सिनेमाघरों में गूंजी राम चरण की दहाड़: बार-बार टलने और सोशल मीडिया पर लीक होते कथानक के बीच आखिरकार रिलीज हुई बहुप्रतीक्षित पैन-इंडिया फिल्म 'पेड्डी'।
भारतीय सिनेमा के आधुनिक दौर में जब भी किसी बड़े सितारे की पैन-इंडिया फिल्म के आने की सुगबुगाहट शुरू होती है, तो उसके
- बुची बाबू साना के निर्देशन ने रचा एक भावुक और अनोखा विरोधाभास: लार्जर देन लाइफ सिनेमा की होड़ के बीच सीधे दर्शकों के दिलों पर चोट करती है 'पेड्डी' की कहानी।
- बॉक्स ऑफिस पर उत्सव और सिनेमाई मंथन का नया दौर शुरू: व्यावसायिकता के तड़के के साथ-साथ एक बेहद गंभीर और संवेदनशील सामाजिक संदेश देती है राम चरण की यह नई फिल्म।
भारतीय सिनेमा के आधुनिक दौर में जब भी किसी बड़े सितारे की पैन-इंडिया फिल्म के आने की सुगबुगाहट शुरू होती है, तो उसके साथ पूरे देश के दर्शकों और फिल्म समीक्षकों की भारी-भरकम उम्मीदें जुड़ जाती हैं। इस बार यह सारी उम्मीदें और बेसब्री साउथ फिल्म इंडस्ट्री के ग्लोबल स्टार राम चरण की नवीनतम रिलीज 'पेड्डी' के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थीं। यह फिल्म निर्माण के शुरुआती दिनों से ही लगातार सुर्खियों में बनी हुई थी, कभी इसके रिलीज की तारीखों के बार-बार टलने के कारण तो कभी सोशल मीडिया पर इसके संभावित कथानक के लीक होने की अफवाहों के चलते प्रशंसकों की धड़कनें तेज होती रहीं। तमाम उतार-चढ़ावों और प्रशंसकों के लंबे इंतजार को समाप्त करते हुए आखिरकार यह फिल्म देश भर के सिनेमाघरों में पूरे भव्य अंदाज के साथ दस्तक दे चुकी है। इस फिल्म को लेकर सिनेमाघरों के बाहर जो अभूतपूर्व उत्साह और बेकरारी देखने को मिल रही है, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि दर्शक इस बात को जानने के लिए कितने व्याकुल थे कि राम चरण का यह नया अवतार उनकी उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है।
आज के इस दौर में जहां हर अभिनेता को बॉक्स ऑफिस की दौड़ में बने रहने के लिए अपनी फिल्म को केवल एक लार्जर देन लाइफ एक्शन ड्रामा के रूप में पेश करने की होड़ मची हुई है, वहीं निर्देशक बुची बाबू साना के निर्देशन में बनी राम चरण की 'पेड्डी' ने बिल्कुल एक अलग और साहसिक राह चुनी है। इस फिल्म की बनावट में एक बहुत ही अनूठा और अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है, जो इसे समकालीन व्यावसायिक फिल्मों की कतार से बिल्कुल अलग खड़ा करता है। एक तरफ जहां यह फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों की सीटों पर झूमने, तालियां बजाने और अपने पसंदीदा स्टार की स्क्रीन प्रेजेंस को सेलिब्रेट करने के भरपूर व्यावसायिक मौके देती है, तो वहीं दूसरी तरफ यह बहुत ही खामोशी से कुछ बेहद महत्वपूर्ण और गहरे सिनेमाई मंथन के मुद्दे भी पैदा करती है। यह पूरी कहानी इस तरह से बुनी गई है कि यह दर्शकों के दिमाग पर बोझ डालने की बजाय सीधे तौर पर उनके दिलों को झकझोरने और गहरी संवेदनाएं जगाने का काम करती है। 'पेड्डी' की सबसे बड़ी ताकत इसकी तकनीकी टीम और इसका संगीत है। फिल्म के दृश्य और इसके ग्रामीण परिवेश को पर्दे पर जीवंत करने के लिए अत्याधुनिक कैमरावर्क का सहारा लिया गया है, जो इसके कच्चे और यथार्थवादी माहौल को बहुत ही खूबसूरती से दर्शकों के सामने रखता है। इसके अलावा, फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और इसके गाने कहानी की गति के साथ इस तरह से कदमताल करते हैं कि वे साधारण दृश्यों के प्रभाव को भी कई गुना बढ़ा देते हैं। विशेष रूप से एक्शन और इमोशनल दृश्यों के बीच का जो संतुलन है, वह फिल्म की तकनीकी टीम की बेहतरीन समझ को दर्शाता है।
फिल्म की कहानी का ताना-बाना एक ऐसे ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवेश के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसमें मिट्टी की सोंधी महक के साथ-साथ मानवीय रिश्तों की जटिलताएं और सामाजिक विद्रूपताएं भी गहराई से समाहित हैं। राम चरण ने इस फिल्म में एक ऐसे किरदार को जिया है जो शारीरिक रूप से जितना शक्तिशाली और आक्रामक दिखाई देता है, भावनात्मक रूप से वह उतना ही कमजोर, संवेदनशील और अपने परिवार व समाज के प्रति समर्पित है। निर्देशक ने व्यावसायिक सिनेमा के पारंपरिक फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए भी कहानी के मूल तत्वों को बिखरने नहीं दिया है। नायक का सफर केवल खलनायकों को धूल चटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपनी आंतरिक कमियों और समाज की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ भी एक बहुत बड़ी जंग लड़ता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि फिल्म का हर एक सीन दर्शकों को जुड़ाव महसूस कराने में पूरी तरह से सफल साबित होता है।
अभिनय के मोर्चे पर बात करें तो राम चरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे केवल एक बेहतरीन एक्शन स्टार नहीं हैं, बल्कि जटिल और गहरे किरदारों को निभाने में भी उन्हें महारत हासिल है। उनके किरदार के कई शेड्स हैं, जहां वे एक पल में उग्र रूप धारण कर लेते हैं, तो वहीं दूसरे ही पल उनकी आंखों में एक अजीब सी बेबसी और गहरा दर्द साफ दिखाई देने लगता है। उन्होंने अपने संवाद अदायगी और बॉडी लैंग्वेज पर बहुत बारीकी से काम किया है, विशेष रूप से फिल्म के उत्तरार्ध में आने वाले भावनात्मक दृश्यों में उनका अभिनय देखकर सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों की आंखें नम होना स्वाभाविक है। उनके साथ मुख्य भूमिका में नजर आने वाले अन्य सह-कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है, जिससे मुख्य कहानी को आगे बढ़ने के लिए एक बहुत ही मजबूत आधार और विश्वसनीयता प्राप्त होती है।
निर्देशन के स्तर पर बुची बाबू साना की सूझबूझ और उनकी कहानी कहने की मौलिक शैली की जितनी सराहना की जाए वह कम है। उन्होंने यह बखूबी समझा कि भारतीय दर्शकों को केवल भारी-भरकम विजुअल इफेक्ट्स और बिना सिर-पैर के एक्शन दृश्यों से लंबे समय तक बांधकर नहीं रखा जा सकता। इसलिए उन्होंने 'पेड्डी' की पटकथा में मानवीय संवेदनाओं, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों को मुख्य स्थान दिया है। फिल्म की गति शुरुआत में थोड़ी धीमी लग सकती है क्योंकि निर्देशक किरदारों को स्थापित करने और माहौल को तैयार करने में पूरा समय लेते हैं, लेकिन जैसे ही कहानी अपने मुख्य बिंदु पर पहुंचती है, इसकी रफ्तार और इसका तनाव दर्शकों को अपनी सीटों से बांधकर रखने पर मजबूर कर देता है। निर्देशक ने बिना किसी उपदेशात्मक शैली के, बहुत ही सहज तरीके से समाज के कुछ अनछुए पहलुओं को दर्शकों के सामने परोसने का काम किया है।
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