'60 साल में 6.44% बढ़ी मुस्लिमों की आबादी', झारखंड में जनसांख्यिकीय असंतुलन पर बाबूलाल मरांडी का बड़ा बयान

भौगोलिक दृष्टि से झारखंड का संताल परगना क्षेत्र पड़ोसी राज्यों और परोक्ष रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के काफी करीब पड़ता है, जिससे इस क्षेत्र में अवैध प्रवासियों का प्रवेश अपेक्षाकृत आसान माना जाता रहा है। स्थानीय स्तर पर ऐसी लगातार शिकायतें आती रही हैं कि बाहरी क्षे

May 31, 2026 - 11:00
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'60 साल में 6.44% बढ़ी मुस्लिमों की आबादी', झारखंड में जनसांख्यिकीय असंतुलन पर बाबूलाल मरांडी का बड़ा बयान
'60 साल में 6.44% बढ़ी मुस्लिमों की आबादी', झारखंड में जनसांख्यिकीय असंतुलन पर बाबूलाल मरांडी का बड़ा बयान

  • संताल परगना में जनजातीय आबादी घटने और बाहरी तत्वों के प्रभाव को लेकर केंद्र सरकार से एनआरसी लागू करने की पुरजोर मांग
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ को बताया आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती, ऐतिहासिक आंकड़ों का हवाला देकर नीतिगत सुधारों पर दिया जोर

झारखंड में जनसांख्यिकीय बदलाव और घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह गरमा गया है। देश के पूर्वी राज्यों, विशेष रूप से झारखंड के सीमावर्ती और जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में बाहरी लोगों के कथित अवैध प्रवेश को लेकर प्रशासनिक और सामाजिक चिंताएं लगातार गहराती जा रही हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस संवेदनशील विषय पर एक बड़ा बयान जारी करते हुए विस्तृत आंकड़े प्रस्तुत किए हैं और दावा किया है कि पिछले कुछ दशकों में राज्य के एक विशिष्ट हिस्से में आबादी का संतुलन अप्रत्याशित रूप से बदल चुका है। उनका कहना है कि अगर समय रहते इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं ढूंढा गया, तो आने वाले समय में क्षेत्र की मूल सांस्कृतिक पहचान और सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। झारखंड विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने दुमका में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान राज्य की बदलती डेमोग्राफी यानी जनसांख्यिकी को लेकर तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने ऐतिहासिक जनगणना रिपोर्टों का संदर्भ देते हुए कहा कि पिछले साठ वर्षों में राज्य के कई हिस्सों, विशेषकर संताल परगना क्षेत्र में एक समुदाय विशेष की जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि दर्ज की गई है। उनके द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, इस समयावधि में मुस्लिम आबादी का अनुपात लगभग 6.44 प्रतिशत तक बढ़ चुका है, जो सामान्य प्राकृतिक विकास दर के नियमों से बिल्कुल परे दिखाई देता है। इस तरह के अचानक और तीव्र बदलाव के पीछे उन्होंने किसी सामान्य जनसांख्यिकीय कारक को नहीं, बल्कि सीमा पार से होने वाली निरंतर और सुनियोजित घुसपैठ को मुख्य वजह बताया है।

आंकड़ों का और अधिक विश्लेषण करते हुए उन्होंने वर्ष 1951 और 2011 के बीच की जनगणना के तुलनात्मक तथ्यों को जनता के सामने रखा। उनका तर्क है कि आजादी के तत्काल बाद, सन 1951 में संताल परगना प्रमंडल के भीतर जनजातीय समाज की हिस्सेदारी कुल आबादी में लगभग 44.67 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो देश की मूल जनजातीय धरोहर को प्रदर्शित करती थी। परंतु, वर्ष 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों तक आते-आते यह जनजातीय हिस्सेदारी भारी गिरावट के साथ मात्र 28.11 प्रतिशत पर सिमट कर रह गई। इसके ठीक विपरीत, इसी भौगोलिक क्षेत्र में वर्ष 1951 के दौरान मुस्लिम आबादी का प्रतिशत जो केवल 9.44 था, वह बढ़कर 22.73 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय सामाजिक संरचना पूरी तरह बदल चुकी है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने केंद्र सरकार को आगाह किया है कि इस प्रकार का अबाधित जनसंख्या परिवर्तन देश की संप्रभुता और कानून-व्यवस्था के लिए भविष्य में अत्यंत आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। उन्होंने पुरजोर शब्दों में मांग की है कि केंद्र सरकार को बिना किसी राजनीतिक संकोच के झारखंड में राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी को तत्काल प्रभाव से लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। इस प्रक्रिया के माध्यम से वैध नागरिकों और अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की पहचान की जा सकेगी, जिससे स्थानीय शासन को सुरक्षा और विकास योजनाओं को सही तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी। उनका स्पष्ट मत है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण ही सुदूर ग्रामीण और सीमावर्ती अंचलों में सरकारी तंत्र घुसपैठियों की अवैध गतिविधियों और पहचान पत्र बनाने के खेल को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

भौगोलिक दृष्टि से झारखंड का संताल परगना क्षेत्र पड़ोसी राज्यों और परोक्ष रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के काफी करीब पड़ता है, जिससे इस क्षेत्र में अवैध प्रवासियों का प्रवेश अपेक्षाकृत आसान माना जाता रहा है। स्थानीय स्तर पर ऐसी लगातार शिकायतें आती रही हैं कि बाहरी क्षेत्रों से आने वाले लोग स्थानीय जनजातीय महिलाओं से विवाह करके या फर्जी दस्तावेजों के सहारे जमीनों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त कर रहे हैं। इस प्रक्रिया के कारण न केवल छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) जैसे कड़े भूमि संरक्षण कानूनों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि मूल आदिवासियों के हक-अधिकार भी धीरे-धीरे छिनते जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इस भूमि विवाद और सामाजिक बदलाव के कारण कई क्षेत्रों में आंतरिक तनाव की स्थितियां भी समय-समय पर पैदा होती रही हैं। आजादी के बाद से अब तक के आधिकारिक जनसंख्या रिकॉर्ड का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए, तो संताल परगना प्रमंडल के विभिन्न जिलों में मूल निवासी आदिवासियों की संख्यात्मक गिरावट और अन्य समुदायों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। भूमि अधिकारों और रोजगार के अवसरों पर पड़ने वाले इस प्रत्यक्ष प्रभाव को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर इस डेमोग्राफिक शिफ्ट की गहन पड़ताल की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच वैचारिक मतभेद भी खुलकर सामने आ रहे हैं। जहां एक ओर विपक्ष इस पूरे मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था और मूल निवासियों के अस्तित्व की लड़ाई से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्तापक्ष के कुछ संगठनों का मानना है कि जनसंख्या के इस उतार-चढ़ाव के पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं। इन कारणों में आजीविका की तलाश में जनजातीय परिवारों का दूसरे राज्यों में बड़े पैमाने पर होने वाला पलायन और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य व शिक्षा के अभाव के चलते जन्म दर में आने वाले अंतर जैसी व्यावहारिक बातें शामिल हैं। इसके बावजूद, सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बरती जाने वाली चौकसी और अवैध दस्तावेजों के निर्माण पर रोक लगाने की मांग को लेकर सभी पक्ष सैद्धांतिक रूप से सहमत नजर आते हैं।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पहचान पत्रों जैसे आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड के सत्यापन की प्रक्रिया को और अधिक कड़ा किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सुरक्षा अधिकारियों का अनौपचारिक रूप से मानना है कि तकनीक के दुरुपयोग के कारण फर्जी दस्तावेजों को तैयार करना बेहद आसान हो गया है, जिसका फायदा उठाकर बाहरी लोग स्थानीय व्यवस्था में अपनी पैठ बना लेते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर विशेष जांच अभियान भी चलाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यापक और ठोस कानूनी कार्रवाई के बिना इस जटिल समस्या का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि अब इस पूरे विषय को लेकर नीतिगत स्तर पर एक कड़े कानून और केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग लगातार जोर पकड़ती जा रही है।

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