LPG सप्लाई पर युद्ध का साया: घरेलू गैस सिलेंडर में 14.2 किलो के बजाय मिल सकती है केवल 10 किलो गैस

इस संभावित बदलाव का असर सीधे तौर पर देश के मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा। कम गैस मिलने का मतलब है कि एक सिलेंडर कम दिनों तक चलेगा, जिससे गृहिणियों को अपनी रसोई की योजना दोबारा बनानी होगी। हालांकि, जानकारों का कहना

Mar 23, 2026 - 12:03
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LPG सप्लाई पर युद्ध का साया: घरेलू गैस सिलेंडर में 14.2 किलो के बजाय मिल सकती है केवल 10 किलो गैस
LPG सप्लाई पर युद्ध का साया: घरेलू गैस सिलेंडर में 14.2 किलो के बजाय मिल सकती है केवल 10 किलो गैस

  • ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की 'राशनिंग' तैयारी; देश में घटते गैस भंडार और ईरान संकट के बीच बड़ा फैसला संभव
  • ईंधन संकट से निपटने के लिए नया फॉर्मूला: सीमित स्टॉक को ज्यादा उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए गैस की मात्रा घटाने पर विचार

मध्य पूर्व में जारी तनाव और विशेष रूप से ईरान से जुड़े युद्ध की स्थितियों ने वैश्विक कच्चे तेल और LPG की आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत अपनी LPG जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, और वर्तमान में समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के कारण जहाजों का आवागमन बाधित हुआ है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के आंतरिक आकलन के अनुसार, यदि सप्लाई इसी तरह बाधित रही, तो देश का मौजूदा LPG भंडार उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से समाप्त हो सकता है। इसी आपातकालीन स्थिति को देखते हुए कंपनियों ने गैस की 'राशनिंग' का विकल्प चुना है। 14.2 किलो के मानक सिलेंडर में 10 किलो गैस भरने का प्रस्ताव इसलिए लाया गया है ताकि उपलब्ध कुल गैस को अधिक संख्या में परिवारों तक वितरित किया जा सके और बाजार में भारी कमी की स्थिति पैदा न हो।

इंडस्ट्री से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यह कदम एक अल्पकालिक राहत की तरह कार्य करेगा। जब प्रति सिलेंडर गैस की मात्रा कम होगी, तो कुल उपलब्ध स्टॉक से लगभग 30 से 40 प्रतिशत अधिक सिलेंडर तैयार किए जा सकेंगे। यह रणनीति उन लाखों उपभोक्ताओं के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है जो पूरी तरह से घरेलू गैस पर निर्भर हैं और स्टॉक खत्म होने की स्थिति में ब्लैक मार्केटिंग का शिकार हो सकते हैं। कंपनियों का तर्क है कि खाली हाथ बैठने से बेहतर है कि कम मात्रा में ही सही, लेकिन गैस की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। इस योजना के तकनीकी पहलुओं पर काम किया जा रहा है ताकि मौजूदा सिलेंडरों और रेगुलेटर सिस्टम में बिना किसी बदलाव के 10 किलो गैस की डिलीवरी संभव हो सके।

युद्ध की स्थितियों ने न केवल माल ढुलाई को महंगा किया है, बल्कि बीमा प्रीमियम और रूट बदलने के कारण आने वाली लागत में भी भारी वृद्धि की है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि LPG का आयात मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों से होता है जहाँ फिलहाल सैन्य गतिविधियां चरम पर हैं। भंडार में तेजी से आती गिरावट को देखते हुए सरकार और तेल कंपनियां एक ऐसी प्रणाली विकसित करना चाहती हैं जिससे पैनिक बुकिंग (घबराहट में अधिक सिलेंडर बुक करना) को रोका जा सके। 10 किलो गैस की आपूर्ति शुरू होने से उपभोक्ताओं को रिफिल के लिए जल्दी आवेदन करना होगा, लेकिन इससे बाजार में गैस की उपलब्धता बनी रहेगी और किसी एक वर्ग द्वारा स्टॉक जमा करने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में LPG की कीमतों में पिछले दो हफ्तों में 15 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह राशनिंग लागू होती है, तो सिलेंडर की कीमतों को भी गैस की कम मात्रा के अनुपात में समायोजित करना होगा। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि डिलीवरी चार्ज और अन्य टैक्सों में उपभोक्ताओं को कितनी राहत मिलेगी, लेकिन मुख्य प्राथमिकता फिलहाल केवल उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

इस संभावित बदलाव का असर सीधे तौर पर देश के मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा। कम गैस मिलने का मतलब है कि एक सिलेंडर कम दिनों तक चलेगा, जिससे गृहिणियों को अपनी रसोई की योजना दोबारा बनानी होगी। हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह स्थिति 'नो गैस' (गैस न होना) की स्थिति से कहीं बेहतर है। कंपनियां इस बात पर भी विचार कर रही हैं कि क्या इस विशेष परिस्थिति के लिए नए पारदर्शी कंपोजिट सिलेंडर का अधिक उपयोग किया जा सकता है, जिससे उपभोक्ताओं को गैस की सटीक मात्रा का पता चल सके। फिलहाल, इस पूरी योजना को एक 'कंटीन्जेंसी प्लान' (आपातकालीन योजना) के रूप में देखा जा रहा है जिसे स्थिति और बिगड़ने पर तुरंत लागू किया जा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा के विशेषज्ञों ने इस स्थिति को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी माना है। भारत की बढ़ती आबादी और उज्ज्वला जैसी योजनाओं के कारण LPG की मांग में लगातार इजाफा हुआ है, लेकिन घरेलू उत्पादन उस अनुपात में नहीं बढ़ा है। ईरान संकट ने भारत की इस कमजोरी को फिर से सतह पर ला दिया है। यदि 10 किलो गैस वाला फॉर्मूला लागू होता है, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार होगा जब युद्ध के कारण घरेलू ईंधन की मात्रा में इस तरह की कटौती की जाएगी। सरकार अन्य देशों से वैकल्पिक सप्लाई चैन बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन तत्काल समाधान के रूप में राशनिंग ही सबसे प्रभावी रास्ता दिखाई दे रहा है।

कंपनियों के अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस बदलाव के दौरान सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। 14.2 किलो की क्षमता वाले सिलेंडरों में 10 किलो गैस भरना तकनीकी रूप से सुरक्षित है, क्योंकि दबाव का स्तर मानक सीमा के भीतर ही रहेगा। वितरण नेटवर्क को भी इसके लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं ताकि जैसे ही अंतिम निर्णय हो, सिलेंडरों की नई फिलिंग शुरू की जा सके। उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए भी एक विशेष अभियान की रूपरेखा तैयार की गई है, जिससे उन्हें यह समझाया जा सके कि यह कटौती केवल देश में ईंधन की उपलब्धता को संतुलित करने के लिए की जा रही है।

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