माचिस की डिब्बी और कांच के गिलासों से संगीत बनाने वाले 'पंचम दा' के वो किस्से, जो आज भी कर देंगे हैरान!
RD Burman History in Hindi: जानिए कैसे राहुल देव बर्मन बने भारतीय संगीत के 'पंचम दा' और क्यों उनका जादुई और क्रांतिकारी म्यूज़िक आज भी हर पीढ़ी के दिलों में धड़कता है।
- RD Burman Birth Anniversary: राहुल देव बर्मन कैसे बने 'पंचम दा', जानिए उनके संगीत की क्रांति की पूरी कहानी
- Pancham Da Musical Journey: भारतीय संगीत के वो जादुई प्रयोग, जिन्होंने आरडी बर्मन को बना दिया 'पंचम दा'
- RD Burman Legacy: भारतीय सिनेमा को मॉडर्न म्यूज़िक देने वाले राहुल देव बर्मन 'पंचम दा' की संगीतमय विरासत पर विशेष रिपोर्ट
भारतीय सिनेमा और संगीत जगत में राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) महज़ एक नाम नहीं, बल्कि एक युग और संगीत की ऐसी क्रांति हैं जिसने हिंदी गानों की परिभाषा हमेशा के लिए बदल दी। अपनी अनूठी धुनों और वेस्टर्न-इंडियन फ्यूज़न से देश को दीवाना बनाने वाले राहुल देव बर्मन आख़िर कैसे 'पंचम दा' के नाम से मशहूर हुए, यह कहानी आज भी बेहद दिलचस्प है। दिग्गज संगीतकार सचिन देव बर्मन (एसडी बर्मन) के घर कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में जन्मे इस फनकार ने अपनी जादुई सोच से संगीत को रूढ़िवादिता से बाहर निकाला। आज दशकों बाद भी उनका संगीत हर पीढ़ी के युवाओं के दिलों में उतनी ही ताज़गी के साथ ज़िंदा है। आइए विस्तार से जानते हैं उनके 'पंचम' बनने का सफर और उनकी बेमिसाल विरासत की कहानी।
राहुल देव बर्मन कैसे बने 'पंचम दा'
राहुल देव बर्मन को 'पंचम दा' कहे जाने के पीछे बॉलीवुड और उनके करीबियों के बीच कुछ बेहद दिलचस्प किस्से मशहूर हैं। संगीत की दुनिया में सात सुर होते हैं सा, रे, गा, मा, पा, ध, नि। इनमें पांचवां सुर 'पा' होता है, जिसे 'पंचम' कहा जाता है।
माना जाता है कि जब आरडी बर्मन छोटे थे और रोते थे, तो उनके रोने की ध्वनि संगीत के पांचवें सुर यानी 'पंचम' (पा) से काफी मिलती-जुलती थी। इसे सुनकर ही उन्हें बचपन में घर पर 'पंचम' बुलाया जाने लगा। वहीं, एक दूसरा लोकप्रिय किस्सा दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब उन्होंने छोटे राहुल को बार-बार 'पा' सुर का रियाज़ या गुनगुनाहट करते सुना, तो उन्होंने प्यार से उनका नाम 'पंचम' रख दिया। बाद में जब वे फिल्म इंडस्ट्री में आए, तो सम्मान और प्यार के प्रतीक के रूप में बंगाल के पारंपरिक शब्द 'दा' (बड़े भाई) के साथ मिलकर वे पूरी दुनिया के लिए 'पंचम दा' बन गए।
संगीत की वो क्रांति जिसने बदल दिया बॉलीवुड का मिजाज
पंचम दा से पहले भारतीय सिनेमा में मुख्य रूप से शुद्ध शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत या सुगम संगीत का बोलबाला था। लेकिन आरडी बर्मन ने इंडस्ट्री में कदम रखते ही एक ऐसी संगीतमय क्रांति की नींव रखी, जिसकी कल्पना उस दौर में किसी ने नहीं की थी। उन्होंने लैटिन, रॉक, जैज़ और अरबी संगीत के तत्वों को पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ इस खूबसूरती से पिरोया कि वह हर दिल की धड़कन बन गया।
उन्होंने संगीत बनाने के लिए केवल पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ही सहारा नहीं लिया, बल्कि रोज़मर्रा की चीज़ों का इस्तेमाल करके भी अद्भुत धुनें तैयार कीं। फिल्म 'यादों की बारात' के गाने 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' में कांच के गिलासों को आपस में टकराकर पैदा की गई खनक हो, या फिर किसी गाने में माचिस की डिब्बी और कंघी का इस्तेमाल पंचम दा के प्रयोगों की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने गानों में 'ब्रेथ साउंड' (सांसों की आवाज़) और अजब-गजब ध्वनि प्रभावों को मुख्यधारा के संगीत का हिस्सा बनाया।
पंचम दा के साथ काम करने वाले उनके समकालीन कलाकार हमेशा उनकी प्रतिभा के आगे नतमस्तक रहे। महान गायक किशोर कुमार और पंचम दा की जोड़ी को हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे कामयाब जोड़ियों में गिना जाता है। किशोर कुमार अक्सर कहते थे कि पंचम की धुनें उनके भीतर के गायक को एक नई चुनौती और ऊर्जा देती थीं।
सुर कोकिला लता मंगेशकर और पंचम दा की पत्नी व दिग्गज गायिका आशा भोंसले ने कई मौकों पर यह स्वीकार किया कि पंचम का विज़न अपने समय से कम से कम 20 साल आगे था। जब उन्होंने पहली बार 'दम मारो दम' या 'पिया तू अब तो आजा' जैसी धुनें सुनीं, तो वे खुद हैरान रह गईं कि कोई इस तरह का कंपोज़िशन कैसे सोच सकता है। आज की पीढ़ी के ए.आर. रहमान से लेकर अमित त्रिवेदी जैसे संगीतकार भी पंचम दा को अपना सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत मानते हैं।
आरडी बर्मन के संगीत का प्रभाव सिर्फ उनके दौर तक सीमित नहीं रहा। आज भी जब कोई डीजे किसी पुराने गाने को रीमिक्स करता है, या कोई नया संगीतकार रेट्रो वाइब क्रिएट करना चाहता है, तो सबसे पहले पंचम दा की धुनों का ही सहारा लिया जाता है।
उनका संगीत इस बात का प्रमाण है कि कला कभी बूढ़ी नहीं होती। 70 और 80 के दशक में तैयार किए गए उनके गाने आज के पब, क्लब और रील्स (Reels) के दौर में भी उतने ही चाव से सुने जाते हैं। उन्होंने 'तीसरी मंज़िल', 'शोले', 'अमर प्रेम', 'आंधी' और अपने आखिरी दिनों में '1942: ए लव स्टोरी' जैसी फिल्मों में ऐसा संगीत दिया, जो अमर हो गया। उन्होंने उदासी के गीतों में भी एक अजीब सा सुकूँ और थिरकने वाले गानों में एक गजब का उन्माद भर दिया था।
साल 1994 में भले ही पंचम दा इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनका संगीत आज भी एक विरासत के रूप में जीवित है। संगीत समीक्षकों का मानना है कि जब तक दुनिया में धुनें और सुर रहेंगे, पंचम दा प्रासंगिक बने रहेंगे। बदलते दौर के साथ संगीत सुनने के साधन बदले हैं कैसेट और सीडी से लेकर अब हम स्ट्रीमिंग ऐप्स तक आ गए हैं लेकिन आरडी बर्मन के गानों की प्लेलिस्ट आज भी सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली लिस्ट में शामिल रहती है। वे कल भी भारतीय संगीत की क्रांति थे, आज भी हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मार्गदर्शक बने रहेंगे।
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