Politics Special : एसआईआर के बाद बदली देवबंद की सियासी तस्वीर, नया आंकड़ा देगा सपा को जीवनदान
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लगभग एक लाख 23 हजार हिंदू मतदाताओं में से चार हजार यादव वोटरों को सपा के पाले में खड़ा कर दिया जाए तो भाजपा के एक लाख 19 हजार जबकि सपा के वोटरों की संख्या एक लाख 20 हजार के आसपास मानी जाएगी।
वोटों की स्थिति में भाजपा पिछड़ी, सपा-भाजपा के बीच सीधा होगा शह-मात का खेल
देवबंद : विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद देवबंद विधानसभा सीट पर चुनावी समीकरण में हुआ बदलाव नया गुल खिला सकता है। इस सीट पर भाजपा और सपा एक दूसरे के आमने सामने सीना ताने खड़ी है। वोटों के बदले समीकरणों के बीच इस बार देवबंद सीट पर भाजपा बनाम सपा के बीच रोचक मुकाबला होना तय माना जा रहा है। सपा व भाजपा का पलड़ा बराबर होने के चलते इस बार भाजपा को जीत की दहलीज तक पहुंचने के लिए यहां काफी संघर्ष करना पड़ सकता है।
देवबंद विधानसभा सीट की बात करें तो वर्ष 2022 में इस सीट पर वोटरों की संख्या तीन लाख 49 हजार 474 थी, लेकिन एसआईआर के बाद अब यह संख्या घटकर तीन लाख 15 हजार 217 रह गई है। यानी इस सीट पर 34 हजार से अधिक मतदाता घटे हैं। इस नए डेटा ने पारंपरिक चुनावी समीकरणों को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। एसआईआर के बाद इस सीट पर भाजपा का पारंपरिक वोट लगभग 27 हजार कम हुआ है जबकि करीब सात हजार से अधिक मुस्लिम मतदाताओं की संख्या घटी है। दलित मतदाता लगभग जस की तस स्थिति में हैं। नए समीकरण के मुताबिक भाजपा के पूर्व में लगभग एक लाख 50 हजार मतदाताओं के मुकाबले अब घटकर लगभग एक लाख 23 हजार रह गए है। जबकि मुस्लिम वोटरों की संख्या पूर्व के आंकड़े एक लाख 23 हजार से घटकर करीब एक लाख 16 हजार हो गई है। ऐसे में सपा की राह इस बार आसान दिख रही है। पूर्व की भांति मुस्लिम मतों का एकतरफा झुकाव, यादव वोटों का शामिल होना और अनुसूचित समाज का कुछ हिस्सा अपने साथ जोड़ लेने के बाद सपा यहां अपनी चुनावी वैतरणी आसानी से पार कर सकती है।
चार हजार यादव करेंगे सपा की किस्मत का फैसला?
देवबंद सीट पर चार हजार यादव वोटर सपा की किस्मत का फैसला करने में अहम साबित होंगे। एसआईआर के बाद अनुमान के मुताबिक देवबंद सीट पर लगभग एक लाख 23 हजार हिंदू मतदाता, लगभग एक लाख 16 हजार मुस्लिम मतदाता और करीब 77 हजार दलित मतदाता बचते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लगभग एक लाख 23 हजार हिंदू मतदाताओं में से चार हजार यादव वोटरों को सपा के पाले में खड़ा कर दिया जाए तो भाजपा के एक लाख 19 हजार जबकि सपा के वोटरों की संख्या एक लाख 20 हजार के आसपास मानी जाएगी। यानी इस सीट पर बेहद रोचक समीकरण बन जाते है और यहां भाजपा और सपा की आरपार की टक्कर देखने को मिलेगी।
ठाकुर, गुर्जर या मुस्लिम, सभी देंगे भाजपा को कड़ी टक्कर
वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में देवबंद सीट भाजपा की झोली में गई है। फिलहाल यहां कुंवर बृजेश सिंह दो बार से विधायक चले आ रहे है और वर्तमान में प्रदेश सरकार में पीडब्ल्यूडी राज्यमंत्री भी है। वहीं, सपा इन सीटों पर पूर्व में दूसरे नंबर पर रही है। सपा ने वर्ष 2017 में यहां से मुस्लिम चेहरे पूर्व विधायक माविया अली और वर्ष 2022 में राजपूत समाज के कार्तिकेय राणा पर दांव खेला था। दोनों को ही यहां हार का मुंह देखना पड़ा था। चुनावी विश्लेषक मानते है कि इस बार सपा चाहे ठाकुर, गुर्जर, मुस्लिम या फिर किसी भी बिरादरी को अपना प्रत्याशी बनाए, सभी भाजपा को कड़ी टक्कर देने में कसर नहीं रखेंगे।
भाजपा को मतों का बिखराव रोकने को बनानी होगी रणनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में भाजपा देवबंद सीट पर 1.23 लाख हिंदू मतों के अधिकतम ध्रुवीकरण और बिखराव को रोकने पर ध्यान केंद्रित करेगी। यदि सवर्ण समाज एकजुट रहता है और अनुसूचित समाज के वोटों का कुछ हिस्सा पाले में आता है तो यहां भाजपा मजबूत स्थिति में रहेगी। फिलहाल की बात करें तो चुनाव पूरी तरह से रणनीतिक गठजोड़ और मतों के बिखराव को रोकने पर टिका दिख रहा है।
बसपा भी बिगाड़ सकती है सपा के समीकरण
चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि देवबंद विधानसभा सीट पर 76 हजार से अधिक अनुसूचित समाज के वोटर किसी भी पार्टी की किस्मत बनाने या बिगाडऩे में सक्षम साबित होंगे। यदि बसपा यहां कोई मजबूत प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारती है और वह कुछ मुस्लिम वोट लेने में कामयाब हो जाता है तो ऐसी स्थिति में सपा की राह भी मुश्किल हो सकती है। बहरहाल, नए समीकरणों के बाद चर्चाएं तेज है और सभी पार्टियां अपना अपना आंकलन करने में जुटी हुई है।
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