Kanpur : ब्रिटिश काल से निकल रहा बाबा बदर अली का ऐतिहासिक आलम जुलूस, आपसी भाईचारे के साथ संपन्न
परंपरा के अनुसार, बाबा बदर अली के बाद उनके दामाद हज़रत अली ने इस व्यवस्था को संभाला। उनके बाद उनकी बेटी मुन्नी बाजी ने इसकी देखरेख की और मुन्नी बाजी के इंतकाल के बाद अब उनके भाई हाजी उस्मान इस जिम्मेदारी को निभा
कानपुर में मोहर्रम की दो तारीख पर बाबा बदर अली का पारंपरिक आलम जुलूस हर साल की तरह इस बार भी पूरी अकीदत, आपसी सद्भाव और भाईचारे के साथ निकाला गया। हाजी उस्मान की अध्यक्षता में यह जुलूस बकरमंडी कब्रिस्तान के सामने से शुरू हुआ। जुलूस के संरक्षक इखलाक अहमद डेविड चिश्ती ने बताया कि ब्रिटिश शासन के समय से यानी पिछले 251 वर्षों से बाबा बदर अली का आलम जुलूस लगातार निकल रहा है।
अंग्रेज़ी हुकूमत से लेकर अब तक कई पीढ़ियां बदल चुकी हैं, लेकिन इस परंपरा और लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आई है। समय के साथ जुलूस में शामिल होने वाले अकीदतमंदों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
परंपरा के अनुसार, बाबा बदर अली के बाद उनके दामाद हज़रत अली ने इस व्यवस्था को संभाला। उनके बाद उनकी बेटी मुन्नी बाजी ने इसकी देखरेख की और मुन्नी बाजी के इंतकाल के बाद अब उनके भाई हाजी उस्मान इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। बाबा बदर अली की याद में दो मोहर्रम को आलम निकालने का यह सिलसिला सदियों से अनवरत चला आ रहा है।
यह ऐतिहासिक जुलूस बकरमंडी कब्रिस्तान से शुरू होकर लुधौरा, चूड़ी मोहाल, छिपयाना, नीली पोश रोड, बेकनगंज, नाला रोड, हलीम कॉलेज चौराहा, रूपम चौराहा, कुली बाज़ार, लाटूश रोड, रोटी वाली गली, नई सड़क, दादा मियां चौराहा, मीना इलेक्ट्रॉनिक और कास्ताना रोड से होते हुए वापस बकरमंडी कब्रिस्तान पर पहुंचकर संपन्न हुआ।
जुलूस के पूरे रास्ते में जगह-जगह स्वागत मंच और लंगर के कैंप लगाए गए थे, जहां लोगों ने फूलों की बारिश कर जुलूस का स्वागत किया। इस दौरान अकीदतमंदों के लिए पानी, शरबत और लंगर का इंतजाम किया गया था। जुलूस में चारों तरफ धार्मिक नारे गूंजते रहे। इस मौके पर जाहिद उस्मान, साकिब अली, शाहिद अली, पार्षद इशरत अली, सूफी मोइनुद्दीन चिश्ती, गुड्डू राजपूत, इन्दल राजपूत, लखपत, अब्दुल जाहिद, मोहम्मद नौशाद और सोनू अली सहित भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।
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