Supreme Court Hearing Jantar Mantar: जंतर-मंतर मामले पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का बड़ा बयान, 2700 से अधिक FIR नहीं होंगी वापस
जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होगी। हालांकि 2700 से अधिक गंभीर केस वापस नहीं लिए जाएंगे।
- Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर प्रदर्शन मामले में राहत, छात्रों पर दर्ज नहीं होगा कोई केस, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की सफाई
- जंतर-मंतर प्रदर्शन: छात्रों पर केस न होने के वादे पर कायम केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने कही ये बड़ी बात
- Supreme Court Update: जंतर-मंतर प्रदर्शन में छात्रों को राहत, गंभीर मामलों में दर्ज 2700 एफआईआर रहेंगी बरकरार
राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि सरकार प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ कोई भी प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज न करने के अपने वादे पर पूरी तरह कायम है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा, उपद्रव और अन्य गंभीर अपराधों में संलिप्त पाए गए तत्वों पर दर्ज की गई 2700 से अधिक एफआईआर को वापस नहीं लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में हुई इस सुनवाई के बाद कानून-व्यवस्था, प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और निर्दोष छात्रों के भविष्य से जुड़े पहलुओं पर स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है।
जंतर-मंतर पर आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान दर्ज मुकदमों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने प्रदर्शनकारियों, विशेषकर युवा छात्रों पर दर्ज प्राथमिकियों की स्थिति को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। केंद्र सरकार ने अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए अदालत को आश्वस्त किया कि विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले निर्दोष छात्रों का भविष्य सुरक्षित रखा जाएगा और उन पर आपराधिक मुकदमे नहीं चलाए जाएंगे। हालांकि, गंभीर गैर-कानूनी गतिविधियों और हिंसा में शामिल असामाजिक तत्वों के प्रति पुलिस और कानूनी प्रक्रिया अपना रुख कड़ा रखेगी।
जंतर-मंतर पर हुए इस व्यापक प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए पुलिस द्वारा कानूनी कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई के तहत बड़े पैमाने पर मामले दर्ज किए गए थे, जिसके बाद छात्रों और उनके परिजनों के बीच अपने करियर और कानूनी मुकदमों को लेकर भारी चिंता बनी हुई थी। मामला शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुंचा, जहां निष्पक्ष जांच और निर्दोषों को राहत देने की मांग उठाई गई।
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने पीठ के समक्ष कहा कि सरकार ने पहले जो प्रतिबद्धता व्यक्त की थी, वह उस पर दृढ़ता से टिकी हुई है। जिन छात्रों की भूमिका केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भागीदारी तक सीमित थी, उनके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर, उन्होंने अदालत को यह भी अवगत कराया कि प्रदर्शन की आड़ में हुए गंभीर अपराधों, तोडफोड़ और हिंसा को लेकर दर्ज 2700 से ज्यादा एफआईआर की विधिक प्रक्रिया जारी रहेगी और इन मामलों को वापस नहीं लिया जा सकता।
केन्द्र सरकार और सॉलिसिटर जनरल के इस स्पष्ट रुख पर विभिन्न पक्षों की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। छात्र संगठनों और अभिभावकों ने निर्दोष छात्रों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न करने के आश्वासन का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इस फैसले से उन हजारों युवाओं को बड़ी राहत मिलेगी जिनका शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य पुलिस मुकदमों के कारण दांव पर लगा हुआ था।
दूसरी तरफ, पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों का मानना है कि गंभीर मामलों में दर्ज 2700 से अधिक एफआईआर को बरकरार रखना बेहद आवश्यक है। अधिकारियों का तर्क है कि प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस कर्मियों पर हमले जैसी घटनाओं में शामिल लोगों को बख्शा नहीं जा सकता, ताकि भविष्य के लिए एक कड़ा संदेश दिया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए इस बयान का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। पहला बड़ा प्रभाव यह होगा कि विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने वाले छात्रों को अनावश्यक कानूनी झंझटों से मुक्ति मिलेगी, जिससे वे अपनी पढ़ाई और करियर पर ध्यान केंद्रित रख सकेंगे। दूसरा असर यह होगा कि कानूनी जांच अब पूरी तरह से केंद्रित हो जाएगी, जिससे पुलिस केवल उन लोगों के खिलाफ साक्ष्य जुटाने में अपनी ऊर्जा लगाएगी जिन पर गंभीर आरोप हैं। यह स्थिति यह भी रेखांकित करती है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के समन्वय से किस प्रकार नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार और सार्वजनिक शांति व्यवस्था के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। मामले की अगली कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अब जांच एजेंसियां उन मुकदमों की बारीकी से छंटनी करेंगी जो 2700 से अधिक एफआईआर के दायरे में आते हैं। इसमें सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर ही आरोप पत्र तैयार किए जाएंगे ताकि किसी निर्दोष को इसमें न घसीटा जाए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पूरे मामले पर आगे के निर्देशों की प्रतीक्षा है, वहीं सभी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां छात्रों की पहचान को अलग करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाती हैं।
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