चुनावी होड़ में आय से अधिक खर्च करने की मची होड़, 21 क्षेत्रीय पार्टियों का व्यय उनकी कुल कमाई से काफी आगे निकला, कई बड़े चेहरे शामिल।
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी राजनीति में धनबल की भूमिका हमेशा से चर्चा का केंद्र रही है। हाल ही में जारी की गई
- देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की वित्तीय सेहत में बड़ा उतार-चढ़ाव, सालाना आमदनी में 52 प्रतिशत की रिकॉर्ड गिरावट
- तेलुगु देशम पार्टी कुल कमाई में तो ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस चंदा जुटाने में रही शीर्ष पर, चुनावी अभियानों ने बढ़ाया वित्तीय बोझ
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी राजनीति में धनबल की भूमिका हमेशा से चर्चा का केंद्र रही है। हाल ही में जारी की गई एक बेहद व्यापक सांगठनिक रिपोर्ट में देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की वित्तीय स्थिति को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान देश के प्रमुख क्षेत्रीय दलों की कुल कमाई में पिछले साल के मुकाबले लगभग 52 प्रतिशत (सटीक रूप से 51.57 प्रतिशत) की भारी-भरकम गिरावट दर्ज की गई है। इस बड़ी आर्थिक कमी के बावजूद, राजनीतिक मोर्चे पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए पार्टियों के खर्चों में कोई कमी नहीं आई। नतीजतन, देश के अधिकांश क्षेत्रीय दलों को अपनी कमाई से कहीं अधिक राशि चुनावी अभियानों और प्रशासनिक कार्यों में खर्च करनी पड़ी है, जो राजनीतिक दलों के भीतर बढ़ते वित्तीय असंतुलन की स्थिति को पूरी तरह प्रदर्शित करता है।
इस विस्तृत वित्तीय विश्लेषण को तैयार करने के लिए कुल 36 मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के ऑडिट खातों और आय-व्यय के विवरणों की गहन समीक्षा की गई है। ये वे दल हैं जिन्होंने निर्धारित समय सीमा के भीतर या कुछ देरी से भारत निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट जमा कराई थी। आंकड़ों के अनुसार, इन 36 क्षेत्रीय दलों की संयुक्त रूप से कुल घोषित आमदनी वित्तीय वर्ष 2024-25 में घटकर मात्र 1,192.94 करोड़ रुपये रह गई, जबकि इसके पिछले वित्तीय वर्ष 2023-24 में यही आंकड़ा 2,463.17 करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर था। एक ही साल के भीतर राजनीतिक फंड में आई यह 1,270.23 करोड़ रुपये की विशाल कमी यह दर्शाती है कि हालिया नीतिगत और कानूनी बदलावों के बाद राजनीतिक वित्तपोषण के पारंपरिक रास्तों में बड़ा बदलाव आया है।
आमदनी में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के विपरीत, जब इन राजनीतिक दलों के खर्चों के खातों को देखा गया, तो एक बिल्कुल अलग और चिंताजनक तस्वीर सामने आई। इन सभी 36 क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर आलोच्य अवधि के दौरान कुल 1,433.07 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च दर्ज किया है। यह कुल खर्च उनकी वास्तविक और घोषित आय से लगभग 240.12 करोड़ रुपये (यानी 20.13 प्रतिशत) अधिक है। इस पूरे घाटे वाले बजटीय प्रबंधन में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कुल 36 दलों में से 21 राजनीतिक पार्टियों ने वित्तीय अनुशासन की सीमाओं को पार करते हुए अपनी कुल वार्षिक कमाई से कहीं ज्यादा पैसा बाजार और चुनावी विज्ञापनों में बहाया है। आय और व्यय के इस कड़े मुकाबले में आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (TDP) 228.31 करोड़ रुपये की कुल घोषित आमदनी के साथ सभी क्षेत्रीय दलों की सूची में सबसे ऊपर रही, जो कुल क्षेत्रीय दलों की आय का लगभग 19.14 प्रतिशत है। इसके विपरीत, खर्च करने के मामले में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) सबसे आगे रही, जिसने साल भर में कुल 340.20 करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसकी कुल वार्षिक आय से करीब 142 प्रतिशत अधिक था।
राजनीतिक दलों की इस पूरी कमाई के स्रोतों का गहराई से अध्ययन करने पर यह साफ हो जाता है कि आज भी क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और उनकी गतिविधियों के संचालन के लिए चंदा यानी स्वैच्छिक योगदान ही सबसे बड़ा केंद्रीय स्तंभ बना हुआ है। समीक्षा में शामिल दलों ने अपनी कुल आय का लगभग 58.88 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 702.36 करोड़ रुपये) केवल स्वैच्छिक योगदान, अनुदानों और चंदे के माध्यम से प्राप्त किया है। स्वैच्छिक चंदा जुटाने के मामले में पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) पूरे देश में सबसे आगे रही, जिसने अकेले 184.08 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त करने की घोषणा की है। इसके बाद वाईएसआर कांग्रेस ने 140.05 करोड़ रुपये और तेलुगु देशम पार्टी ने 85.20 करोड़ रुपये चंदे के रूप में प्राप्त किए हैं।
व्यय के मुख्य मदों की बात की जाए तो क्षेत्रीय दलों के खजाने खाली होने की सबसे बड़ी वजह विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा और आम चुनावों के दौरान किया जाने वाला बेहिसाब प्रचार प्रसार रहा है। कुल 36 दलों में से 15 राजनीतिक दलों ने अपने कुल बजट का 55 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विशुद्ध रूप से चुनावी विज्ञापनों, रैलियों, हेलिकॉप्टर यात्राओं और जनसंपर्क अभियानों पर खर्च किया है। वाईएसआर कांग्रेस ने चुनाव प्रचार पर सर्वाधिक 299.92 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसके ठीक पीछे बीजू जनता दल (BJD) ने 270.66 करोड़ रुपये और भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने 147.99 करोड़ रुपये चुनावी समर में झोंके।
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