पुण्यतिथि 20 जुलाई पर विशेष: गुमनाम युवा क्रांतिकारी- बटुकेश्वर दत्त 

भारत को स्वतंत्र कराने में अनेकानेक क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभाते हुए प्राणों की आहुति तक दे डाली  किंतु स्वतंत्रता

Jul 19, 2026 - 00:54
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पुण्यतिथि 20 जुलाई पर विशेष: गुमनाम युवा क्रांतिकारी- बटुकेश्वर दत्त 

लेखक: मृत्युंजय दीक्षित 

भारत को स्वतंत्र कराने में अनेकानेक क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभाते हुए प्राणों की आहुति तक दे डाली  किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दुर्भाग्यवश वामपंथी -कांग्रेसी विचारधारा के इतिहासकारों द्वारा इन महानाायकों की उपेक्षा की गई और इनके प्रयासों को नकारने का प्रयास किया गया। कुछ स्वतंत्र लेखकों व इतिहासकारों ने साहस दिखाते हुए ऐसे क्रांतिकारियों के योगदान पर ध्यान दिया और उनके विषय में  जानकारियां उपलब्ध करीं। बटुकेश्वर दत्त ऐसे ही एक युवा क्रन्तिकारी हैं जिनके विषय में कम ही लोग जानते हैं ।  
बटुकेश्वर का जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में औरी नामक गांव में 22 नवंबर 1910 को हुआ था। वह हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए कानपुर आ गए। कानपूर में ही वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य बने और उनकी भेंट भगत सिंह तथा चंद्रशेखर आजाद से हुई। उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कार्य किया और इसी क्रम में उन्होंने बम बनाना भी सीखा। बटुकेश्वर दत्त को तीन अन्य नामों बी. के. दत्ता, बट्टू और मोहन के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने आगरा में स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उल्लेखनीय कार्य किया था। कानपुर में उन्होंने पंडित पृथ्वीनाथ हाईस्कूल से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उस समय हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के क्रांतिकारियों से अंग्रेज सरकार कांपती थी अतः वह उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने व उनका दमन करने के लिए भारत रक्षा अधिनियम,1915 लेकर आई और  पुलिस बल को अतिरिक्त छूट प्रदान कर दी। जिसका विरोध करने के लिए भगत सिंह ने तत्कालीन संसद भवन के अंदर बम विस्फोट करने की योजना हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के समक्ष रखी। आर्मी के सदस्य इससे सहमत हो गये। लम्बी बहस के बाद इसके लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का नाम तय हुआ।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने आगंतुक गैलरी से दौड़ते हुए  बम फेंकने के साथ ही पर्चे भी फेंके । पर्चे में लिखा गया था कि क्रांतिकारियों  ने यह कृत्य महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय की अंग्रेज पुलिस द्वारा लाठियों से पीट पीट कर की गई हत्या, भारत रक्षा अधिनियम 1915 के विरोध तथा  अंग्रेज पुलिस के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों व दमन के विरोध में किया जा रहा है। बम धमाका करते समय भगत सिंह व बटुंकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे  लगाए गए। यह धमाका केवल लाला लाजपतराय की हत्या और अंग्रेज सरकार के कृत्यों का विरोध करने के लिए किया गया था  इसलिए इस घटना में किसी की मौत नहीं हुई । घटना का उद्देश्य केवल अपनी बात अंग्रेजों तक पहुँचाना थे। घटना में बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। 
भगत सिंह उनके सहयोगी सुखदेव, राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चला। 12 जून 1929 को सभी को अंडमान निकोबार द्वीप समूह की सेलुलर जेल भेज दिया गया। बाद में  लाहौर कोर्ट जेल मे डाल दिया गया। यहां पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षड्यंत्र  केस का मुकदमा चलाया गया। लाहौर षड्यंत्र  केस में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई जबकि बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास देते हुए काला पानी भेज दिया गया। उन्होंने न्यायालय के अधिकारों को मानने से इंकार कर दिया और मुकदमे को अपने क्रांतिकारी आदर्शों  के प्रचार के मंच के रूप मे प्रयोग किया। जेल में उन्होंने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ दुर्व्यवहार  के विरोध में 63 दिनों भूख हड़ताल की जिसके दौरान उन्हें क्रूर यातनाएं दी गयीं किंतु उनका संकल्प नहीं डिगा और उन्होंने अपनी मांगों के आंशिक रूप से पूरा होने तक हड़ताल जारी रखी। 
क्रूर यातनाओं के कारण जेल से रिहा होने पर बटुकेश्वर दत्त तपेदिक से पीड़ित हो गए किंतु फिर भी उन्होंने  भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और चार वर्ष के लिए फिर जेल चले गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अंजली से विवाह किया और 1965 तक जीवित रहे किंतु दुर्भाग्यवश तत्कालीन कांग्रेस की सरकारों ने उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया गया। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात महान स्वत्रंता बटुकेश्वर दत्त को पटना में असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी। घर चलाने के लिए उनकी पत्नी को एक विद्यालय में 100 रुपए की नौकरी करनी पड़ी। 1964 में दत्त जी का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और उन्हें दिल्ली के सफरदजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। बीमारी के समय भगत सिंह की मां उनकी सेवा में लगी रहीं। 20 जुलाई 1965 की मध्यरात्रि में  क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार वहीं हुआ जहां भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का हुआ था।

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