Delhi E-FIR Case: 17 ई-एफआईआर के जरिए एक ही व्यक्ति को फंसाने पर साकेत कोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को फटकार, कमिश्नर से तलब की रिपोर्ट

Saket Court Delhi Police E-FIR Case: दिल्ली की साकेत कोर्ट ने एक व्यक्ति को 17 ई-एफआईआर के जरिए फंसाने पर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है और कमिश्नर से रिपोर्ट मांगी है।

Jul 9, 2026 - 16:11
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Delhi E-FIR Case: 17 ई-एफआईआर के जरिए एक ही व्यक्ति को फंसाने पर साकेत कोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को फटकार, कमिश्नर से तलब की रिपोर्ट
Saket Court Hearing Crime
  • Saket Court on Delhi Police: एक व्यक्ति पर दर्ज कर दीं 17 E-FIR? साकेत कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को लगाई लताड़, कमिश्नर से मांगा जवाब
  • दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर साकेत कोर्ट का बड़ा प्रहार: 17 E-FIR से फंसाने के मामले में कड़ा रुख, पुलिस कमिश्नर से मांगी रिपोर्ट
  • साकेत कोर्ट का बड़ा एक्शन: 17 ई-एफआईआर के जरिए फंसाने के मामले में दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार, कमिश्नर से विस्तृत रिपोर्ट तलब

दिल्ली की प्रतिष्ठित साकेत कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में पुलिसिया तंत्र और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली के कथित दुरुपयोग को लेकर बेहद कड़ा और सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने एक ही व्यक्ति को निशाना बनाकर लगातार 17 ई-एफआईआर (E-FIR) दर्ज करने और उसे कानूनी पचड़े में फंसाने के गंभीर मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। साकेत कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने डिजिटल माध्यमों के इस तरह के मनमाने इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई और सीधे दिल्ली पुलिस कमिश्नर (Delhi Police Commissioner) से पूरे मामले की विस्तृत और बिंदुवार आंतरिक जांच रिपोर्ट तलब की है, जिससे महकमे में हड़कंप मच गया है।

यह संवेदनशील मामला दिल्ली पुलिस के ऑनलाइन पोर्टल और ई-एफआईआर (E-FIR) प्रणाली के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा हुआ है। अदालत के समक्ष एक ऐसा मामला आया, जहाँ एक ही पीड़ित व्यक्ति के खिलाफ अलग-अलग समय और थानों में कुल 17 ई-एफआईआर दर्ज पाई गईं। इन प्राथमिकियों के आधार पर पुलिस ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कड़े कदम उठाए थे।

जब यह मामला साकेत कोर्ट के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत कानूनी संज्ञान में आया, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पाया कि शुरुआती स्तर पर तथ्यों की प्रामाणिकता जांचे बिना ही धड़ाधड़ मुकदमे दर्ज किए गए। अदालत ने इसे किसी व्यक्ति को जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया में उलझाने और प्रताड़ित करने का एक गंभीर प्रयास माना, जिसमें पुलिस के तकनीकी तंत्र की खामियां भी उजागर हुई हैं।

विस्तृत कानूनी दस्तावेजों और सुनवाई के विवरण के अनुसार, पीड़ित पक्ष ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर यह गुहार लगाई थी कि कुछ असामाजिक तत्वों या आपसी रंजिश के चलते उसके खिलाफ ऑनलाइन प्रणाली का गलत फायदा उठाया जा रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा चोरी, धोखाधड़ी या अन्य छोटे अपराधों के लिए त्वरित ई-एफआईआर की जो सुविधा आम जनता को दी गई है, इस मामले में कथित तौर पर उसी सुविधा को हथियार बना लिया गया।

बिना किसी जमीनी सत्यापन के एक के बाद एक 17 मामले ऑनलाइन दर्ज हो गए और स्थानीय पुलिस ने भी बिना किसी प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के इस पर कानूनी चक्रव्यूह तैयार कर दिया। गुरुवार को साकेत कोर्ट में हुई तीखी सुनवाई के दौरान जज ने जांच अधिकारी (IO) से पूछा कि क्या उन्होंने एक ही व्यक्ति पर इतनी प्राथमिकियां दर्ज होने से पहले उनके अंतर्निहित तथ्यों और आईपी एड्रेस की जांच की थी? पुलिस अधिकारी के पास इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस आंखें बंद करके डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल नहीं कर सकती।

इस मामले में साकेत कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज है। अदालत ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट कहा, "यह नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया की पवित्रता का मामला है। ऑनलाइन एफआईआर की व्यवस्था जनता की सुविधा के लिए है, न कि किसी को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाने के लिए।"

वहीं, कोर्ट की इस कड़ी फटकार के बाद दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने आंतरिक स्तर पर मामले की फाइलें तलब कर ली हैं। मुख्यालय के सूत्रों के मुताबिक, "माननीय अदालत के आदेश का अक्षरशः पालन किया जाएगा। पुलिस कमिश्नर ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित जोन के डीसीपी को तुरंत फैक्ट-फाइंडिंग जांच करने और कोर्ट में पेश की जाने वाली रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश दिया है। यदि किसी स्तर पर पुलिस कर्मियों की मिलीभगत या लापरवाही पाई गई, तो उनके खिलाफ भी कड़ा एक्शन होगा।"

साकेत कोर्ट के इस कड़े रुख का प्रभाव दिल्ली की संपूर्ण पुलिसिंग और कानूनी ढांचे पर पड़ना तय है:

प्रणाली की समीक्षा: इस घटना के बाद दिल्ली पुलिस के आईटी और साइबर सेल को अपने ई-एफआईआर पोर्टल के सुरक्षा फीचर्स और ऑटो-वेरिफिकेशन एल्गोरिदम की समीक्षा करनी होगी ताकि कोई एक ही क्रेडेंशियल या व्यक्ति को बार-बार टारगेट न कर सके।

निर्दोषों को संबल: कोर्ट का यह आदेश उन लोगों के लिए नजीर बनेगा जो झूठे और मनगढ़ंत मुकदमों का सामना कर रहे हैं। इससे आरोपी को तब तक सीधे दोषी घोषित नहीं करने के न्यायिक सिद्धांत को मजबूती मिली है।

जवाबदेही तय होना: सीधे कमिश्नर से रिपोर्ट मांगने के कारण अब स्थानीय स्तर के थानों में शिकायतों को बिना जांचे सीधे एफआईआर में तब्दील करने की जल्दबाजी पर रोक लगेगी।

अदालत ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए एक निश्चित समय सीमा (डेडलाइन) दी है। आगामी सुनवाई के दौरान, पुलिस प्रमुख को यह स्पष्ट करना होगा कि किन परिस्थितियों में एक ही व्यक्ति के खिलाफ 17 ऑनलाइन मामले दर्ज होने दिए गए और इस दौरान थानों के स्तर पर क्या निवारक कदम उठाए गए थे। कोर्ट इस रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद ही तय करेगा कि क्या इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए या इसमें शामिल दोषियों के खिलाफ जालसाजी का मुकदमा चलाया जाए। फिलहाल, पीड़ित को अदालत की इस सख्ती से एक बड़ी तात्कालिक राहत मिलती दिख रही है।

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