Special Article: सामाजिक समरसता के प्रेरक संत रविदास 

संत रविदास जी भारत की उन महान विभूतियों  में से एक हैं जिन्होंनें अपने वचनों से समाज को जगाया, एकता प्रेम

Aug 5, 2026 - 14:34
 0  7
Special Article: सामाजिक समरसता के प्रेरक संत रविदास 

लेखक: मृत्युंजय दीक्षित

Special Article: संत रविदास जी भारत की उन महान विभूतियों  में से एक हैं जिन्होंनें अपने वचनों से समाज को जगाया, एकता प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। यह उनकी महिमा का ही परिणाम था कि भक्त मीराबाई, राजा पीपा और राजा नागरमल जैसे लोग उनके पीछे चल पड़े। उनके शिष्य सतगुरु, जगतगुरु संबोधनों से उनका सत्कार करते थे। 
जीवन परिचय - संत रविदास का जन्म  काशी में संवत 1433 में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। उस दिन रविवार था अतः उनके माता -पिता ने उनका नाम रविदास रख दिया। उनके पिता का नाम राहू तथा माता का नाम करमा था। दोहों में उनकी पत्नी का नाम लोना आता है। उन्होंने साधु - संतों की संगति से व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। उनका जूते बनाने का व्यवसाय था जिसे वे पूरी लगन व मेहनत के साथ करते थे। हर काम समय से पूरा हो इस बात पर उनका विशेष ध्यान रहता था। 
बचपन से ही रविदास  ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे। 9 वर्ष की आयु में ही ईश्वर के प्रति उनकी अनुरक्ति आसक्ति में बदल गई और वह दिन -रात भजन पूजन और भक्ति रस में सराबोर रहने लगे। वह शिक्षा ग्रहण करने के लिये आचार्य शारदानंद की पाठशाला में गये जहाँ उनकी प्रतिभा देखकर आचार्य शारदानंद ने उनको अपनी पाठशाला में  प्रवेश दे दिया। रविदास औपचारिक शिक्षा से इतर भी अपने शिक्षक से बहुत कुछ सीख लेते थे। उसी समय आचार्य शारदानंद ने कह दिया था कि एक दिन रविदास अपनी प्रबुद्ध आध्यात्मिकता से समाज सुधारक के रूप में   विख्यात होंगे। 
पाठशाला में रविदास मित्रता शारदानंद जी के पुत्र से हो गई। वह दोनों वहां पर लुका -छिपी का खेल खेला करते थे। एक दिन खेलने के लिए रविदास तो पहुँच गये किंतु उनका मित्र नहीं पहुंचा। काफी प्रतीक्षा करने के बाद वह अपने मित्र के घर गये तो पाया कि वहां पर लोग रो रहे थे और मित्र अचेत पड़ा था। सभी लोग उसे मृत समझ रहे थे। रविदास अपने मित्र के पास गये और जोर से चिल्लाकर कहा मित्र यह “सोने  का समय नही है, यह तो हमारे लुका- छिपी खेलने का समय है। चलो उठो, खेलने चलते हैं । कुछ ही देर में उनका मित्र  उठकर रविदास के साथ खेलने चल दिया। माता- पिता सहित लोग आश्चर्यचकित हो गये। 
विवाह - रविदास जी में असाधारण ईश्वरीय भक्ति थी इसको ध्यान में रखते हुए इनके माता -पिता ने इनका विवाह 13 वर्ष की आयु में ही लोना नाम की एक बालिका के साथ कर दिया ताकि सांसारिक बंधनों में फंसकर इनका जीवन बदल जाये। विवाह के बाद उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम विजय दास था। पारिवारिक विषयों में ध्यान न देने के कारण अपने पिता से रविदास जी की अनबन रहने लगी थी और एक दिन पिता ने उन्हे घर से निकाल दिया गया। संत रविदास घर से अगल रहने लगे किन्तु उनकी ईश्वर भक्ति में कोई कमी नहीं आई। अब उन्हें रैदास भगत के नाम से भी जाना जाने लगा। उनकी वाणी ज्ञानाश्रयी होने के साथ ही प्रेमाश्रयी थी। उनकी वाणी से रस बरसता था जिसके कारण जनमानस उनकी और सहजता पूर्वक आकर्षित हो रहा था। 
स्वामी रामानंद के शिष्य बने - काशी में एक पंचगंगा घाट है। जिसमें  स्नान करने से तन शुद्ध और मन निर्मल होता है। यहीं पर स्वामी रामानंद नामक एक महान संत रहते थे। संत कबीर सहित अनेकानेक संत व गृहस्थ उनके शिष्य  थे। संत रविदास भी उनकी ओर आकृष्ट हुए। भक्त रविदास संत रामानंद की दीक्षा लेकर भाव विभोर हो गये। संत रामानंद ने ही संत रविदास से कहा कि संतों को जाति- पाति से दूर रहना चाहिए। स्वामी रामानंद ने उन्हें प्रभु श्रीराम का भजन करने के लिए कहा इसके बाद प्रभु राम ही रविदास के आराध्य देव हो गए। धीरे- धीरे  वह भजन भाव में  इतने रम गए कि जो भी उनके भजन सुनता वह स्वयं को धन्य मानता। स्वामी रामानंद के आशीर्वाद से उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार हुआ और वेद, शास्त्र, पुराण आदि की सभी बातें उन्होंने हृदयंगम की। संत कबीर उनके गुरु भाई थे। संत कबीर ने रविदास को साधुओं  में संत कहा है । भक्ति रस में लीन मीराबाई ने संत रविदास को अपना गुरु माना।  गोस्वामी तुलसीदास जी ने संत रविदास जी के विषय में लिखा है- 
संत  हृदय नवनीत समाना , कहा कबिन्ह परि कहै न जाना। 
निज परिताप द्रवड़ नवनीता पर सुख द्रवहि संत सुपुनीता।।    
 
स्वभाव - उनके जीवन की छोटी- छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन संबंधी उनके गुणों का पता चलता है। संत रविदास जी ने ईश्वर भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सभी को परस्पर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।  वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें  भाव विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर भक्ति के लिए सदाचार, परहित -भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। संत रविदास स्वयं अत्यंत परोपकारी तथा दयालु स्वभाव के थे। परहित ही उनका धर्म  था। साधु- संतों की सहायता करने में उनको विशेष आनंद मिलता था। वे उन्हें निःशुल्क जूते भेंट किया करते थे। संत रविदास जी का नाम महान संतों में लिया जाता है । संत रविदास की वाणी  भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओतप्रोत होती थी। 
 
उनके उपदेश आज भी समाज के कल्याण के लिये महत्वपूर्ण हैं । उनके 40 पद गुरु ग्रंथ साहिब में मिलते हैं जिनका संपादन गुरु अर्जुन देव सिंह ने 16वीं सदी में किया था। संत रविदास जी की रचनाओं में प्रसिद्ध पद, साखियां और वाणियां  शामिल हैं। उनकी कोई एक स्वतंत्र पुस्तक नहीं मिलती  है अपितु उनकी रचनाओं का एक संग्रह संत रैदास की वाणी के रूप में उपलब्ध है। उनकी रचनाओं  की विशेषता सामाजिक समरसता और  निर्गुण भक्ति है। संत शिरोमणि रविदास जी ने अपनी रचनाओं  व कार्यों से  पूरे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया।
 
संत रविदास और इस्लाम - संत रविदास जी महाराज लंबे समय तक चित्तौड़ के दुर्ग में महाराणा सांगा के गुरु के रूप में रहे और उनके महान व्यक्तित्व के कारण चित्तौड़ में बड़ी संख्या में लोग उनके शिष्य बने। आज भी इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में रविदासी पाये जाते हैं।  
मुस्लिम सुल्तान सिकंदर लोधी अन्य किसी भी मुस्लिम शासक की तरह भारत के हिंदुओं को मुसलमान बनाने की उघेड़बुन में लगा रहता था। इन सभी आक्रमणकारियों की दृष्टि गाजी उपाधि पर लगी रहती थी। सिकंदर लोधी ने संत रविदास जी महाराज को मुसलमान बनाने के लिये अपने मुल्लाओं को लगाया। ऐसा ही एक व्यक्ति सदना पीर जो एक प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान माना जाता था और रविदास को मुसलमान बनाना चाहता था, उनसे शास्त्रार्थ करने उनके पास आया। उसने कठोर शब्दों में हिंदू धर्म की निंदा की और  इस्लाम की प्रशंसा की। उसकी सारी बातें सुनने के बाद इस्लाम व कुरान के विषय में संत  रविदास ने जो उत्तर दिया उसे सुनकर वह निरुत्तर हो गया और कुछ समय बाद स्वयं हिंदू बन गया। सिकंदर लोधी अपने षड्यंत्र की इस दुर्गति से चिढ़ गया और उसने संत रविदास को बंदी बना लिया। उनके अनुयायियों चंवर वंश के क्षत्रियों  को अपमानित करने के लिये नाम बिगाड़कर चमार संबोधित किया। चमार शब्द का पहला प्रयोग यहीं मिलता है। संत रविदास जी की कई पंक्तियां लोधी के अत्याचारों का स्पष्ट वर्णन करती हैं। 
चंवर वंश के क्षत्रिय संत रविदास जी के बंदी बनाने का समाचार मिलते ही दिल्ली पर चढ़ दौडे़। सिकंदर लोधी को विवश होकर संत रविदास जी को छोड़ना पड़ा। इसका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नहीं है,  जिसे सुनियोजित तरीके से इतिहास की पुस्तकें से गायब कर दिया गया है। मगर संत रविदास जी के ग्रंथ रविदास रामायण की पंक्तियों में यह सत्य उजागर हो जाता है। 
जैसे उस काल में इस्लामिक शासक हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिये हर संभव प्रयास करते रहते  थे वैसे ही आज भी कर रहे हैं। उस काल में दलितों के प्रेरणा स्रोत संत रविदास महान चिंतक थे। जिन्हें अपने प्राण न्योछावर करना स्वीकार था मगर वेदों को त्यागना स्वीकार नहीं था। आज उस दृष्टि का अभाव है।   
संत रविदास जी ने कहा है कि,“ सच्चा भक्त वही है जो अपने मन में प्रभु को धारण  करता है और बिना किसी भेदभाव के  सभी से प्रेम करता है। उनका मानना था कि ईश्वर भक्ति से प्राप्त होते हैं न कि  जाति या बाहरी आडंबर से।  “मन चंगा तो कठौती में गंगा“ जैसा सूत्र आज भी लोगों को आत्मशुद्धि और सरल जीवन की प्रेरणा देता है। 

Also Read- पुण्यतिथि 20 जुलाई पर विशेष: गुमनाम युवा क्रांतिकारी- बटुकेश्वर दत्त

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।