'रोजी-रोटी' के नाम पर रची जा रही साजिश, बिहार के रेलवे स्टेशनों से महिलाओं को 'नरक' में झोंक रहे मानव तस्कर
रेलवे स्टेशनों पर फैले इस जाल को तोड़ने के लिए आरपीएफ और राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) ने एक संयुक्त रणनीति अपनाई है। स्टेशनों पर विशेष 'एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट' (AHTU) की तैनाती की गई है, जो संदिग्ध समूहों और अकेले या
- मासूमियत और मजबूरी का फायदा: नौकरी का झांसा देकर अन्य राज्यों में बेची जा रही हैं बिहार की बेटियां
- रेलवे सुरक्षा बल की सतर्कता से टूटे कई सिंडिकेट: तस्करों के जाल को काटने के लिए स्टेशनों पर बिछाया गया विशेष सुरक्षा चक्र
बिहार के रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों एक खौफनाक खेल खेला जा रहा है, जहाँ मानव तस्करों का जाल मासूम महिलाओं और युवतियों को अपना शिकार बना रहा है। गरीबी और बेरोजगारी का दंश झेल रहे परिवारों की महिलाओं को 'अच्छी नौकरी' और 'सुनहरे भविष्य' का सपना दिखाकर ये तस्कर उन्हें दूसरे राज्यों के नरक में धकेल रहे हैं। अप्रैल 2026 में सामने आए विभिन्न मामलों से यह स्पष्ट होता है कि तस्करों ने अब अपने तौर-तरीके बदल लिए हैं और वे स्थानीय एजेंटों के माध्यम से सीधे ग्रामीण इलाकों की महिलाओं तक पहुंच रहे हैं। इन महिलाओं को अक्सर बड़े शहरों के ब्यूटी पार्लरों, कोठियों में काम करने या गारमेंट फैक्ट्रियों में ऊंचे वेतन का लालच दिया जाता है, लेकिन हकीकत में उन्हें देह व्यापार या बंधुआ मजदूरी के दलदल में झोंक दिया जाता है। रेलवे स्टेशन इन तस्करों के लिए सबसे आसान ट्रांजिट पॉइंट बन गए हैं, जहाँ भीड़ का फायदा उठाकर वे आसानी से अपनी शिकार को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाते हैं। मानव तस्करी के इस बढ़ते ग्राफ ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने बिहार सहित उन राज्यों को नोटिस जारी किया है जहाँ से सबसे ज्यादा लोग लापता हो रहे हैं और तस्करी के शिकार बन रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार देश के उन शीर्ष राज्यों में शामिल है जहाँ से महिलाओं और बच्चों की तस्करी बड़े पैमाने पर होती है। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने 'ऑपरेशन आहट' (Operation AAHT) के तहत पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों पीड़ितों को बचाया है, जिनमें बड़ी संख्या में बिहार की महिलाएं और नाबालिग लड़कियां शामिल हैं। तस्कर अक्सर कटिहार, पूर्णिया, अररिया और रक्सौल जैसे सीमावर्ती जिलों के स्टेशनों का उपयोग करते हैं क्योंकि यहाँ से नेपाल और अन्य राज्यों के लिए परिवहन आसान होता है। ये अपराधी इतने शातिर होते हैं कि वे पीड़ित महिलाओं को फर्जी रिश्तेदार बनकर या परिवार की मदद करने के बहाने गुमराह करते हैं ताकि सुरक्षा कर्मियों को शक न हो।
बिहार में मानव तस्करी के प्रमुख कारक
बिहार में तस्करी की जड़ों में अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। तस्कर उन परिवारों को निशाना बनाते हैं जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके अलावा, नेपाल के साथ लगी बिहार की खुली और पोरस सीमा (Porous Border) तस्करों को सुरक्षा जांच से बचने में मदद करती है। हाल के वर्षों में 'ऑर्केस्ट्रा' और 'डांस ग्रुप' के नाम पर भी लड़कियों को तस्करी कर बाहरी राज्यों में ले जाने के मामले तेजी से बढ़े हैं।
रेलवे स्टेशनों पर फैले इस जाल को तोड़ने के लिए आरपीएफ और राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) ने एक संयुक्त रणनीति अपनाई है। स्टेशनों पर विशेष 'एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट' (AHTU) की तैनाती की गई है, जो संदिग्ध समूहों और अकेले यात्रा कर रही महिलाओं पर कड़ी नजर रखती है। 12 अप्रैल 2026 को कटनी रेलवे स्टेशन पर पटना-पूर्णा एक्सप्रेस से 163 बच्चों को छुड़ाने की घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि तस्करों का नेटवर्क कितना विशाल और संगठित है। इस मामले में पकड़े गए आठ तस्कर बिहार के ही विभिन्न जिलों के रहने वाले थे, जो बच्चों को महाराष्ट्र ले जा रहे थे। इसी तरह की कड़ियां महिलाओं की तस्करी में भी जुड़ी हुई हैं। तस्करों ने अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी उपयोग करना शुरू कर दिया है, जहाँ फर्जी विज्ञापनों के जरिए वे भोली-भाली महिलाओं को जाल में फंसाते हैं। इस समस्या की एक और डरावनी परत 'बंधुआ मजदूरी' और 'अवैध अंग व्यापार' की आशंकाओं से भी जुड़ी है। तस्करों द्वारा ले जाई गई कई महिलाएं कभी वापस नहीं लौटतीं और पुलिस फाइलों में वे 'गुमशुदा' ही रह जाती हैं। बिहार के सुदूर इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण लोग अक्सर बाहरी लोगों के मीठे बोल और पैसों के लालच में आ जाते हैं। स्टेशनों पर तैनात स्वयंसेवी संस्थाओं (NGOs) का कहना है कि तस्करों का एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा है, जिसमें स्थानीय 'लाइनमैन' से लेकर गंतव्य राज्यों के 'खरीदार' तक शामिल हैं। ये अपराधी अक्सर रात की ट्रेनों या ऐसी एक्सप्रेस ट्रेनों का चुनाव करते हैं जिनमें भीड़ ज्यादा होती है, ताकि वे आसानी से गायब हो सकें। सुरक्षा बलों ने अब सीसीटीवी फुटेज और एआई-आधारित मॉनिटरिंग के जरिए ऐसे संदिग्धों की पहचान करना शुरू किया है।
बिहार के रक्सौल जैसे स्टेशनों पर सीमा पार से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए सशस्त्र सीमा बल (SSB) के साथ भी समन्वय बढ़ाया गया है। हाल ही में रक्सौल स्टेशन से नेपाल मूल की चार नाबालिग लड़कियों को बचाया गया था, जिन्हें रोजगार का झांसा देकर दिल्ली ले जाया जा रहा था। इस तरह के ऑपरेशनों ने यह तथ्य सामने रखा है कि तस्करों के लिए रेलवे सबसे सुरक्षित और सस्ता माध्यम बना हुआ है। सुरक्षा एजेंसियों ने अब यात्रियों से भी अपील की है कि यदि वे किसी संदिग्ध समूह या किसी महिला को संकट में देखें, तो तुरंत रेलवे हेल्पलाइन नंबर 139 पर सूचित करें। लोगों के सहयोग के बिना इस संगठित अपराध की जड़ों को पूरी तरह काटना मुश्किल है, क्योंकि तस्कर अक्सर सामान्य यात्रियों के वेश में ही यात्रा करते हैं। इस संकट का समाधान केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में उनकी वापसी भी एक बड़ी चुनौती है। तस्करी से बचाई गई महिलाओं के लिए सरकार ने 'उज्ज्वला' जैसी योजनाएं चलाई हैं, लेकिन धरातल पर इनका कार्यान्वयन अभी भी एक प्रश्नचिन्ह बना हुआ है। जब तक बिहार के ग्रामीण अंचलों में रोजगार के अवसर पैदा नहीं होंगे और महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक तस्कर अपनी रोटी सेकते रहेंगे। वर्तमान में पुलिस महानिदेशकों और मुख्य सचिवों को भेजे गए मानवाधिकार आयोग के नोटिस इस दिशा में एक बड़ी कार्रवाई की उम्मीद जगाते हैं, जिससे शायद प्रशासन इस गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन को रोकने के लिए अधिक कड़े और प्रभावी कदम उठाए।
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