Special Article Darul Uloom: 30 मई- दारुल उलूम देवबंद स्थापना दिवस।
वर्तमान मे अंतराष्ट्रीय स्तर पर साम्प्रदायिक ताक़तों के निशाने पर अगर कोई संस्था है तो विश्व विख्यात इस्लाम धर्म की अग्रणी
देवबंद: वर्तमान मे अंतराष्ट्रीय स्तर पर साम्प्रदायिक ताक़तों के निशाने पर अगर कोई संस्था है तो विश्व विख्यात इस्लाम धर्म की अग्रणी और एशिया की नंबर एक संस्था दारुल उलूम देवबंद है.... जिसकी स्थापना दिवस 30 मई 1866 है।लगभग 160 वर्ष पूर्ण कर चुकी इस संस्था की देवबंद मे स्थापना सन 1857 मे जंग की नाकामी और अंग्रेज़ों के बढ़ते वर्चस्व के बाद हुई। यह वो समय था जब अंग्रेज़ हुकूमत ने दिल्ली, अम्बाला और अन्य स्थानों पर हज़ारों मदरसों, मस्जिदों को शहीद कर दिया था। उनकी आर्थिक सहायता पर पाबंदी लगा दी थी। यह मंज़र ठीक आप 2026 मे भी देख सकते हैं। जहाँ आज़ाद भारत मे हज़ारों मदरसों, मस्जिदों और मज़ारों को शहीद किया जा चुका है। मदरसों की आर्थिक सहायता और इमामों के वेतन बंद किया जा चुका हैं ।
ऐसे समय मे मौलाना ज़ुल्फ़ेकार अली, मौलवी मेहताब अली और मौलवी मेहताब ने हाज़ी सय्यद आबिद हुसैन साहब के सररक्षण मे एक ऐसे मदरसे की स्थापना का निर्णय लिया जो ईसाई मिशनरी के साथ -साथ अंग्रेजी साम्राज्य को भी समाप्त किया जा सके। इसके लिए एक रुमाल बिछाकर चंदा शुरू किया गया। पहला चंदा तीस रूपये हाजी सय्यद आबिद हुसैन ने दिया और शहर के लोगों के बड़े आर्थिक सहयोग से 30 मई 1866 को पहले उस्ताज़ मुल्ला मेहमूद ने शागिर्द मेहमूद को छत्ता मस्जिद मे अनार के पेड़ के नीचे पहला सबक़ दिया। पहला शागिर्द बड़े होकर शैख़ उल हिंद मौलाना मेहमूद हसन देवबंदी कहलाए जिन्होंने स्वतन्त्रता आंदोलन मे अपने शागिर्दों के साथअंग्रेज़ों के विरुद्ध "रेशमी रुमाल आंदोलन" चलाया। लम्बी अवधि तक अपने शागिर्दों के साथ माल्टा की जेल मे रहे, वापसी पर महात्मा गाँधी के साथ मुंबई मे अंग्रेज़ों से लड़ने का प्रण एक सार्वजनिक सभा मे लिया ।
दारुल उलूम देवबंद पर पूर्व मे हज़ारों पुस्तकें, लाखों लेख, शोध, पत्र,यात्रा वर्णन, सेमिनार हो चुके हैं, स्वयं दारुल उलूम भी वर्ष 1980 मे स्थापना की शताब्दी समारोह मना चुका है, जिसमे मुख्य अतिथि पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गाँधी थीं। इसलिए यहां पर कुछ प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है।
छत्ता मस्जिद के बाद दारुल उलूम मे छात्र संख्या बढ़ने पर नगर की जामा मस्जिद और कुछ निजी घरों मेमदरसा संचालित हुआ। जिसमे प्रमुख क़ाज़ी मस्जिद के सामने मरहूम मुंशी लईक़ साहब के मकान का ज़िक्र किताबों मे आता है।- आरम्भ के नौ वर्षों मे दारुल उलूम का निजी भवन नहीं था। 1875 मे निजी भवन का विचार आया और मोहल्ला दीवान के निकट ज़मीन ली गई। 1876 मे पहली इमारत नोदरे की तामीर पूर्ण हुई।
- आरम्भ मे मुस्लिमों सहित हिंदू भाईयों ने भी धन और पुस्तकें देकर सहायता की। इनमे मुंशी नवल किशोर (लखनऊ ) राव अमर सिंह (बुढ़ाना, मुज़फ्फरनगर )और डॉक्टर जी. डब्लू लेटर (रजिस्ट्रार पंजाब यूनिवर्सिटी )के नाम प्रमुख हैं।
- सन 1905 मे सर जेम्स डगस लेटूश के बाद सन 1915 मे सर जेम्स मस्टन ने अंग्रेज़ सरकार की ओर से दारुल उलूम का भ्रमण किया।
- सन 1910 मे दारुल उलूम ने पहली उर्दू मासिक पत्रिका "अल क़ासिम "का प्रकाशन शुरू किया। उस समय यह अलीगढ़ से प्रिंट होकर आती थी।
- 31मई 1938 को अंग्रेज़ सरकार के विशेष दूत हाफ़िज़ मोहम्मद इब्राहिम दारुल उलूम आए। उस समय दारुल उलूम से स्टेशन तक सड़क निर्माण का प्रस्ताव उनके समक्ष रखा गया।
- सन 1941 मे दारुल उलूम ने उर्दू मासिक पत्रिका "दारुल उलूम "का प्रकाशन आरम्भ किया जो आज आज भी प्रकाशित हो रही है। 80 के दशक मे अरबी समाचार पत्र "अददाई "और एक उर्दू पाक्षिक पत्रिका........ का प्रकाशन आरम्भ किया।
- 2 दिसंबर 1951 को आचार्य विनोबा भावे ने दारुल उलूम देखकर कहा था "यह अपने तर्ज़ की अनोखी पाठशाला है "।
- 13 जुलाई 1957 को पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर राजिंन्द्र प्रसाद दारुल उलूम पधारे थे।
- आज़ाद भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाददारुल उलूम देवबंद आए थेऔर सम्बोधित किया था ।
- 25 फ़रवरी 1958 को शाहे अफ़ग़ानिस्तान मोहम्मद ज़ाहिर शाह दारुल उलूम आए थे।
- 23 मार्च 1965 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल विश्वनाथ दास दारुल उलूम आए थे।
- 60 के दशक मे केंद्र सरकार ने "हिंदुस्तानी मुसलमानों के तालीमी इदारे "के शीर्षक से एक दस्तावेज़ प्रकाशित की थी। जिसमे दारुल उलूम का विशेष उल्लेख था।
- 1973 के अंत मे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल अकबर अली दारुल उलूम देखने आए थे।
- 13 अप्रैल 1977 को पूर्व राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद मरहूम दारुल उलूम आए थे। इस अवसर पर उन्होंने दारुल उलूम के साबिक़ शैख़ उल हदीस हज़रत अल्लामा सय्यद अनवर शाह कश्मीरी रह. की क़ब्र पर फातेहा पढ़ी थी।
- मोहतमिम के रूप मे दारुल उलूम की सबसे लंबी सेवा और उन्नति पूर्व मोहतमिम क़ारी मोहम्मद तैयब रह. ने 48 वर्षों तक की।
- 22-23 मार्च 1982 को केंद्र और प्रदेश की कांग्रेस सरकार के खुले सहयोग से पूर्व सांसद मौलाना असद मदनी रह. और उनके सहयोगियों ने रात के समय मदनी गेट से जंगला तोड़कर कब्ज़ा कर लिया था। क़ाबिज़ ग्रुप का नेतृत्व रायफल हाथ मे लेकर मौलाना अरशद मदनी कर रहे थे। इस कब्ज़े मे प्रत्येक स्तर पर सरकार और प्रशासन का खुला सहयोग था।
- उस समय 82 कर्मचारी क़ारी मोहम्मद तैयब रह. के साथ बाहर आए थे, जो लम्बे समय तक आर्थिक तंगी से झूजे ।
- दारुल उलूम देवबंद पर कब्ज़े का एक और दो बेंकों के धन फ्रीज़ का मुक़दमा सन 2005 तक सहारनपुर और देवबंद की अदालत मे चला। बाद मे मदनी परिवार और हज़रत क़ारी मोहम्मद तैयब रह. के पुत्र हज़रत मौलाना सालिम क़ासमी रह.पूर्व मोहतमिम वक़्फ़ दारुल उलूम देवबंद के बीच गोपनीय सुलाह हो गई थी। सुलेह नामे की कोई तहरीर गत 21 वर्षों मे सार्वजनिक नहीं की गई,के किस आधार पर मुक़दमे वापस लिए गए हैं।
- दारुल उलूम देवबंद वर्तमान मे निःशुल्क आवासीय शिक्षा का भारत सबसे बड़ा केंद्र है। आज जिसका बजट 35 से 40 करोड़ रुपये है। निःशुल्क आवास, शिक्षा, भोजन, पुस्तकों और चिकित्सा की विशेष सुविधा है जो प्रत्येक वर्ष 3000 के आस -पास छात्रों को मिलती है। गेहूं की फसल के समय मुस्लिम किसान गेहूं से संस्था का सहयोग करते हैं।
- दारुल उलूम प्रथम दिन से अवामी चंदे पर चलता है। इसके बायलाज़ मे किसी भी सरकार के सहयोग को प्रतिबंधित कर रक्खा है।
- दारुल उलूम देवबंद ने गत डेढ़ सदी मे इस्लाम धर्म के प्रचार -प्रसार मे प्रमुख भूमिका निभाई।क़ुरआन शरीफ, अहादीस (हज़रत मोहम्मद साहब के प्रवचन ) व अन्य सभी विषयों पर धार्मिक पुस्तकों के उर्दू एवं अन्य भाषाओं मे अनुवाद से बड़ी संख्या मे लोगों को इस्लाम धर्म समझने मे आसानी हुई। आज भारत ही नहीं पूरे विश्व मे लाखों मदरसे दारुल उलूम की एक तरह से वैचारिक शाखाएं हैं। जहां इस्लाम धर्म की शिक्षा दी जाती है। जिस कारण गत 150 वर्षों मे पूरी दुनिया मे इस्लाम धर्म तेज़ी से फेला।
- दारुल उलूम देवबंद ने सबसे महत्वपूर्ण योगदान स्वतन्त्रता आंदोलन मे दिया, पाकिस्तान बटवारे का विरोध किया, गोहत्या ना करने पर फतवा दिया, आतंकवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन देवबंद मे आयोजित किया।
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