Mekedatu Project Row: कावेरी विवाद पर सी जोसेफ विजय का पीएम मोदी को पत्र, केंद्र से हस्तक्षेप की मांग
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर मेकेदातु परियोजना में हस्तक्षेप की मांग की है। जानें कावेरी जल विवाद से जुड़ा पूरा मामला।
- मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के सीएम जोसेफ विजय सख्त, पीएम मोदी को पत्र लिख उठाई यह बड़ी मांग
- मेकेदातु प्रोजेक्ट पर गरमाई राजनीति: तमिलनाडु सीएम सी जोसेफ विजय ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी, केंद्र के फैसले पर जताया एतराज
- कावेरी जल विवाद: तमिलनाडु सीएम जोसेफ विजय ने पीएम मोदी को लिखा पत्र, मेकेदातु प्रोजेक्ट पर रोक की मांग
कावेरी नदी जल बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने 28 जुलाई, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक आधिकारिक पत्र भेजा। इस पत्र के जरिए उन्होंने केंद्र सरकार से कर्नाटक की विवादित मेकेदातु परियोजना (Mekedatu Project) में तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि प्रस्तावित ढांचा कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के अंतिम फैसले और सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्णय के अनुरूप है, तब तक इसे कोई भी प्रशासनिक या कानूनी मंजूरी न दी जाए। यह कदम राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री द्वारा दिए गए एक बयान के बाद उठाया गया है, जिससे कावेरी बेसिन राज्यों के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
कावेरी नदी के निचले हिस्से में स्थित राज्यों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के सामने अपना कड़ा रुख अपनाया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मेकेदातु परियोजना से जुड़ी तमाम प्रशासनिक स्वीकृतियों पर रोक लगाने की मांग की है। इसके साथ ही, तमिलनाडु सरकार ने संसद में जल शक्ति मंत्रालय की ओर से आए उस बयान पर भी गहरा ऐतराज जताया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या को लेकर सवाल खड़े किए गए थे।
पूरे मामले की शुरुआत संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा से हुई। 27 जुलाई को राज्यसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने मेकेदातु परियोजना को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने अपने जवाब में कहा था कि 16 फरवरी, 2018 को आए उच्चतम न्यायालय के फैसले में स्पष्ट तौर पर यह उल्लेख नहीं है कि कावेरी नदी पर किसी भी निर्माण से पहले ऊपरी राज्य (कर्नाटक) को निचले राज्यों (जैसे तमिलनाडु) की पूर्व सहमति लेना अनिवार्य है।
इस बयान के सार्वजनिक होते ही तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों में असंतोष की लहर दौड़ गई। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 28 जुलाई को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र भेजकर केंद्रीय राज्य मंत्री के इस बयान को वापस लेने की मांग की। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों में निचले राज्यों के हितों और न्यायिक फैसलों की अवहेलना नहीं की जा सकती।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय का कहना है कि कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पूरी तरह स्पष्ट हैं। किसी भी अंतर-राज्यीय नदी पर ऐसा कोई भी ढांचा नहीं बनाया जा सकता जिससे निचले राज्यों को मिलने वाले पानी के प्राकृतिक बहाव और उनके तय कोटे पर विपरीत असर पड़े। उनका तर्क है कि बिना व्यापक समीक्षा और निचले राज्यों की सहमति के परियोजना को आगे बढ़ाना अदालत के फैसले की भावना के खिलाफ है।
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार के रुख पर तमिलनाडु की ओर से कड़ा विरोध जताया गया है। तमिलनाडु सरकार का मानना है कि संसद के पटल पर दिए गए ऐसे बयानों से ऊपरी राज्य को बिना सहमति निर्माण कार्य आगे बढ़ाने का अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है, जो राज्यों के बीच संतुलन के लिए सही नहीं है।
मेकेदातु प्रोजेक्ट को लेकर सामने आए इस नए मोड़ का सीधा असर तमिलनाडु और कर्नाटक के द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ केंद्र और राज्य के रिश्तों पर भी पड़ सकता है। कावेरी नदी दोनों राज्यों के लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य साधन है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसान हमेशा से ही मेकेदातु बांध निर्माण के प्रस्ताव का विरोध करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि बांध बनने से संकट के वर्षों में उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिल पाएगा।
मुख्यमंत्री द्वारा सीधे प्रधानमंत्री से दखल की मांग करने के बाद अब यह मुद्दा केवल दो राज्यों का न रहकर केंद्र स्तर पर एक प्रमुख अंतर-राज्यीय जल विवाद का रूप ले चुका है। इससे केंद्र सरकार पर भी कानूनी और प्रशासनिक रूप से सही कदम उठाने का दबाव बढ़ गया है।
तमिलनाडु सरकार के इस पत्र के बाद अब सबकी निगाहें प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या केंद्र सरकार राज्यसभा में दिए गए बयान पर कोई स्पष्टीकरण जारी करेगी या मेकेदातु प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) की समीक्षा के लिए कोई नई समिति गठित होगी, यह देखने योग्य होगा। वहीं दूसरी ओर, यदि केंद्र की ओर से तमिलनाडु के रुख के अनुरूप कदम नहीं उठाए जाते हैं, तो यह मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच सकता है।
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