Happy New Year 2025: गीत- फिर कुछ सपनों का हुआ अंत ....

लो बीत गया फिर एक वर्ष,         फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

Jan 1, 2025 - 03:25
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Happy New Year 2025: गीत- फिर कुछ सपनों का हुआ अंत ....

रचनाकार- कृष्ण कुमार 'कनक'

फिर कुछ सपनों का हुआ अंत 
      
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

यह शूल भरा पथ है विशाल, अगणित हैं हृदयविदारक क्षण।
क्या पता कि किस पर क्या बीती, किसकी जय है किसका है रण।
है कौन कहाॅं किस हालत में,
        किसने पाई नव ऋतु बसंत!
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

हो भला कि जिसने आहें दीं, नव राहों के अन्वेषण को।
सन्यासी ऑंसू तरस गए, मृदु भावों के संप्रेषण को।
अकुलाई ऑंखों ने पाया,
         शबरी का-सा धीरज अनंत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

उसका क्या जिसे न पीर मिली, देखा न कभी जिसने वियोग।
हम आशा दीप लिए कर में, बैठे श्वासों में भर नियोग।
चंदन गंधी झरने का स्वर,
      चित्रित करता कवि कनक-पंत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

जिसकी वाणी में अमृत हो, अधरों पर थिरके मधुशाला।
हो नाम मधुर हर काम मधुर, जग डूबे हो ऐसा प्याला।
उस रस का मैं भी पान करूॅं,
       पीकर आए हों जिसे संत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

राहों की भी अपनी गति है, रति के पति की है अपनी गति।
हॅंस कर कह देना पीड़ा को, चुप हो सह जाना कुमति-सुमति।
इतना भी कहाॅं हमारा बल,
        हम कब विघ्नों के शत्रुहंत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

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आशा है किसी‌ एक दिन तो, उतरेगा इस सरिता में जल।
लौटेगा भटका हुआ पथिक, होगा फिर हर मुश्किल का हल।
आएगा वही कुसुम दल फिर,
        मेरे भावों का हृदय-कंत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।
        
द्युति का आकर्षण लिए हुए, कितने नव पुलक विहान हुए।
ज्योति के पर्व की आभा में, नव-नव नूतन अभियान हुए।
आलोक 'प्राण' को संचित कर,
       दे गया युक्ति को नव दिगंत।
लो बीत गया फिर एक वर्ष,
        फिर कुछ सपनों का हुआ अंत।

     

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