Jharkhand High Court News: विभागीय जांच में बरी SI को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने दिया इंस्पेक्टर पद पर प्रमोशन का आदेश
Jharkhand High Court News: झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के सब-इंस्पेक्टर को बड़ी राहत देते हुए 8 सप्ताह में वर्ष 2018 से प्रभावी मानते हुए इंस्पेक्टर बनाने का आदेश दिया है।
- Jharkhand Police Promotion: जूनियर बन गए सीनियर, अब हाईकोर्ट के आदेश से वर्ष 2018 से इंस्पेक्टर बनेंगे सब-इंस्पेक्टर
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झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य पुलिस विभाग में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर (SI) के पक्ष में बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिसकर्मी को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि उन्हें अगले आठ सप्ताह के भीतर इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति प्रदान की जाए। जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने साफ किया कि यह पदोन्नति वर्ष 2018 से ही प्रभावी मानी जाएगी। यह आदेश तब आया है जब याचिकाकर्ता सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ चल रहे सभी छह विभागीय मामलों (Departmental Cases) में उन्हें पूरी तरह निर्दोष पाते हुए बरी कर दिया गया। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय कार्रवाई के कारण प्रमोशन से वंचित रखा जाता है और बाद में वह बेदाग साबित होता है, तो वह अपने जूनियर्स के समान तिथि से ही वित्तीय और पद संबंधी लाभ पाने का कानूनी अधिकारी है।
यह पूरा मामला एक पुलिस अधिकारी के सेवा लाभ और न्याय संगत अधिकार से जुड़ा हुआ है। झारखंड पुलिस विभाग के एक सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ विभिन्न कारणों से कुल छह विभागीय कार्रवाइयां और जांचें लंबित थीं। इस वजह से जब साल 2018 में उनके साथी और कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों को सब-इंस्पेक्टर से प्रमोट करके इंस्पेक्टर बना दिया गया, तब याचिकाकर्ता का प्रमोशन रोक दिया गया था। बाद में जब वे विभागीय जांच के सभी आरोपों से पूरी तरह बरी हो गए, तो उन्होंने अपने पुराने प्रमोशन के हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस पर उच्च न्यायालय ने अब मुहर लगा दी है।
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी लंबे समय से पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उनके सेवाकाल के दौरान अलग-अलग समय पर उनके खिलाफ छह विभागीय केस दर्ज किए गए थे। प्रशासनिक नियमों के तहत जब तक किसी कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई चलती है, तब तक उनकी पदोन्नति की प्रक्रिया को 'सीलबंद लिफाफे' (Sealed Cover Procedure) में रखा जाता है या रोक दिया जाता है। वर्ष 2018 में जब राज्य सरकार और पुलिस स्थापना बोर्ड ने बड़े पैमाने पर उप-निरीक्षकों को निरीक्षक के पद पर पदोन्नत किया, तब इस अधिकारी का नाम सूची से बाहर रहा, जबकि उनके बाद सेवा में आए जूनियर अधिकारियों को इंस्पेक्टर का रैंक मिल गया।
विभागीय स्तर पर लंबी चली जांच प्रक्रियाओं के बाद अंततः याचिकाकर्ता को सभी छह मामलों में बेदाग पाया गया और विभाग ने उन्हें बरी कर दिया। बरी होने के बाद उन्होंने प्रशासनिक स्तर पर अपनी पदोन्नति को 2018 से लागू करने का आग्रह किया, लेकिन समय पर राहत न मिलने के कारण उन्हें झारखंड हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में इस मामले की विस्तृत सुनवाई हुई, जहां याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जब कर्मचारी का कोई दोष ही नहीं था और वह बरी हो चुका है, तो उसे उसके सेवा लाभों से वंचित रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने इन दलीलों को सही माना और राज्य सरकार को आठ सप्ताह की समय सीमा के भीतर आदेश का पालन करने की हिदायत दी।
हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद पुलिस महकमे के उन कर्मचारियों और अधिकारियों में खुशी की लहर है जो अक्सर लंबी चलने वाली विभागीय जांचों के कारण समय पर प्रमोशन नहीं पा पाते हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में इस तरह के अन्य प्रशासनिक विवादों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा। हालांकि, इस आदेश पर राज्य सरकार या गृह विभाग के आला अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान या समीक्षा याचिका (Review Petition) दायर करने संबंधी टिप्पणी सामने नहीं आई है, लेकिन कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए विभाग को तय समय सीमा के भीतर कागजी कार्रवाई शुरू करनी होगी।
इस फैसले का असर केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका बड़ा प्रभाव झारखंड के सेवा कानून (Service Jurisprudence) और प्रशासनिक कार्यशैली पर पड़ेगा। अदालत ने अपने आदेश में जो सबसे बड़ी और अहम टिप्पणी की है, वह यह है कि "यदि किसी कर्मचारी की पदोन्नति सिर्फ विभागीय कार्रवाई के कारण रोकी गई हो और बाद में वह सभी आरोपों से दोषमुक्त हो जाता है, तो उसे उसी तारीख से पदोन्नति का लाभ मिलेगा, जिस दिन उसके जूनियर अधिकारियों को मिला था।" इस टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि प्रशासनिक देरी या झूठे आरोपों की वजह से किसी भी सरकारी सेवक के करियर को पीछे नहीं धकेला जा सकता। इससे विभागों में लंबित जांचों को तेजी से निपटाने का दबाव भी बढ़ेगा
हाई कोर्ट द्वारा तय की गई आठ सप्ताह (लगभग दो महीने) की समय सीमा के भीतर झारखंड सरकार और पुलिस महानिदेशक (DGP) कार्यालय को इस संबंध में अधिसूचना जारी करनी होगी। याचिकाकर्ता को न केवल इंस्पेक्टर का पद मिलेगा, बल्कि उन्हें वर्ष 2018 से लेकर अब तक के पदोन्नति के फलस्वरुप बनने वाले काल्पनिक वेतन निर्धारण (Notional Fixation) और अन्य सेवा वरिष्ठता (Seniority) का लाभ भी देय होगा। यदि सरकार इस अवधि में आदेश का पालन नहीं करती है, तो याचिकाकर्ता के पास अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का वाद दायर करने का विकल्प खुला रहेगा।
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