Saharanpur : मैक्स अस्पताल के डॉक्टरों ने जटिल सर्जरी कर निकाला टेनिस बॉल जितना बड़ा ब्रेन ट्यूमर, मरीज को वापस मिली चलने-फिरने की शक्ति
सहारनपुर की रहने वाली पीड़िता मधुबाला को शुरुआत में अपने बाएं हाथ और पैर में अत्यधिक कमजोरी का अहसास होने लगा था। इस शारीरिक अक्षमता की वजह से उन्हें सामान्य रूप से चलने और घर के छोटे-मोटे कामकाज निपटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। वक्त गुजरने के
चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से एक महिला को नया जीवन मिला है। मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, पटपड़गंज के न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉक्टरों ने शरीर के बाएं हिस्से में बढ़ती कमजोरी से परेशान पचपन वर्षीय महिला का अत्यंत जटिल ब्रेन ट्यूमर ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न किया। इस सफल सर्जरी के बाद पीड़िता सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं और उनकी शारीरिक गतिविधियों में बहुत तेजी से सुधार देखा जा रहा है। पीड़िता पिछले कई महीनों से गंभीर तंत्रिका संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं, जिसके कारण उनका दैनिक जीवन और आत्मनिर्भरता पूरी तरह प्रभावित हो चुकी थी। सही समय पर सटीक जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में हुई सर्जरी के बाद उनकी सेहत में उल्लेखनीय सुधार हुआ और ऑपरेशन के महज तीन दिन बाद ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
सहारनपुर की रहने वाली पीड़िता मधुबाला को शुरुआत में अपने बाएं हाथ और पैर में अत्यधिक कमजोरी का अहसास होने लगा था। इस शारीरिक अक्षमता की वजह से उन्हें सामान्य रूप से चलने और घर के छोटे-मोटे कामकाज निपटाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। वक्त गुजरने के साथ-साथ उनकी यह परेशानी और अधिक गंभीर होती चली गई। चलते समय उनका पैर जमीन पर घिसटने लगा और हाथ की पकड़ कमजोर होने से चीजें बार-बार नीचे गिरने लगीं। स्थिति इतनी चिंताजनक हो गई कि उनके लिए घर के भीतर कदम रखना भी दूभर हो गया। उनके परिजनों ने स्थानीय स्तर पर और आसपास के कई चिकित्सा केंद्रों में डॉक्टरों से संपर्क किया, जहाँ उन्हें मस्तिष्क की एमआरआई कराने का परामर्श दिया गया। इस जांच के बाद पता चला कि दिमाग के दाहिने हिस्से में एक बहुत बड़ा ट्यूमर विकसित हो चुका है, जो शरीर के बाएं हिस्से की गतिविधियों को संचालित करने वाले मुख्य केंद्र पर लगातार दबाव बना रहा था। इसके बाद उन्हें बेहतर इलाज की उम्मीद में दिल्ली के पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्पताल लाया गया।
मरीज की एमआरआई रिपोर्ट और उनकी तंत्रिका तंत्र की गंभीर स्थिति को देखने के बाद अस्पताल के न्यूरो एवं स्पाइनल सर्जरी विभाग की विशेषज्ञ टीम ने बिना समय गंवाए तुरंत ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। यह बेहद संवेदनशील और पेचीदा ऑपरेशन न्यूरो सर्जरी विभाग के मुख्य निदेशक डॉक्टर अमिताभ गोयल और उनकी अनुभवी टीम द्वारा उन्नत माइक्रोसर्जिकल तकनीक के माध्यम से सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। डॉक्टरों की सूझबूझ और आधुनिक उपकरणों की मदद से यह जटिल सर्जरी बिना किसी व्यवधान या विपरीत प्रभाव के पूरी हुई और ट्यूमर को पूरी तरह सुरक्षित तरीके से मस्तिष्क से बाहर निकाल दिया गया।
इस सफल चिकित्सा प्रक्रिया के संबंध में जानकारी देते हुए डॉक्टर अमिताभ गोयल ने बताया कि मस्तिष्क के ट्यूमर के शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य और हल्के संकेतों के रूप में सामने आते हैं। इनमें हाथ-पैरों में अचानक कमजोरी महसूस होना, चलते वक्त शारीरिक संतुलन का बिगड़ना, अंगों के आपसी तालमेल में कमी आना या हाथों से वस्तुओं का बार-बार छूट जाना शामिल है। अधिकांश लोग इन शुरुआती शारीरिक संकेतों को सामान्य थकान या कमजोरी समझकर अनदेखा कर देते हैं, जिससे समय के साथ स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है और मरीज की जीवनशैली पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि इस मामले में पीड़िता के मस्तिष्क के भीतर करीब आठ सेंटीमीटर का ट्यूमर पनप चुका था, जिसका आकार लगभग एक टेनिस बॉल के बराबर था। यह बड़ा ट्यूमर शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सों को दबा रहा था, जिससे लकवे जैसी स्थिति बन रही थी। ऐसी स्थिति में सही समय पर की गई जांच और बीमारी की सटीक पहचान ने सर्जरी की रूपरेखा तैयार करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। आज के दौर की आधुनिक न्यूरोसर्जिकल तकनीकों और सटीक योजना के बल पर ऐसे विशाल ट्यूमर को भी पूरी तरह सुरक्षित ढंग से हटाना संभव हो गया है।
ऑपरेशन की प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद से ही पीड़िता के हाथ-पैर की कार्यप्रणाली और उनके चलने-फिरने की क्षमता में चमत्कारिक सुधार दर्ज किया गया। अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी स्थिति पूरी तरह स्थिर और नियंत्रण में बनी रही, जिसे देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें ऑपरेशन के तीसरे दिन ही घर जाने की अनुमति दे दी। अब उनके शरीर की ताकत धीरे-धीरे वापस आ रही है और डॉक्टरों को उम्मीद है कि आने वाले कुछ ही हफ्तों में वे पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने रोजमर्रा के घरेलू कार्यों और सामाजिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग ले सकेंगी।
डॉक्टरों का मानना है कि इस तरह की न्यूरोसर्जरी में सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि ट्यूमर को पूरी तरह निकालते समय दिमाग के आसपास की नसों और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों को कोई नुकसान न पहुंचे, ताकि मरीज की सोचने, समझने और हिलने-डुलने की क्षमता अक्षुण्ण रहे। हर मरीज की शारीरिक बनावट, ट्यूमर की स्थिति, उसके आकार और मस्तिष्क की आंतरिक संरचना पर पड़ने वाले असर के मुताबिक डॉक्टरों को बिल्कुल अलग और विशेष रणनीति तैयार करनी होती है। इस विशिष्ट मामले में सफल ऑपरेशन के जरिए दिमाग के मोटर एरिया पर बना भारी दबाव पूरी तरह समाप्त हो गया, जिससे पीड़िता के अंगों का तालमेल वापस सुधरने लगा। सर्जरी के बाद डॉक्टरों की देखरेख में दी जाने वाली शुरुआती फिजियोथेरेपी और कसरत भी मरीज को दोबारा पैरों पर खड़ा करने में मददगार साबित होती है। चिकित्सा क्षेत्र में हुए इन नए अनुसंधानों और उन्नत तकनीकों की बदौलत अब जटिल से जटिल न्यूरोसर्जरी के बाद भी मरीज बहुत कम समय में ठीक होकर अपने सामान्य जीवन में वापस लौट रहे हैं।
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