Special Article: श्रीकृष्णवंशी राजवंशों  के मध्यकालीन वैभव एवं शौर्य के प्रतीक दुर्ग / किलों का एक ऐतिहासिक शोध....

क्षत्रिय वर्ण( राजपूत) से सम्बन्ध ब्रज प्रदेश में प्राचीन काल से निवास करने वाली जातियों में यादवों  (आधुनिक जादों ,भाटी , जडेजा ,बनाफर , जाधव , चुडासमा , वाडियार ) का नाम उल्लेखनीय

Dec 8, 2025 - 20:38
Dec 8, 2025 - 23:03
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Special Article: श्रीकृष्णवंशी राजवंशों  के मध्यकालीन वैभव एवं शौर्य के प्रतीक दुर्ग / किलों का एक ऐतिहासिक शोध....
श्रीकृष्णवंशी राजवंशों  के मध्यकालीन वैभव एवं शौर्य के प्रतीक दुर्ग / किलों का एक ऐतिहासिक शोध....

श्रीकृष्णवंशी राजवंशों  के मध्यकालीन वैभव एवं शौर्य के प्रतीक दुर्ग / किलों का एक ऐतिहासिक शोध-

आधुनिक समय में यादव या यदुवंशी लिखने से हरकोई श्रीकृष्णवंशी नहीं हो सकता ?

क्षत्रिय वर्ण( राजपूत) से सम्बन्ध ब्रज प्रदेश में प्राचीन काल से निवास करने वाली जातियों में यादवों  (आधुनिक जादों ,भाटी , जडेजा ,बनाफर , जाधव , चुडासमा , वाडियार ) का नाम उल्लेखनीय है । यादवों के मूल पुरुष यदु थे , जिनके नाम पर उनके वंशज यदु, यदुवंशी , यादव  अथवा जदु,जादव,  जादू ,जादों कहे जाते है ।यदु चन्द्र वंश के विख्यात सम्राट ययाति के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनका प्राचीन ग्रंथों में विस्तृत वर्णन किया गया है।सबसे अधिक सर्व मान्य ग्रन्थ वेद व्यास जी द्वारा लिखित महाभारत एवं श्रीमद्भागवत में यादवों के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है ।श्रीमदगीता में भी यादव शब्द का अर्जुन द्वारा श्री कृष्ण जी के लिये उद्वोधन किया गया है।

"सखेति मत्व प्रसभं यदुक्तंम 
हे कृष्ण !हे यादव है सखेति ।
अजानता महिमानम तवेदां 
मया प्रभादात्प्रणयेन वापि ।।

(श्रेमदगीता श्लोक 41 अध्याय -11)

इस प्रकार श्रीमदगीता में भी श्री कृष्ण को हे यादव ,हे सखे  , के नाम से सम्बोधित किया गया है। इस प्रकार "यादव"शब्द संस्कृत का शब्द है और हिंदी में भी यही शब्द तत्सम रूप में प्रयोग किया जाता है।बिलियम क्रूकी ,ईलियट , ग्राउस आदि विदेशी इतिहासवेत्ताओं ने "संस्कृत शब्द "यादवा " का हिंदी अर्थ "जादों " भी लिखा है ।जादू मेवाड़ी भाषा का शब्द है ।ब्रज या अवधी भाषा में जादों कहा जाता है जिसका वर्णन मान्यता प्राप्त देश के प्रसिद्ध इतिहासकारों द्वारा लिखित पुस्तकों तथा जगाओं एवं भाटों की पोथियों में विवरण मिलता है।आधुनिक समय में "जादों "का रूप बदलकर "जादौन "लिखना आरम्भ कर दिया गया। अधिकांश उच्चकोटि के भारतीय इतिहासकारों की पुस्तकों एवं अंग्रेजों के द्वारा लिखे गए भारतीय गजेटियर्स में यदुवंशी क्षत्रियों चाहे वे जैसलमेर के भाटी हो ,देवगिरि ,होयसल तथा विजयनगर के जाधव या यादव हों, कच्छ के जडेजा , चुडासमा,रायजादा, हो या महोबा के बनाफर हो या करौली,अवागढ़, कोटला एवं सोमना-गभाना के जादों राजपूत हो सभी के लिए "यादवा " शब्द का ही प्रयोग किया है।

बृज के कवियों ने जरूर "य"वर्ण को अपनी ब्रज भाषा के अनुसार "ज"रूप में लिख कर जादों ,जदु ,जमुना ,जशोदा ,जादोंपति , जादोंराय जैसे शब्दों का प्रयोग किया है जिनके विस्तृत जानकारी सूरसागर तथा रामायण जैसे पवित्र ग्रन्थों में भी मिलती है।

स्वयं रामायण के बालकांड में तुलसीदास जी ने लिखा है-

"जब जदुवंश कृष्ण अवतारा ।
होइहि हरन महा महिमारा।।
कृष्ण तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होई न मोरा।।

अर्थात जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए "यदुवंश "में श्री कृष्ण का अवतार होगा ,तब तेरा पति उनके पुत्र(प्रधुम्न)के रूप में उतपन्न होगा।मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा।ऐसा भगवान शिव ने कामदेव की पत्नी रति को वरदान दिया ।

यदुवंशियों के एक प्राचीन राजा का नाम कार्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रार्जुन था।उसके वंशज हैहय वंशी यादव कहलाये।उसकी राजधानी माहिष्मती थी।सहस्त्रार्जुन के सौ पुत्रों में से एक का नाम शुर या शूरसेन था , जिसके नाम पर ही यमुना तट का यह प्रदेश जिसे ब्रज कहा जाता है , प्राचीनकाल में शूरसेन कहलाता था।

भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशय: [रामा0, उत्तर0, 70, 6] तथा-स पुरा दिव्यसंकाशो वर्षे द्वादशमें शुभे । निविष्ट: शूरसेनानां विषयंश्चाकुतोभय:॥[70, 1]

↑ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पंचाला: शूरसेनका: । एप ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तर:॥(मनु0 2, 19) शूरसेन जनपद का विस्तार दक्षिण में चम्बल नदी से उत्तर में मथुरा के लगभग 50 मील उत्तर तक था । पश्चिम में इसकी सीमा मत्स्य जनपद से और पूर्व में दक्षिण पंचाल राज्य की सीमाओं से मिलती थी (देखिए पार्जीटर-मार्कण्डेय पुराण, पृ0 351-52,)

पौराणिक यादवों की अन्य शाखाओं में वृष्णि , अन्धक ,कुकर और भोज भी प्रसिद्ध थीं जिनमें से अधिकांश में गणतन्त्र व्यवस्था थी।शूरसेन प्रदेश के कई यादव राज्यों ने अपना संघ बना रखा था , जो "अन्धक-वृष्णि संघ "कहलाता था ।अन्धक संघ के अधिपति उग्रसेन थे जिनकी राजधानी मथुरा थी। वृष्णि संघ के मुखिया वसुदेव जी थे जिनकी राजधानी शौरिपुर (आधुनिक बटेश्वर ) थी।

अन्धक संघ के अधिपति उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री देवकी जी वृष्णि संघ के अधिपति शूरसेन के पुत्र वसुदेव जी को ब्याही थी।उनके पुत्र योगीश्वर यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण जी एवं बलराम जी हुए। अन्धक वंशी उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था , जिसका विवाह शक्तिशाली मगध सम्राट जरासन्ध की दो पुत्रियों के साथ हुआ था।महत्वाकांक्षी कंस ने उग्रसेन को जरासन्ध के प्रभाव की बजह से कैद कर स्वयं शासन सत्ता संभाल ली , जिसका कोई भी तत्कालीन यादववंशी योद्धा विरोध नहीं कर सका , क्यों कि कंस भी स्वयं उस समय का महान बलशाली योद्धा था जिसके बल को देखते हुए ही मगध नरेश जरासन्ध ने उसको अपना जमाता बनाया था , जिसका अन्त देवकीनन्दन कृष्ण द्वारा हुआ।

कंस वध के कारण जरासन्ध कृष्ण को शत्रु मानकर मथुरापुरी पर अनेकों बार (17 बार ) फौज लेकर चढ़ा जिससे यादवों की शक्ति कमजोर हुई। जरासन्ध के आक्रमणों से बचने के लिए यादव मथुरा छोड़कर सुदूर पश्चिम की ओर चले गए।यादवों ने समुद्र तट पर द्वारिका नामक एक रमणीक नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया ।
महाभारत के युद्ध काल में द्वारिका का यादव क्षत्रिय राज वंश राज्य बड़ा शक्तिशाली था , उसका कारण श्री कृष्ण का कुशल नेतृत्व था।जब श्री कृष्ण के तिरोधाम का समय आया , तब दुर्देव से तथा गांधारी के शाप से द्वारका के यादवों में भीषण गृह -,कलह हुआ  ;जिसके कारण उनमें से अधिकांश आपस में ही लड़ कर मर गये तथा बाद में कुछ को स्वयं श्री कृष्ण ने गुस्सा होकर अपने सुदर्शन चक्र से मार डाला।

जब अर्जुन को श्री कृष्ण जी के सारथी दारुक से द्वारका के यादवों के सर्वनाश का समाचार मिला , तब वह द्वारका जाकर वहां के शेष यादवों को हस्तिनापुर लिवा लाये और उन्हें पंजाब , इंद्रप्रस्थ तथा मथुरामण्डल में बसा दिया ।इस प्रकार इस क्षेत्र में फिर से यादवों की बस्तियाँ बस गई।श्री कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को मथुरा का शासक बनाया गया। वज्रनाभ के बाद उनके पुत्र प्रतिबाहु , उनके पुत्र सुबाहू, उनके पुत्र शान्तसेन तथा उनके पुत्र शतसेन हुये।

कहते है कि कुछ कालोपरान्त प्रतिवाहू से मथुरा का राज्य निकल गया ।यहां नागों का राज्य स्थापित हो गया।अतः प्रतिवाहू ने पुनः अपने पूर्वजों के राज्य क्षेत्र द्वारका जाकर नया राज्य स्थापित किया। इन्हीं के वंशज कालान्तर में जादों (छोंकर ,पोर्च ,वांगर बडेसरे ,टांक ) ,जाधव ,जडेजा , भाटी (जैसवार ,रावल ,बरगला ,जसावत), शूरसैनी, चुडासमा ,बनाफर ,रायजादा ,एवं सरवैया आदि नामों से विभिन्न प्रदेशों में जाने जाते हैं।

कुछ समाज विशेष के कथाकथित आधुनिक इतिहासकार क्षत्रियों के  यादव /यदुवंशी राजवंश के पौराणिक इतिहास को तोड़-मरोड़ कर अपना  नया इतिहास बनाने  की भरपूर जुगत में बड़ी योजना के रूप में सोशियल साइट्स पर  अपने कथाकथित भगवताचार्यों  की मदद से  कृष्णवंशी बनने का प्रयास कर रहे है लेकिन उनके पास धार्मिक ग्रंथों जैसे हरिवंश पुराण ,विष्णुपुराण ,श्रीमद्भागवत पुराण ,वायुपुराण ,सुखसागर ,महाभारत , मत्स्यपुराण ,गर्गसंहिता आदि में यदुवंश की वर्णित वंशावली के अतिरिक्त अपनी कोई भी वंशावली श्रीकृष्ण से लेकर आज तक उनके पूर्वजों तथा स्वयं उनकी उपलब्ध हो ही नहीं सकती।  उनके जगाओं /भाटों के पास कोई क्रमवद्ध  वंशावली उपलब्ध है ही नहीं। पता नहीं उनके जगा / भाट हैं भी या नहीं । जगा लोग राजवंशों का ही इतिहास हमेशा से लिखते आये हैं जो आज भी लिख रहे हैं ।अलग- अलग  क्षत्रिय वंशों के जगा /भाट भी अलग -अलग होते हैं  जो आज भी वंशावली लिखते हैं। 

कुछ कथाकथित श्री कृष्णवंशी लोग  पुराने दक्षिण एवं उत्तर भारत के वास्तविक यदुवंशी /यादवा राजवंशों के इतिहास में अतिक्रमण कर  अपना नया मनगढंत इतिहास बनाने का  दावा प्रस्तुत कर रहे है जब कि उन  मध्यकालीन वास्तविक  यदुवंशी राजवंशों  के वंशज आज भी मौजूद हैं ,  जिनमे से  कुछ मुगलकाल में ( देवगिरि ,द्वारसमुद्र एवं विजयनगर के राज्य) समाप्त हो गए थे ।लेकिन देवगिरि के यादव / जाधव , मैसूर के वाडियार ,गुजरात के यादव /यदुवंशीचुडासमा ,जडेजा ,रायजादा ,सरवैया ,महोवा के यदुवंशी बनाफर ,जैसलमेर एवं सिरमौर  के यदुवंशी भाटी , मथुरा / बयाना / करौली , जलेसर ,कोटला ,अवागढ़ ,सोमना, गभाना  के यदुवंशी जादों , रामपुरबुशहर(हिमाचल प्रदेश ) के यादव राजपूतों के वंशज आज मौजूद हैं  ।इन सब यादव /यदुवंशी राजवंशों के महल ,शौर्य के प्रतीक दुर्ग /  किले , वंशावलियाँ तथा मध्यकालीन यदुवंशी राजाओं के राज्यों के नाम आज भी आधुनिक भारतीय इतिहास की मान्यता प्राप्त पुस्तकों  एवं  विभिन्न राज्यों के जिलों के गजेटियरों  में अंकित हैं जिसे कोई बदल भी नहीं सकता। कथाकथित यदुवंशी लोग ये सब आप कहाँ से लाओगे। स्वतंत्र भारत में सब को अपना कुछ भी उपनाम लिखने की आजादी है लेकिन सत्य हमेशा सत्य ही होता है जिस पर हम सब भारतीयों को गर्व करना चाहिए ।

(अ) यदुवंशी जादों राजपूतों के दुर्ग-

1-बयाना दुर्ग / विजयमन्दिरगढ़- बयाना - यह भरतपुर से 7 मील दक्षिण पश्चिम में स्थित है। इसके प्राचीन नाम शांतिपुर, श्रीपथा व विजयमन्दिर गढ़ थे। विजयपाल ने 11वीं शताब्दी में यहां एक दुर्ग बनवाया था तब इसका नाम विजयमंदिर गढ़ दिया था । बारहवीं शताब्दी मे यह बयाना कहलाने लगा । बाद में कुछ समय के लिए यह सुल्तानपुर के नाम से भी पुकारा जाने लगा। मध्ययुगीन शिलालेखों में इसको ब्रह्म बाग के नाम से भी उल्लेख किया गया है। ईसवीं सन् 955 में यहां के शासक मंगलराज की रानी चित्रलेखा ने यहां विष्णु का मंदिर बनवाया था। यहां जैन धर्म का भी काफी प्रचार था तथा उस समय की कई जैन मूर्तियां मिलती है। 14वीं शताब्दी में यहां मुसलमानों का शासन होने पर यहां कई मस्जिदें हिन्दू मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई ।

2- तिमनगढ़/ ताहनगढ -

 यह  दुर्ग बयाना से 15 मील दक्षिण में है। इस किले को  तिमनपाल यदुवंशी ने ग्यारहवीं सदी में बनवाया था और उसी गढ़ के आस-पास की बस्ती तहनगढ़ कहलाने लगी। यह गढ़ मध्ययुग में बड़ा सामरिक महत्व रखता था। अतः मुसलमानों के आक्रमण बराबर होते रहते थे और इसी कारण यह नगर शीघ्र उजड गया।यह दुर्ग पाषाण की मूर्तियों के अमिट खजाने एवं हस्तशिल्प के बेजोड़ नमूनों के लिए ख्याति प्राप्त था । यहां कई जैन व शैव मन्दिर थे लेकिन मुस्लिम आक्रमणों के कारण अब केवल खण्डर रह गये हैं। यह स्थान करौली से 42 किलोमीटर दूर मासलपुर के पास स्थित है।

3- मण्डरायल किला-

करौली से दक्षिण मे 40 किलोमीटर दूर चम्बल नदी के निकट मण्डरायल कस्वा है जिसकी ऊँची अरावली पहाड़ियों में  मंडरायल का  दुर्ग बना हुआ है जो करौली की स्थापना से पूर्व का है।  इस किले का निर्माण संवत 1184 के लगभग बयाना के यदुवंशी शासक विजयपाल के पुत्र मदनपाल ने कराया था।कुछ किवदन्तियों के अनुसार माण्डव ऋषि के नाम इस दुर्ग का नामकरण होना मानते हैं ।माना जाता है कि जब  यदुवंशी इस क्षेत्र में आये थे तब भी यह दुर्ग मौजूद था। मंडरायल दुर्ग को ग्वालियर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है ।यह दुर्ग लाल पत्थरों से बना हुआ है।
मध्यकाल मे सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण किला था। दिल्ली सल्तनत का अधिकार इस किले पर लम्बे समय तक रहा है। यदुवंशी नरेश अर्जुन देव द्वारा करौली की स्थापना से पूर्व इस किले पर अधिकार किया, साथ ही नींदर गाँव मे एक गढी का निर्माण भी किया था। 1504 ईस्वी मे सिकन्दर लोदी ने इस किले पर अधिकार कर लिया तथा इसमें स्थित मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनवाई ।

सिकन्दर लोदी ने यहां स्थित विशाल उद्यान भी नष्ट करदिया ।1534 ईस्वी में गुजरात के शाह बहादुरशाह के सेनापति तातार खां ने इस दुर्ग को अधिकृत कर लिया। इस बाद हुमाँयू की सेना ने तातार खों से इस किले को छीन लिया।महाराजा गोपालदास ने इसे मुसलमानों से छीनकर करौली राज्य में सम्मलित किया।उसके बाद यह दुर्ग करौली राज्य में ही बना रहा ।वर्तमान में यह दुर्ग खण्डहर प्रायः हो चुका है।चम्बल नदी यहां से 5 किमी0 की दूरी पर बहती है।  करौली के राजा हरवख्स पाल के शासनकाल में 1820 ईस्वी के आसपास इस दुर्ग के अंदर वाल किला बनवाया।
इसके बाद यह किला निरन्तर करौली नरेशों के अधीन रहा। किले से लगभग 1 किलोमीटर पश्चिम में गैवरदान की गुफा तथा एक कब्र के अवशेष उपलब्ध है जहाँ ग्रामीण सर्प काटने तथा अन्य मनोतिया पूरी करने के लिए पहुंचते है।

4- बहादुरपुर किला- जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर मंडरायल  मार्ग पर वन क्षेत्र मे बहादुरपुर किला अपने अतीत का शाक्षी बनकर खण्डहर  स्थिति में खड़ा हुआ है। मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों और सुरक्षा सैनिकों के लिए प्रकोष्ठ बने हुए  है। साथ ही चारों ओर सुदृण परकोटा है। दरवाजे के अंदर उत्तर की ओर एक बावडी तथा कुआ है। किले के ये ही प्रमुख जल स्रोत थे।दरवाजे पर 1589   ईस्वी का एक शिलालेख है। अभिलेख में गोपालपुर लिखा होने से  लगता है कि इस किले का निर्माण राजा गोपालदास द्वारा कराया गया हो। किले के नीचे एक नदी बहती है।

उतगिरि के बाद करौली की राजधानी बहादुरपुर बनी जहाँ राजा गोपालदास का शासन था। आमेर की राजकुमारी रस कंवर से इनका विवाह हुआ था। सम्राट अकबर का दौलताबाद विजय में सहयोग करने पर इन्हें अजमेर का सूबेदार बनाया गया था। आगरे के लाल किले की नीव भी 1506ई0 में अकबर  द्वारा इसी राजा से रखवाई गई थी। गोपालदास के बाद द्वारिकादास , मुकुंददास एवं छत्रमणी ने यहीं से करौली राज्य का शासन संचालित किया।किले में द्वारका दास के एक अन्य पुत्र मगधराय का स्मारक बना हुआ है जहाँ लोग मनोतियाँ मांगने जाते हैं।

5- ऊँटगिर किला - यह दुर्ग घने जंगल के भीतरी भाग  में  रणथम्भौर अभ्यारण क्षेत्र में स्थित है। करणपुर के पश्चिम में कल्याणपुरा  के पास यह किला तीनों ओर से पहाड़ियों से घिरा है ।किले के नीचे अनेक पुरानी छतरियां बनी हुई हैं।  इस दुर्ग का निर्माण लोधी जाति के लोगों ने कराया था ।उन्होंने ही समय -समय पर यहां तालाब और बांध बनवाये ।महाराजा अर्जुनपाल ने सम्बत 1397 में इस दुर्ग को लोधियों को खदेड़ कर हस्तगत किया था।
 करौली से 40 किमी पश्चिम में करनपुर के पास पर्वत श्रृंखला की सुरंगनुमा पहाडी पर स्थित है। पहाड़ी की आकृति ऊँट जैसी होने के कारण संभवतया इसका नाम उंटगिर पड़ा हो ।राजा प्रतापरुद्र ने उंटगिर को अपनी राजधानी बनाया।बाद में 15 वीं सदी में राजा चन्द्रसेन इस दुर्ग में रहे थे।

5- देवगिरि- इस किले का निर्माण महाराजा देव बहादुर गोपालदास के समय हुए होने के आधार पर इसका नाम देवगिरि रखा गया।यह दुर्ग उंटगिर के शासकों का आवास था।लोग देवगिरि में रहते थे।यह किला रणथम्भौर अभ्यारण्य क्षेत्र में उंटगिरि के पूर्व में चम्बल के किनारे ऊँचाई पर स्थित है। किले का अधिकांश भाग खण्डहर होते हुऐ भी अतीत की घटनाओं का साक्षी है।

7- कुँवरगढ़ किला - राजाधर्मपाल के पुत्र  कुँवरपाल ने चम्बल नदी के किनारे झिरी के पास गौलारी में  संवत 1153 ,ईसवी सन 1096 में एक किला वनबाया था जो कुँवरगढ़ के नाम से जाना गया।

8 फतेहपुर किला- इस किले का निर्माण हरनगर के ठाकुर घासीराम ने सन 1702 ई0 में कराया था। करौली से 30 किमी दूर कंचनपुर मार्ग पर 250 वर्ष पूर्व निर्मित यह किला यदुवंशियों की 16 शाखाओं का मुख्यालय था। क़िले के अन्दर आवासीय भवनों के अलावा पानी के टाँके एवं हनुमान जी का मन्दिर है।

9 किला नारौली डांग- सपोटरा के नारौली गांव में ऊँची पहाड़ी पर स्थित  है। इस किले का निर्माण सन 1783 ई0 में करौली के यदुवंशी मुकुन्दपाल के वंशजों ने कराया था। राजा भंवरपाल जी ने किले के चारों ओर परकोटा एवं कचहरी का निर्माण कराया था ।

10 रामठरा किला - यह दुर्ग करौली क्षेत्र के सपोटरा उपखण्ड में स्थित है। इस किले का निर्माण करौली के यादवों ने कराया था।सन 1645 में इस किले का करौली महाराजा ने अपने पुत्र भोजपाल को जागीरदार बना कर इस किले का अधिकारी बनाया था  । इस किले के जागीरदार भोजपाल थे ।यह किला कैलादेवी अभ्यारण्य से 15 किमी दूरी पर है। इसकी दिवारों व छतों पर आकर्षक चित्रकारी की गई है। यहां पर्यटकों के ठहरने की भी व्यवस्था है। दुर्ग के पास एक शिवजी का मन्दिर है जिसका निर्माण रामठरा के जागीरदार आनन्द पाल जी की पुत्री जो जयपुर के महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह को ब्याही थी उन्होंने अपने भाई अर्जुनपाल जी रामठरा को पत्र लिख कर रामठरा में अपनी तरफ से  एक मन्दिर वनबाने का आग्रह किया था जो अर्जुनपाल जी ने स्वीकार कर लिया ।यह वही शिवालय मन्दिर है ।यह मन्दिर संवत 1743 में बना हुआ है जिसके  निर्माण के लिए पैसा एवं कारीगर जयपूर से जादौन जी ने अपने जीते जी भेजे थे।

11 सपोटरा दुर्ग- सपोटरा दुर्ग करौली के महाराजा धर्मपाल के वंशज राव उदयपाल ने बनवाया था जो महाराजा रतनपल के पुत्र थे।राव उदयपाल को सपोटरा ठिकाना दिया गया था तथा उनके भाई कुंवरपाल करौली के सन 1688 में राजा बने थे।ये दुर्ग जीरौता से 11किमी पूर्व में है।इसमें एक खूबसूरत तालाब भी बना हुआ था।अब दुर्ग जीर्ण-शीर्ण स्थित में है ।

12 थाली दुर्ग - यह दुर्ग मचीलपुर से उत्तर-पश्चिम में एक पहाड़ी पर स्थित है। इस दुर्ग का निर्माण महाराजा  हरबख्श पाल ने कराया था। इस दुर्ग में अन्दर एक कुंआ है जिससे जलापूर्ति की जाती भी। 

13 कुरा दुर्ग - मचीलपुर से 3 किमी. पूर्व में यह दुर्ग स्थित है। यह किला  महाराजा गोपालदास ने बनवाया था। दुर्ग के पास एक नाला बहता है जिस पर आम के बाग थे।  दुर्ग के अन्दर एक गहरा पूल है।

14 मांची दुर्ग- यह दुर्ग मांची गांव में था। यह हरिदास ठाकुर के वंशजों की रियासत थी। यहां पर एक दुर्ग था जो महाराजा  प्रतापपाल द्वारा तोड़ कर ध्वस्त किया गया था क्यों कि मांची ठाकुर उनके समय में विद्रोही थे। 

15 अमरगढ़ दुर्ग- यह करौली रियासत का सशक्त ठिकाना रहा । यहाँ का पहला ठाकुर राजा जगमन का बेटा अमरमान था। इसी ने इस गिरि दुर्ग का निर्माण कराया और दुर्ग के नीचे आबादी विकसित कराई। यहाँ के ठाकुरों का आमतौर पर अपने शासकों से मतभेद रहा करता था। महाराजा मानिक पाल (1722-1804 ई) के शासन में कुँवर अमोलक पाल ने सन् 1802 ई0 में यह किला उमरगढ़ के ठाकुरों से छीन लिया। इसी प्रकार महाराजा हरबक्स पाल (1804-1837 ई) ने भी अपने समय में इस गढ़ को एक बार हस्तगत कर लिया था।

महाराणा प्रताप्रपाल (1837-40 ई) ने यहाँ के ठाकुर लक्ष्मणपाल को विरोधियों की मदद करने के इल्जाम में (सन् 1947 ई) पन्द्रह हजार रूपयों से दंडित किया। यह गढ़ आज भी सुरक्षित है जिसमे ठाकुरों के वंशज रहते हैं। इस दुर्ग से कुछ ही दूरी पर क्षेत्र की प्रसिद्ध गुफा घण्टेश्वर है, जो वन्यजीवों के साथ अपनी प्राकृतिक सम्पदा से अकूत है।" अमरगढ़ दुर्ग में पानी के संग्रहण हेतु एक ताल भी था।

16 बाजना दुर्ग - बाजना में भी एक किला था जो अब खण्डहर अवस्था में है।

17 जम्बुरा दुर्ग- यह दुर्ग मचीलपुर परगने के पूर्वी इलाके में लगभग 3 मील दूरी पर था। 

18 निन्दा किला- यह किला मंडरायल के उत्तर में 3 मील दूरी पर स्थित था अब खण्डहर है।

19 उन्ड का किला- यह किला मंडरायल के उत्तरी-पूर्वी भाग में चम्बल के पास स्थित था।

20 खुर्दयी  का किला- यह किला मंडरायल के पास स्थित है।

21 दौलतपुरा का किला- उंटगिरी के पास 14 मील पश्चिमी क्षेत्र में है।

22-सबलगढ़ किला- सबलगढ दुर्ग का निर्माण करौली के राजा गोपालसिंह द्वारा कराया गया। सन् 1752 ई. में इन्होंने सबलगढ़ विजयपुर जीत कर राज्य का विस्तार किया। गोपाल सिंह के समय राज्य की सीमायें क्वारी नदी के पार कर गई सबलगढ़ नगर के परकोटे का निर्माण भी इन्हीं के द्वारा कराया गया है।

सन् 1750 ई. में यूरोपियन यात्री ट्रीफन थ्रेलर यहाँ होकर गुजरा। उसने अपने यात्रा वृतांत में "सबलगढ़ किले को एक मजबूत किला" होने का उल्लेख किया है। सन् 1795 में यह किला मराठाओं ने करौली के जादों  राजपूतों से छीन लिया और मराठा सरदार खाण्डेराव को यहाँ का प्रशासक नियुक्त किया। सन् 1809 में "जॉन वैपेटिस्ट द्व इसे अपने अधिपत्य में ले लिया गया किन्तु कुछ समय पश्चात इसे मराठाओं को फिर वापस कर दिया गया।

सबलगढ़ किला सबलगढ़ नगर में मुरैना से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है। मध्यकाल में बना यह किला एक पहाड़ी के शिखर पर बना हुआ है। इस किले की नींव सबल सिंह ने डाली थी। करौली के महाराजा गोपाल सिंह ने 18वीं शताब्दी में इसे पूरा करवाया था। कुछ समय बाद सिंकदर लोदी ने इस किले को अपने नियंत्रण में ले लिया था लेकिन बाद में करौली के राजा ने मराठों की मदद से इस पर पुन: अधिकार कर लिया ।

इस किले का निर्माण जमीनी सतह से लगभग 50 मीटर ऊँची पहाड़ी पर किया गया है। किला परिषर में जाने के लिये चार प्रमुख प्रवेश द्वार हैं। बुर्जों पर आधारित परकोटा से किला सुसज्जित है। किले • हवेली राजपूत स्थापत्य शैली की है। किले के पीछे सिंधिया शासन काल में बना एक बांध है। बलुआ पत्थर के भीतर नवल सिंह की हवेली, नवल सिंह की कचहरी, घुड़साल आदि स्मारिक हैं। जिसमें नवल सिंह की से निर्मित यह सबलगढ़ का किला अत्यंत सुन्दर एवं मनमोहक है।

23- जवाहरगढ़ दुर्ग- जवाहरगढ़, सबलगढ़ से 20 कि.मी. दूर विजयपुर रोड़ पर स्थित है। यहां एक पहाड़ी पर किला बना हुआ है। इस किले का निर्माण 17-18 वीं शती ई. में करौली के राजा गोपाल सिंह द्वारा कराया गया था।

इस किले में प्रवेश के चार द्वार है किले में निर्मित कक्षों की दीवारों के अब अवशेष ही शेष बचे है, छतें गिर गई है। किलें के प्रांगण में एक कुआं निर्मित है जिसमें वर्षभर पानी रहता है। किले की पहाड़ी के नीचे नवीन मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर के गर्भग्रह में बीजासन देवी की प्रतिमा विराजमान है। इसी पहाड़ी के नीचे चार स्तंभो पर आधार छन्त्री का निर्माण किया गया है। जिसे जागीरदार की छत्री कहा जाता है। छत्री के समीप ही एक पुरानी इमारत है जिसे स्थानीय लोग कचहरी के रूप में जानते है।

24- पालपुर जागीर और पालपुर गढ़ी- पालपुर के जागीरदार करौली के जादौन राजाओं के वंशज हैं। "हिस्ट्र जागीरदारान" ग्वालियर स्टेट में "हालत-किशोर सिंह, जागीरदार पालपुर परगना पोहरी जिला नरवर" में उल्लेख किया गया है कि- "इस खानदान के ठाकुर चंद्रवंशी जादौन राजा करौली के रिश्तेदार हैं।" सन् 1660 ई. में बली बहादुर पालपुर पर के काबिज हुए। इनके बाद नारायण सिंह, बरजोर सिंह, तेजलसिंह हुए। सन् 1794 में ठाकुर जबान सिंह इस खानदान के जागीरदार थे। यह मुल्क राजा करौली से फतह किया, चूँकि जवान सिंह दरबार की तरफ से शामिल हुए इसलिए इनकी साविक जागीर बदस्तूर छोड़ी गई ।

सन् 1825 ई. में बलभद्र सिंह को पट्टा हुआ। इसके बाद शिवरतन गद्दीनसीन हुए। शिवरतन की में मृत्यु होने के बाद उनके बड़े पुत्र माधौसिंह को गद्दी मिली तथा माधौसिंह की मृत्यु होने के बाद उनके छोटे भाई किशोर सिंह जागीरदार हुए। किशोर सिंह के बाद श्री जगमोहन सिंह जी यहाँ के अंतिम जागीरदार रहे। वर्तमान में इस घराने में श्री पुष्पराज सिंह, श्री कृष्णराज सिंह, श्री विक्रम राज सिंह मौजूद हैं तथा ग्वालियर में निवासरत हैं।

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पालपुर किले का निर्माण संभवतः करौली के राजा गोपाल सिंह द्वारा कराया गया था इस किले प्राकृतिक सुरक्षा कूनो नदी से प्राप्त है। इसके बाद सुरक्षार्थ एक ऊँची प्राचीर है। जिसमें बुर्ज बने हुए हैं। किले के दो प्रवेश द्वार हैं। यह किला दो मंजिला है। किले के अन्दर एक आयताकार भवन ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बना हुआ है। इसमें नक्काशीदार सजावट की गई है। यह रामजानकी मंदिर है। यह इस ठिकानेदारों का पूजा घर है। किले के अंदिर दांयी ओर आयताकार दो मंजिला इमारत है। जिसकी अब एक ही मंजिल शेष है। यह पालपुर के शासकों का दरबार हॉल अथवा कचहरी है।

कचहरी के सामने एक बड़ा प्लेटफार्म बना है, जिस पर यहाँ के जागीरदार कचहरी लगाते समय बैठते होंगे। इस किले का निर्माण राजपूताना स्थापत्य शैली में किया गया है। पालपुर जागीर में 28 गाँव शामिल थे। इनमें से अधिकांश गाँव श्योपुर जिले के कराहल, वीरपुर, विजयपुर तहसील अंतर्गत आते हैं। इन गाँवों में बहुत से गाँव कूनो नेशनल पार्क में पार्क में आ जाने से इनका विस्थापन किया गया है। अब यह किला या गढ़ी कूनो नेशनल पार्क का हिस्सा है। यहाँ से कूनो नदी और कूनो घाटी का सौन्दर्य देखते है बनता है। यह गढ़ी अधिकांशतः खण्डर अवस्था में है, इसकी निर्माण 16वीं- 17वीं सदी में किया जान प्रतीत होता है।

25- सुमावली किला- यह दुर्ग  नूराबाद से 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है इस दुर्ग का नाम निर्माण राजा गोपाल सिंह ने ही करवाया था।उनका एक सामन्त सोमपाल  इस दुर्ग में रहते थे । सांक नदी से लेकर सबलगढ़ का क्षेत्र करौली के  जादों राजपूत शासकों के अधिकार क्षेत्र में था, उन्हीं के सामन्तों का इस गढ निवास स्थान था। 

19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक यह किला करौली के शासक राजा गोलपाल सिंह के आधिपत्य में  रहा। इसके बाद ग्वालियर के सिंधिया रियासत के अधीन आया । विक्रम संवत् 1868 (ई. सन् 1811 ) एवं 1889 (ई. सन् 1832) में तुलसी पाण्डे और रामपाल नामक किलेदार की जानकारी प्राप्त होती है ।

यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था । सबलगढ़ के शासकों द्वारा इसका निर्माण 17-18वीं शताब्दी में करवाया था, जो अधिक समय तक करोली के शासकों के अधिपत्य में रहा। सुदृढ़ गढ़ी आकार में वर्गाकार है, जिसके कोनों पर बुर्जों की संरचना है। इसकी प्राकार भित्ति एवं बुर्ज 50 फीट ऊँचे है। गढ़ी के अंत: भाग में निवास हेतु महलों की संरचना भी रही है जो अब जीर्ण-शीर्ण हो  चुकी है।

26- केसरोली दुर्ग- अलवर जिले में नीमराणा दुर्ग से कुछ दूरी पर केसरोली दुर्ग स्थित है। यहाँ से महाभारत कालीन प्रमाण मिले हैं। केसरोली दुर्ग का एक द्वार पाण्डवकालीन माना जाता है। वर्तमान केसरोली दुर्ग, इस क्षेत्र के यादव शासकों द्वारा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में बनाया गया। दुर्ग का निर्माण महाभारत काल से चले आ रहे अति प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर किया गया। यह दुर्ग धरती से डेढ़-दो सौ फुट ऊंची चट्टान जैसी पहाड़ी पर बना हुआ है। दुर्ग के भीतर कई महल हैं। एक विशाल कुंआ भी बना हुआ है। दुर्ग के उत्तर की ओर एक तालाब है।
फिरोजशाह तुगलक के समय में इस क्षेत्र के यादवों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके बाद यह दुर्ग मेवाती मुसलमान खानजादों के अधीन हो गया। बाबर के आक्रमण के समय यह दुर्ग हसन खां मेवाती के अधीन था जो खानवा के मैदान में महाराणा सांगा की तरफ से लड़ता हुआ काम आया।

बाबर ने यह दुर्ग मुगल सल्तनत में सम्मिलित कर लिया। जब अठारहवीं शताब्दी में मुगल कमजोर हो गये, तब यह दुर्ग जाटों के अधीन हुआ। जब रावराजा प्रतापसिंह ने जयपुर राज्य में से अलवर राज्य का निर्माण किया तब यह यह दुर्ग अलवर राज्य के कच्छवाहों के अधीन हो गया। ई. 1831 में अलवर के राजा विनयसिंह ने यह दुर्ग ठाकुर भवानीसिंह राणावत को दे दिया जो मेवाड़ के सिसोदियों से सम्बन्धित था। इसमें अब हेरिटेज होटल चलता है।

27- तोक्षीगढ़ किला- अलीगढ़ के इगलास क्षेत्र में तोक्षीगढ़ 12 वीं सदी में जादों राजपूतों की कुड़ेरिया शाखा का ठिकाना था।महावन के राजा महिपाल के पुत्र तुच्छपाल  ने अपने नाम पर तोच्छी नगर बसाया था तथा  एक किला बनबाया था जो आज एक  टीले की जगह को चिन्हित करता है। इस टीले का क्षेत्रफल लगभग 20 एकड़ है। यह  किला /टीला जो अब खण्डहर स्थिति में है ,लगभग 15 फीट ऊंचा है। इस टीले के स्थान पर जादों राजा तोछपाल द्वारा एक किले की स्थापना की गई थी। बाद में  किला मुस्लिम शासकों के आधिपत्य में भी रहा है।यह तोछीगढ़ का किला 18 सौ के दशक में  हाथरस के  पोर्च यदुवंशी राजपूत राजाओं  ने जादों  राजा तुच्छ पाल के  वंशजों से छीन लिया।इसके बाद यह किला मराठों ,जाटों तथा अंग्रेजों के आधिपत्य में भी रहा।

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28- गभाना का किला - गभाना अलीगढ़ जिले की एक प्रसिद्ध रियासत रही है। यह अलीगढ़ से 19.6 कि.मी. जी.टी. रोड पर स्थित है। यहां ग्वालियर राज्य के अधीन श्री चंदनसिंह की रियासत थी। उस समय सोमना और गभाना इन्हीं के अधीन थे। चंदनसिंह ने  श्री लेखराज सिंह को गोद ले लिया ।रायबहादुर लेखराजसिंह के समय में ही किले के बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी लेकिन किला  बाद  उनके दोनों पुत्रों रायबहादुर लक्ष्मीराज सिंह और कुंवर देवेन्द्रराज सिंह ने निर्माण 1919 में पूर्ण कराया था। गभाना का किला जयपुर शैली पर बना हुआ है ।जयपुर की महारानी कुशल कंवर जो उमरगढ़ की बेटी थी गभाना परिवार को बहुत सम्मान देती थी।ठाकुर लेखराजसिंह का जयपुर बहुत आना -जाना भी रहा था।कुशल कंवर की ननिहाल कौरह-रुस्तमपुर रियासत के जमींदार ठाकुर सुखराम सिंह के यहां थी ।इस बजह से उनका सम्बन्ध गभाना परिवार से भी था।एक बार जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह द्वियीय अपनी महारानी कुशल कंवर के साथ पधारे थे जिनका ठाकुर लेखराज सिंह ने भव्य स्वागत एवं सत्कार किया था । रायबहादुर लक्ष्मीराज सिंह अंग्रेजी परम्परा के दरबारों में सक्रिय भागीदारी करते थे उनके बेटे चेतनराज सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष तथा एम.एल.ए. रहे थे। अलीगढ़ के मानिक चौक में भी राजा गभाना का महल था।

29- कोटला का किला- कोटिला का किला किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण रहा होगा ।सन् 1884 ई0 के गजेटियर में इस किले की रूप रेखा इस प्रकार दी गई है ।खाई 20 फ़ीट चौड़ी तथा 14 फ़ीट गहरी ,ऊंचाई 40 फ़ीट ।भूमि की परिधि 284 फ़ीट उत्तर ,220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व एवं 480 फ़ीट पश्चिम ।अब यह किला जीर्ण शीर्ण अवस्था में देखने में लगता है ।अभी कुछ ढांचा तो विद्यमान है शायद इसमे कोई सरकारी स्कूल चल रहा है ।यहाँ इसका उपरोक्त विवरण इसी उद्देश्य से दिया गया है कि भावी पीढियाँ इसके वास्तविक स्वरूप की कल्पना कर सकें।किले को कब और किसने बनवाया इसका कोई विवरण नही मिल पाया है ।लेकिन सम्भावना यह है कि यह पहले कच्ची गढ़ी होगी जो बाद में कोटला के राजा कुशलपाल सिंह बहादुर ने अपने पुत्र कुँवर गजेन्द्रपाल सिंह के त्रिपुरा राज्य से होने वाले विवाह से कुछ ही समय पूर्व लगभग सन 1920 -22 के मध्य पक्का बनवाया होगा।इस किले में कुछ जयपुर शैली भी नजर आती है ।जयपुर राजपरिवार से इनका नजदीकी सम्बन्ध था। बैसे भी यह परिवार आगरा में बाघफरजाना कोठी  में रहता था।क्षेत्रीय लोगों से पूछने पर यही तथ्य अवगत हुए हैं ।प्रारम्भिक समय में इस रियासत में 55 गांव थे जो बाद में कम होकर रानी महताव कंवर के समय लगभग 42 गांव ही रह गए थे ।

30- अवागढ़ का किला- ठा. विजयसिंह के स्वर्गवासी होने पर उनके पुत्र ठा बख्त सिंह उनके उत्तराधिकारी बने बख़्त  सिंह ने कुछ समय के लिए भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह की सेना में एक सैनिक के रूप में नौकरी की थी । ठा. बख्त सिंह ने भी पिता की तरह क्षेत्रीय पड़ौसी  जमींदारों को कर्ज देने का कार्य जारी रखा   ।उमरगढ़ रियासत के तत्कालीन राव ठाकुर बहादुर सिंह का इनको पूरा सहयोग मिलता था तथा उनसे ही इन्होंने  मीसा नामक गाँव प्राप्त किया था । इसके बाद काफी संख्या में दूसरे ठाकुरों के गांव  बख्त सिंह के हाथों में आ गये थे और इन्होंने उनसे लगान बसूल करने के लिए वहां पर पाए जाने वाले लुटेरे मेवातियों की एक सेना भी बना ली थी। मेवातियों की मदद से बख्त सिंह ने अपने आप को क्षेत्र में स्थापित किया और ये मेवातियों की आर्थिक मदद भी करते थे।  इस प्रकार उन्होंने अपनी जमींदारी में वृद्धि की  और वे इस कार्य में इस सीमा तक  सफल रहे कि शाहआलम (1759-1808 ) के शासन के 37  वें वर्ष तक 53 गांवों का स्वामित्व प्राप्त कर लिया था।और मराठा अधिकारी जनरल पैरोंन ने जिसको फौजी सेवा के उपलक्ष्य में जलेसर की जागीर मिली थी उसने 50 हजार रुपये की वार्षिक मांग के साथ इन गाँवों का सदैव के लिए स्थायी पट्टा कर दिया। इस के अतिरिक्त कुछ और गांवों की जमींदारी भी उनको प्रदान कर दी गयी । ग्वालियर के महादजी  सिधिया ( 1733-1794 ) के समय बख्त सिंह  गांव अवा, वीरनगर, पुन्हेरा, नूह, जिनावली तथा बड़ाभौंडेरा  गांवों की लगभग 2542 बीघा जमीन पर मालगुजारी रहित अधिकार प्राप्त हो गया तथा कुछ जमीन लगभग 337 बीघा  पिलखतरा में  प्राप्त करली ।मराठों की एक सनद के अनुसार बख्तसिंह ने अवा को अपना मुख्य निवास बनाया और यह अवा-मीसा ताल्लुका के नाम से इसकी मान्यता मिल गयी और इसके साथ ही अवा गाँव में एक किला बनाने की आधार शिला रखने की शुरुआत हो गई ।उन दिनों बख्त सिंह की स्थिति एक स्वतंत्र शासक के रूप में थी और वह प्रभावशाली माने जाने लगे ।लोर्डलेक की मदद से बख़्त सिंह के पुत्र हीरा सिंह ने सन 1803 में अवा गांव में एक   कच्चागढ़ बनवायाजो अवागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।यह किला 1मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसमें काफी इमारतें तथा पुराने कुंआ मौजूद हैं।राजा पीताम्बर सिंह एवं  राजा  पृथी सिंह के समय में यह दुर्ग तथा अवागढ़ रियासत चर्म वैभव पर थी।

(ब) भाटी यदुवंशियों के ऐतिहासिक दुर्ग-

1- भटनेर दुर्ग- राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला में स्थित भटनेर का किला घग्घर नदी के पूर्वी तट पर लगभग 52 बीघा भूमि में फैला हुआ है। यह दुर्ग अत्यंत प्राचीन तथा मूलतः मिट्टी से बनाया गया है।बादमें समय -समय पर इसका पुनःनिर्माण होता रहा है। यदुवंशी राजा भाटी (ई.279-295) का राज्य लाहौर के निकट शालिवाहनपुर क्षेत्र में था। वह पश्चिमी भारत के कुषाण शासकों के अधीन रहकर राज्य करता था। उसके पुत्र भूपति भाटी (ई.295-338) ने ई.286 में लाहौर से काफी दूर बहने वाली घघ्घर नदी के पूर्वी तट पर स्थित एक ऊंचे थेड़ पर एक दुर्ग का निर्माण करवाना आरम्भ किया जो आगे चलकर भटनेर दुर्ग के नाम से जाना गया।

भूपत के समय से यादवों की यह शाखा भाटी कहलाने लगी। उसने अपने बनाये हुए दुर्ग को 'भाटीनेर' कहा जो आगे चलकर भटनेर के नाम से विख्यात हुआ। यह विशाल स्थल दुर्ग है। निर्माण के समय चारों ओर से नदियों से सुरक्षित होने के कारण यह, औदुक दुर्ग की श्रेणी में आता था। घने जंगलों से घिरा हुआ होने के कारण यह ऐरण दुर्ग श्रेणी में आता था। दुर्ग को चारों ओर से गहरी खाई से घेरा गया था जिसमें घध्घर का पानी भरा रहता था, इस कारण यह एक पारिख दुर्ग था। चारों ओर परकोटे से घिरा हुआ होने के कारण यह पारिघ दुर्ग भी था।

दुर्ग को घघ्घर के पूर्व में बनाये जाने का कारण यह था कि भारत पर पश्चिम की ओर से विदेशी आक्रमण होते रहते थे। इस प्रकार घघ्घर को प्राकृतिक सुरक्षा रेखा के रूप में काम लिया गया। भटनेर दुर्ग मूलतः मिट्टी से बनाया गया था। बाद में किसी काल में इस दुर्ग को पक्की ईंटों एवं चूने से बनाया गया। भटनेर दुर्ग का कुल क्षेत्रफल 52 बीघा है। दुर्ग में 52 बड़े बुर्ज एवं 52 अथाह जलराशि वाले कुएं बताये जाते ।

ई.295 में गजनी के शासक ने शालिवाहनपुर पर आक्रमण किया तथा राजा भाटी को मारकर उसका राज्य छीन लिया। राजकुमार भूपति, शत्रु के हाथों से बचकर, थार रेगिस्तान के उत्तर-पूर्वी किनारे पर स्थित घघ्घर नदी के जंगलों में चला आया। यहाँ उसने घघ्घर के पूर्वी तट पर स्वयं द्वारा पहले से ही निर्मित दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया। कुछ समय पश्चात् गुप्तों ने भाटियों को भटनेर दुर्ग से बाहर निकाल दिया। इसलिये वे घघ्घर के निकट छोटा गुढ़ा बांधकर रहने लगे। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम (ई.320-35) अथवा समुद्रगुप्त (ई.335-75) की कृपादृष्टि से भाटियों को भटनेर दुर्ग फिर से प्राप्त हुआ।

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भटनेर दुर्ग, मुल्तान-उंच्छ से थोड़ा दक्षिण-पूर्व में सिरसा (सरसुती), हाँसी, एवं दिल्ली जाने वाले मार्ग पर स्थित था। यह राजस्थान के पल्लू, सपादलक्ष (अजमेर एवं सांभर) और अहिच्छत्रपुर (नागौर) तथा पंजाब के सुनाम, अबोहर और लाहौर से दक्षिण के विभिन्न मार्गों से जुड़ा हुआ था। इस कारण भटनेर दुर्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया। इसे राजस्थान की उत्तरी सीमा का प्रहरी भी कहा जाता था।मध्य एशिया के आक्रांता भी दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए यहीनमार्ग अपनाते थे।इस कारण भटनेर पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण होते रहते थे ।

2- तन्नोट दुर्ग- तन्नोट दुर्ग यदुवंशी भाटियों ने बनवाया। ये लोग भटनेर से चलकर तन्नोट आये। मान्यता है कि राव तन्नूजी भाटी ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में तनोट का किला बनवाया। मरुस्थल में आने के बाद से भाटियों का लंगों, वराहों, पंवारों तथा झालों से निरन्तर झगड़ा चलता रहा। जय-पराजय दोनों पक्षों में होती रहती थी किन्तु भाटियों को दबाया नहीं जा सका। राव विजयराज (प्रथम) के समय में सारे शत्रुओं ने मिलकर एक षड्यन्त्र किया और विजयराज के पांच वर्षीय पुत्र देवराज के लिये भटिण्डा के वराह राजा अमराजी की पुत्री हरकंवरी का विवाह प्रस्ताव भिजवाया। विजयराज अपने पुत्र देवराज तथा सात सौ भाटी सरदारों को लेकर भटिण्डा पहुंचा। जब विवाह सम्पन्न हो गया और बारात निश्चिंत होकर सो गई, तब वराह सेना ने सोती हुई बारात पर हमला बोल दिया। राव विजयराज अपने सरदारों सहित वहीं मारा गया। बालक देवराज को उसकी सास ने किसी तरह छिपाकर एक ऊंट पालक (राईका) के साथ भगा दिया। राईका, भाटी राजकुमार देवराज को लेकर तन्नोट आया और एक पुष्करणा ब्राह्मण के घर छोड़ दिया। वराह सेनाओं ने तन्नोट पर भी आक्रमण किया। वृद्ध तन्नूजी भाटी अपने वीर सैनिकों को साथ लेकर किले के बाहर निकला और समंरागण में जूझ मरा। यह तन्नोट का पहला और भाटियों का तीसरा साका था। तनोट दुर्ग भाटियों के हाथ से निकल गया और भाटी पुनः राज्य विहीन हो गये।

3- देवरावर दुर्ग- राय जज्जा भाटी द्वारा 9वीं शताब्दी ईस्वी में लोद्रवा के राजा देवराज की स्मृति में निर्मित यह विशाल दुर्ग अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बहावलपुर जिले में स्थित है। इसकी प्राचीर 30 मीटर ऊंची है तथा 1500 मीटर के घेरे में बनी हुई है। इसके चारों ओर भी जैसलमेर दुर्ग की तरह कमरकोट अथवा घाघराकोट बना हुआ है जिसकी चालीस बुर्जे दूर से ही दिखाई पड़ती हैं। इस दुर्ग का मूल नाम देवरावल है। 18वीं शताब्दी ईस्वी में इसे बहावलपुर के मुस्लिम शासक द्वारा छीन लिया गया। उस समय इस दुर्ग पर शाहोत्रा जाति के लोगों का अधिकार था। इसके चारों ओर का मरुस्थल चोलिस्तान कहलाता है। रख-रखाव के अभाव में यह दुर्ग बहुत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है। यह दुर्ग पाकिस्तान में है किंतु इस दुर्ग के बिना भाटियों के दुर्गों का इतिहास अधूरा है।

4- जैसलमेर का सोनारगढ़- पीले रंग के जैसलमेरी प्रस्तरों से निर्मित एवं एवं बालू रेत पर खड़ा जैसलमेर का सोनारगढ़ दुर्ग मरुस्थल की तेज चमकीली धूप में ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान् भुवन भास्कर ने इस दुर्ग को अपनी कांचन किरणों से बनाकर यहाँ प्रकृति के एकान्त में उतार दिया हो। राव जयशाल द्वारा निर्मित होने के कारण इसे जैसलमेर दुर्ग कहते हैं। पीले रंग के पत्थरों से निर्मित होने के कारण इसे सोनारगढ़ तथा सोनगढ़ भी कहते हैं।

इस दुर्ग के चारों ओर विशाल मरुस्थल फैला हुआ है। इस कारण यह दुर्ग मरुदुर्ग अर्थात् धान्वन दुर्ग को श्रेणी में आता है। यद्यपि यह 250 फुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है किंतु इसे गिरि दुर्ग नहीं कहा जा सकता क्योंकि पहाड़ी की दुर्गमता नगण्य है। चूंकि यह पहाड़ी पर स्थित है इसलिये इसे स्थल दुर्ग भी नहीं कहा जा सकता। यह हर प्रकार से धान्वन दुर्ग है। चारों ओर परकोटे से घिरा हुआ होने के कारण इसे पारिघ दुर्ग श्रेणी में रखा जा सकता है।

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यदुवंशी राजकुमार जयशाल (जैसल भाटी) ने अपने पिता द्वारा राज्याधिकार न दिये जाने पर अपने पैतृक राज्य लोद्रवा पर आक्रमण किया और लोद्रवा की गद्दी पर आसीन अपने भतीजे भोजदेव को मारकर 12 जुलाई 1155 को लोद्रवा से कुछ दूर अपने लिये एक नई राजधानी और एक नये दुर्ग की स्थापना की। उसने यह दुर्ग 250 फुट ऊंची, त्रिकूटाचल नामक त्रिभुजाकार पहाड़ियों पर बनवाना आरम्भ किया। राव जैसल के काल में इस दुर्ग का केवल मुख्य द्वार तथा कुछ अंश ही बन पाये थे। बाद में उसके उत्तराधिकारियों ने इसमें निर्माण करवाये। महारावल जयशाल के पुत्र शालिवाहन (द्वितीय) ने इस दुर्ग के निर्माण में व्बहुत बड़ा योगदान दिया। मुगलों व अंग्रेजों के समय में यही भट्टी जैसलमेर पर शासन कर रहे थे। उन्हें 'उत्तर भड़ किंवाड़' का विरुद प्राप्त था।

5- मारोठ दुर्ग- नागौर जिले में परबतसर के पास स्थित मारोठ का किला मूलतः भाटियों ने बनवाया था। इसे भटनेर का सहाय दुर्ग कहा जा सकता है। ई.610 से 645 तक इस दुर्ग पर भाटी शासक राव सूरसेन ने शासन किया। उसके बाद ई.645 से 655 तक राव रघुराव ने तथा ई. 682 से 729 तक राव उदयराव ने शासन किया। ई.787 के आसपास राव केहर भाटी मारोठ का शासक था। उसने ई.787 में मारोठ से सुदूर दक्षिण पश्चिम में पूर्वी सिंध की नदी घाटी में स्थित तणोट पर अधिकार किया।

उपरोक्त प्रसिद्ध किलों के अलावा भाटियों ने खडाल एवं चोलीस्तान रेगिस्तान में अनेक छोटे-छोटे किन्तु सुदृढ़ किले बनवाए ताकि इनसे उनके विस्तृत क्षेत्र में चरने वाले पशुओं, ऊँटों के टोलों, गायों, भेड़-बकरियों के रेवड़ों एवं उनके चरवाहों को सुरक्षा प्रदान करके उनसे पूँगा (चराई कर) वसूल किया जा सके। इसके अलावा यहाँ से इस क्षेत्र से होकर निकलने वाले व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा निश्चित करके व्यापारियों से मार्गाधिकार के बदले मार्ग-कर लेते थे। ऐसे कुछ किले ये बरसलपुर, मोज़गढ़, फूलड़ा, वल्लर, फज़लीकोट, कोट धुनिया, कोट खैरगढ़, कोट मुरीद, कोट मचकी, नावाकोट, खानगढ़, रुकनपुर, दुणैनवाला किला, कोट मूसाखाँ, फोर्ट बारा, मीरगढ़, जामगढ़ आदि ।

(स) जाधव  यदुवंशी राजवंश के दुर्ग-

1-देवगिरि / दौलतावाद दुर्ग- देवगिरि का यादव कालीन दुर्ग एक त्रिकोण पहाड़ी पर स्थित है। क़िले की ऊँचाई, आधार से 150 फुट है। पहाड़ी समुद्र तल से 2250 फुट ऊँची है। क़िले की बाहरी दीवार का घेरा 2¾ मील है और इस दीवार तथा क़िले के आधार के बीच क़िलाबेदियों की तीन पंक्तियां हैं। प्राचीन देवगिरि नगरी इसी परकोटे के भीतर बसी हुई थी। किन्तु उसके स्थान पर अब केवल एक गांव नजर आता है। क़िले के कुल आठ फाटक हैं। दीवारों पर कहीं-कहीं आज भी पुरानी तोपों के अवशेष पड़े हुए हैं। इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे 'अंधेरी' कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे गढ़डे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के लिए बनाये गये थे। मार्ग के प्रवेश द्वार पर लोहे की बड़ी अंगीठियाँ बनी हैं, जिनमें आक्रमणकारियों को बाहर ही रोकने के लिए आग सुलगा कर धुआं किया जाता था। क़िले की पहाड़ी में कुछ अपूर्ण गुफ़ाएं भी हैं, जो एलोरा की गुफ़ाओं के समकालीन हैं। यादवकालीन इमारतों के अवशेष अब नहीं के बराबर है ,केवल कालिकादेव जिसके मध्य भाग को मलिक कफूर ने मस्जिद में बदल दिया था ,मौजूद है। 

(द) चुडासमा यदुवंशी राजपूतों का ऐतिहासिक दुर्ग जूनागढ़ -

दुर्गों के अवशेषों में जूनागढ़ (ऊपरकोट) दुर्ग काफी प्राचीन लगता है। जूनागढ़ दुर्ग गिरनार पहाड़ी पर है। गिरनार पहाड़ी गुजरात की सबसे ऊंची पहाड़ी है। यहां अशोक कालीन शिलालेख आज भी ज्यों के त्यों है। जूनागढ़ का शाब्दिक अर्थ ही पुराना किला है। जूनागढ़ के आज दो रूप है- एक खूबसूरत शहर और दूसरा प्राचीन किला, जिसमें मंदिरों, गुफाओं, शिलालेखों, पुण्यो की प्रचुरता है। आज का जूनागढ़ ऊपरीकोट (गढ़) का विस्तृत अंश है और इसकी स्थापना सन् 875 में चूड़ासामा यदुवंशी राजपूत वंश के ग्रहारियू  प्रथम ने की थी। इतिहास में जूनागढ़ का अस्तित्व 250 ईसा पूर्व में भी था। क्षेत्र में मौर्य , गुप्त, मैत्रक, छत्रपों,  राजपूतों और मुस्लिम सुल्तानों की सत्ता बदलती रही है। राह खेगण ने सन् 1094 में किल्ले पर आक्रमण कर जीता और पाटण के राजा सिद्धराज जयसिंह की वाग्दाता पत्नी रणकदेवी से विवाह किया।किले में उसके लिए महल बनवाया।सिध्दराज से हुई लड़ाई में खेगण मारा गया। 15 वीं शताब्दी में इस क्षेत्र से राजपूतों की सत्ता सदा के लिए अन्त हो गया और सुल्तान महमूद बेगड़ा और उसके वंशजों के पांव जम गए।

जूनागढ़ अहमदाबाद से 327, राजकोट से 105 और सोमनाथ 92 किलो मीटर की दूरी पर है। गिरनार पहाड़ी का पुराणों में काफी स्तुतिगान है।स्कन्द पुराण के प्रभाष खण्ड  में वर्णित पहाड़ी  के 21 शिखरों में पांच शिखर आज भी महत्वपूर्ण है, इन्हें अम्बामाता , गोरखनाथ, औगढ़, कालिका ,और गुरु दत्तात्रेय शिखर कहा जाता है। जैन धर्म के   22वें तीर्थकर नेमिनाथ का मंदिर भी यही है।

एक हजार मीटर ऊंचाई पर किला यानी ऊपर कोट का फाटक है। कोट में ज्यादातर मंदिर है। इनका स्थापत्य  शिल्प  चालुक्य यूगीन वैभव की याद दिलाता है। इसके अलावा आदिपादि बाव ,वनघन कूप ,चूड़ावल तोपें और जामी मस्जिद है। पनीलम और जामी मस्जिद है। नवधन कूप  और आदिपादि बाव का निर्माण आज के मानक के अनुसार सरल नहीं है। जहिर है कि ऊपरकोट के किले में मीठे पानी के लिए  कितना प्रयत्न किया गया होगा। जामी मस्जिद रणकदेवी का महल था, जिसे सन् 1570 में महमूद बेगड़ा ने मस्जिद में बदल दिया था। 136×103 फुट लम्बे हाल में कुल ग्रेनाईट पत्थरों  के 140 स्तंभ है। महमूद बेगडा ने किले का नाम मुस्तफ़ाबाद रखा था। मध्ययुग में इस क्षेत्र में पुर्तगालियों का प्रभाव बढ़ गया था और उन्हें हटाने के लिए सुल्तान सुलेमानमाह ने 1538 में तुर्की से नीलम और चूडावल दो तोपें मंगवाई थी। ये दो  तोपें आज भी किले में है।

रक्षात्मक बिन्दु से जूनागढ़ किले का कभी अपना सामरिक महत्व रहा होगा। किले में बौद्धकालीन गुफाएं है और प्रियदर्शी अशोक के 14 शिलालेख (257 ई.पू.) इतिहास की अनुपम निधि है। शिला लेख में खुदे शब्द नीति व धर्म विषयक हैं , जिन्हें  4-15 पंक्तियों में लिखा गया है। प्रत्येक पंक्ति में 25 अक्षर है। ऐसे शिलालेख शाहबाज गढ़ी (पेशावर पाकिस्तान), येरागढी (कुर्नूल), जोगुड़ा व धौली (उड़ीसा) में भी मिले है। इससे स्पष्ट  है कि यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य में विशिष्ट स्थान रखता था। इन्हीं लेखों पर छत्रप रुद्रदामन (150 ई) और सम्राट स्कन्दगुप्त (459 ई.) द्वारा पुनर्निमाण का जिक्र है और ये ग्रेनाईट गोलाश्मों पर खुदे है। विभिन्न गुफाओं के तोरण -द्वारों पर नक्काशी और खम्भों पर अलंकरण के काम को देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है।

ऊपरकोट में बौद्ध गुफाओं के अलावा  राजपूती महल, कूप, दामोदर कुण्ड तथा मुसलमान शासकों के शिलालेख है। आसपास गिरनार पहाड़ी पर जैन मंदिरों का समूह, अम्बा माता का प्राचीन मंदिर और अनेक ऐसे रमणीक स्थल है, जिन्हें देखकर पर्यटक अतीत में खो जाता है। अब किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सरंक्षण में है।

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संदर्भ-

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5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी 
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी 
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली  -जिला करौली 
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
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13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र 
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
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45-दक्षिण भारत का राजनीतिक इतिहास लेखक डॉ0 अजय कुमार सिंह ।
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50-दिल्ली सुल्तनत भाग 2 संपादक मोहम्मद हवीव ,खालिक अहमद निजामी ।
51-दकन का प्राचीन इतिहास संपादक जी याजदानी ।
52-विजयनगर -साम्राज्य का इतिहास , भूमिका लेखक-डॉ0 रामप्रसाद त्रिपाठी एवं लेखक -श्री वासुदेव उपाध्याय ।
53-दिल्ली सल्तनत 1206-1526 ,संपादक मोहम्मद हबीव ,खलिक अहमद निजामी
54-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट जैसलमेर गजेटियर


लेखक-  डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन  
गांव- लढोता, सासनी 
जिला- हाथरस, उत्तरप्रदेश 
प्राचार्य- राजकीय कन्या महाविद्यालय, सवाईमाधोपुर, राजस्थान, 322001

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