतुलन और संसाधनों की उपलब्धता का हवाला देते हुए इस वार्षिक कोटे को बारह से घटाकर नौ सिलेंडरों पर सीमित कर दिया था। अब ताजा प्रशासनिक फैसले के तहत इस कोटे को और अधिक संकुचित करते हुए केवल चार सिलेंडरों तक सीमित कर दिया गया है, जिसने मध्यम और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं की चिंताओं को बहुत अधिक बढ़ा दिया है।
प्रशासनिक स्तर पर इस कटौती के पीछे की वैधानिक अनिवार्यता और तर्कों को स्पष्ट करते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रवीण मल खानूजा ने एक कूटनीतिक दृष्टिकोण सामने रखा है। आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा यह निर्णय देश भर के उज्ज्वला लाभार्थियों के वास्तविक घरेलू गैस उपभोग के आंकड़ों का बेहद गहनता और सूक्ष्मता से विश्लेषण करने के बाद ही लिया गया है। डेटा के अनुसार, उज्ज्वला योजना के अंतर्गत आने वाले अधिकांश ग्रामीण परिवारों की औसत वार्षिक गैस खपत बमुश्किल चार से पांच सिलेंडरों के आसपास ही पाई गई है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पूरक ईंधन के रूप में पारंपरिक साधनों का आंशिक उपयोग किया जाता है। अतः सरकार ने अपनी वित्तीय सहायता को वास्तविक औसत घरेलू खपत के स्तर के अधिक अनुरूप और व्यावहारिक बनाने के उद्देश्य से ही इस कोटे को चार पर फ्रीज किया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी विभिन्न सैन्य संघर्षों और आपूर्ति बाधाओं के कारण वर्तमान में एक घरेलू एलपीजी सिलेंडर की वास्तविक आपूर्ति लागत सोलह सौ रुपये के पार पहुंच चुकी है। वर्तमान में आम उपभोक्ताओं को यह सिलेंडर 942 रुपये में मिल रहा है, जिसका अर्थ यह है कि सरकार और तेल कंपनियां प्रति सिलेंडर लगभग सात सौ रुपये का अप्रत्यक्ष घाटा खुद उठा रही हैं। उज्ज्वला लाभार्थियों के मामले में तीन सौ रुपये की अतिरिक्त प्रत्यक्ष सब्सिडी जोड़ने के बाद यह कुल वित्तीय सहायता प्रति सिलेंडर एक हजार रुपये तक पहुंच जाती है, जिसके कारण वर्ष 2022 से अब तक सरकार पर बावन हजार करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम सब्सिडी बोझ आ चुका है।
इस नीतिगत बदलाव की टाइमिंग भी आम उपभोक्ताओं के लिए दोहरी मार साबित हो रही है, क्योंकि यह कटौती घरेलू रसोई गैस की कीमतों में हुई ताजा वृद्धि के तुरंत बाद प्रभावी की गई है। वैश्विक ऊर्जा संकट और विशेष रूप से मध्य पूर्व के देशों में जारी भू-राजनीतिक तनाव व होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न हुई सुरक्षा चुनौतियों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की बेंचमार्क कीमतों में छब्बीस प्रतिशत से अधिक का भारी उछाल दर्ज किया गया है। इसी का सीधा असर घरेलू बाजार पर भी दिखा, जहां सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने चौदह दशमलव दो किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर की कीमत में हाल ही में उनतीस रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। इस मूल्य वृद्धि के बाद देश की राजधानी दिल्ली में सामान्य उपभोक्ताओं के लिए सिलेंडर की कीमत 942 रुपये हो गई है, जबकि उज्ज्वला लाभार्थियों को तीन सौ रुपये की सब्सिडी के बाद यह 642 रुपये का पड़ रहा है।
इस नए नियम के लागू होने के बाद आम जनता और समाज के विभिन्न बौद्धिक हलकों में इस बात को लेकर बेहद गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि आखिर पांचवें सिलेंडर की जरूरत पड़ने पर लाभार्थियों को किस प्रकार की प्रक्रिया का सामना करना होगा। विधिक नियमों के अनुसार, यदि कोई उज्ज्वला परिवार अपने कोटे के पहले चार सिलेंडरों का उपभोग पूरा कर लेता है, तो उसके बाद बुक किए जाने वाले प्रत्येक उत्तरवर्ती सिलेंडर (पांचवें, छठे या उससे अधिक) के लिए उसे बिना किसी सरकारी छूट के पूरी बाजार कीमत यानी 942 रुपये का नकद भुगतान करना होगा। इसके लिए किसी अलग दस्तावेज या नए पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि तेल कंपनियों का डिजिटल सॉफ्टवेयर स्वतः ही चार रीफिल के बाद बैंक खाते में सब्सिडी भेजने की प्रक्रिया को रोक देगा।
इस बड़े फैसले को लेकर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं और जनविरोधी नीतियों पर बेहद तीखे और कड़े प्रहार शुरू कर दिए हैं। विभिन्न किसान यूनियनों और महिला कल्याण मंचों के पदाधिकारियों का तर्क है कि महंगाई के इस दौर में जब खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें पहले से ही आसमान छू रही हैं, तब गरीब माताओं और बहनों के चूल्हे पर इस प्रकार का प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से संवेदनशीलता के विपरीत है। उनका मानना है कि इस कटौती के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार दोबारा लकड़ी, कोयले और उपलों के पारंपरिक और प्रदूषणकारी ईंधनों की ओर लौटने के लिए मजबूर हो जाएंगे, जिससे महिलाओं के स्वास्थ्य को सुधारने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का इस योजना का मूल और प्राथमिक उद्देश्य ही पूरी तरह से खतरे में पड़ जाएगा।
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