Editorial : योगी मंत्रिमंडल विस्तार के सात दिन बाद भी थमा सस्पेंस, जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के फेर में उलझा विभागों का बंटवारा

विभागीय आवंटन में हो रहे इस असाधारण विलंब के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश की राजधानी दिल्ली का दौरा कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन सहित पार्टी के शीर्ष नीति-निर्धारकों के साथ कई दौर की गहन बैठकें

May 17, 2026 - 10:46
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Editorial : योगी मंत्रिमंडल विस्तार के सात दिन बाद भी थमा सस्पेंस, जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के फेर में उलझा विभागों का बंटवारा
Editorial : योगी मंत्रिमंडल विस्तार के सात दिन बाद भी थमा सस्पेंस, जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के फेर में उलझा विभागों का बंटवारा

संपादकीय विशेष

  • भारी-भरकम मंत्रालयों के पुनर्गठन और सहयोगियों की उम्मीदों के चलते फंसा पेंच, दिल्ली आलाकमान से बैठकों का दौर जारी
  • आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीतियों को साधने की कवायद, मंत्रियों के पोर्टफोलियो आवंटन में संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार के एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी नए और प्रोन्नत मंत्रियों को विभागों का आवंटन न हो पाना प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अपने मंत्रिपरिषद का बहुप्रतीक्षित विस्तार किए जाने के सात दिन बाद भी मंत्रियों को उनके वर्किंग डिपार्टमेंट नहीं मिल सके हैं। शासन स्तर पर इस अभूतपूर्व देरी के पीछे सत्ता संगठन और सरकार के भीतर सामाजिक समीकरणों तथा भारी-भरकम विभागों के बंटवारे को लेकर चल रही गहरी रस्साकशी को मुख्य वजह माना जा रहा है। सचिवालय से लेकर राजनीतिक हलकों तक हर कोई इस बात को लेकर टकटकी लगाए बैठा है कि आखिर किस चेहरे को कौन सी प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।

इस बार का मंत्रिमंडल विस्तार केवल खाली पदों को भरने की एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे राज्य के जटिल सामाजिक और जातीय ताने-बाने को दुरुस्त करने का एक बड़ा राजनीतिक प्रयास छिपा हुआ है। सरकार के भीतर विभिन्न जातियों, जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दलित, ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों के बीच सत्ता का संतुलन इस प्रकार बनाने की कोशिश की जा रही है कि किसी भी वर्ग में असंतोष की भावना न पनपे। नए शामिल किए गए चेहरों को उनकी राजनीतिक ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव के आधार पर महत्वपूर्ण विभाग सौंपने की मांग उठ रही है, जिसके चलते मुख्यमंत्री कार्यालय और केंद्रीय नेतृत्व को काफी सोच-विचार कर कदम उठाना पड़ रहा है।

विभागीय आवंटन में हो रहे इस असाधारण विलंब के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश की राजधानी दिल्ली का दौरा कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन सहित पार्टी के शीर्ष नीति-निर्धारकों के साथ कई दौर की गहन बैठकें की हैं। इन उच्च स्तरीय मुलाकातों में मुख्य रूप से लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), ऊर्जा, पंचायती राज और जल शक्ति जैसे उन मलाईदार और जन-सरोकार से जुड़े बड़े मंत्रालयों पर चर्चा हुई, जो वर्तमान में या तो मुख्यमंत्री के पास हैं या फिर कुछ ऐसे मंत्रियों के पास हैं जिनके पास एक से अधिक बड़े विभाग मौजूद हैं। केंद्रीय आलाकमान की मंशा है कि चुनावों से ठीक पहले डिलीवरी सिस्टम को मजबूत करने वाले मंत्रालयों को अधिक सक्रिय चेहरों को सौंपा जाए।

आखिर गतिरोध की

वर्तमान मंत्रिपरिषद में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) जैसा सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी ढांचे से जुड़ा मंत्रालय मुख्यमंत्री के अपने नियंत्रण में है। चर्चा है कि इस विभाग को किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री या नव-नियुक्त कद्दावर चेहरे को सौंपने पर विचार चल रहा है। इसके साथ ही, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को पहले से अधिक प्रभावशाली और सार्वजनिक संपर्क वाले विभागों की जिम्मेदारी देकर सरकार में उनके कद को और मजबूत करने की कूटनीति पर भी शीर्ष स्तर पर सहमति बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस मंत्रिमंडल फेरबदल की टाइमिंग भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य को अगले वर्ष ही विधानसभा चुनाव के कड़े समर में उतरना है। ऐसी स्थिति में सरकार के किसी भी कदम का सीधा असर मतदाताओं के मानस पटल पर पड़ना स्वाभाविक है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि जिन मंत्रियों को भी विभाग आवंटित किए जाएं, वे तत्काल प्रभाव से जनता के बीच जाकर सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार शुरू कर दें। विभागों के बंटवारे में हो रही देरी के कारण नए बने मंत्री अभी तक केवल औपचारिक स्वागत-समारोहों और बधाई संदेशों तक ही सीमित हैं, और वे अपने मंत्रालयों का कामकाज औपचारिक रूप से संभालने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम को सरकार की आंतरिक कमजोरी और अंतर्विरोध के रूप में प्रचारित करने में जुट गया है। विपक्ष द्वारा लगातार यह आरोप लगाया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सरकार के फैसले लखनऊ के बजाय दिल्ली से संचालित हो रहे हैं और मलाईदार विभागों के लिए आपसी खींचतान मची हुई है। इन राजनीतिक हमलों के बीच सत्ता पक्ष के रणनीतिकार बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं ताकि जब भी अंतिम सूची जारी हो, तो वह पूरी तरह से विवादों से परे हो और उससे पार्टी के भीतर एकजुटता का एक मजबूत संदेश समाज में जाए।

आगामी चौबीस से अड़तालीस घंटों के भीतर इस पूरे गतिरोध के समाप्त होने और राज्यपाल भवन से विभागों की आधिकारिक सूची जारी होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। इस नए फेरबदल में न केवल नए मंत्रियों को काम मिलेगा, बल्कि वर्तमान में कार्य कर रहे कुछ पुराने मंत्रियों के विभागों को भी बदला या छोटा किया जा सकता है। प्रशासनिक मशीनरी भी इस नए बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार है ताकि जैसे ही नए मंत्रियों के नाम तय हों, वैसे ही संबंधित विभागों की फाइलों को गति दी जा सके। उत्तर प्रदेश के इस सत्ता संतुलन पर अब पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।

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