Sambhal: सम्भल में चेहल्लुम पर गूंजा इंसानियत का पैगाम, शिया स्कॉलर बोले- ज़ालिम के सामने कभी सिर न झुकाओ
कर्बला के शहीदों की याद में सम्भल में चेहल्लुम (अरबईन) पूरे अकीदत और गम के माहौल में मनाया गया। इस मौके पर
उवैस दानिश, सम्भल
सम्भल: कर्बला के शहीदों की याद में सम्भल में चेहल्लुम (अरबईन) पूरे अकीदत और गम के माहौल में मनाया गया। इस मौके पर मातमी जुलूस निकाले गए और इमाम-ए-हुसैन की कुर्बानी को याद करते हुए लोगों ने उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश की।
शिया स्कॉलर आबिद हुसैन हैदरी ने कहा कि चेहल्लुम की परंपरा इमाम-ए-हुसैन की शहादत के 40 दिन बाद शुरू हुई, जब हज़रत इमाम-ए-ज़ैनुल आबेदीन, जनाब-ए-उम्मे कुलसूम और सहाबी हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी कर्बला पहुंचे थे। तभी से दुनिया भर में इमाम-ए-हुसैन के मानने वाले इस दिन को उनकी याद में मनाते हैं। उन्होंने कहा कि सम्भल गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल है, जहां चेहल्लुम में हर धर्म और समुदाय के लोग श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं। उनके अनुसार इमाम-ए-हुसैन की कुर्बानी केवल इस्लाम के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत, न्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने का प्रतीक है। आबिद हुसैन हैदरी ने कहा कि इमाम-ए-हुसैन ने यह संदेश दिया कि अत्याचार के सामने कभी सिर नहीं झुकाना चाहिए और हमेशा मज़लूम का साथ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष और हिंसा जारी है, ऐसे समय में कर्बला का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने समकालीन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया को इंसाफ, अमन और इंसानियत के रास्ते पर चलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि चेहल्लुम केवल मातम का दिन नहीं, बल्कि इंसानियत, अमन, भाईचारे और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का संदेश देने का अवसर भी है। उनके अनुसार दुनिया भर से करोड़ों अकीदतमंद अरबईन के मौके पर कर्बला पहुंचकर इमाम-ए-हुसैन की कुर्बानी को याद करते हैं और इंसाफ व मानवता के रास्ते पर चलने का संकल्प दोहराते हैं।
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