प्रेग्नेंसी के समय 'देवी' का दर्जा और बाद में... एक्ट्रेस कियारा ने समाज की दोहरी मानसिकता पर उठाया सवाल, महिलाओं को मिलने वाले तानों पर साझा किया दर्द।
भारतीय सिनेमा जगत की बेहद लोकप्रिय और शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार कियारा आडवाणी ने हाल ही में महिलाओं के
- प्रेग्नेंसी के समय 'देवी' का दर्जा और बच्चे के जन्म के बाद शारीरिक बनावट पर टिप्पणी, एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया और समाज के बदलते रवैये पर की खुलकर बात
- मदरहुड के बाद करियर में वापसी और लुक्स को लेकर बनाई जाने वाली धारणाओं पर फूटा गुस्सा, महिलाओं पर बनाए जाने वाले अवांछित दबाव को बताया अनुचित
भारतीय सिनेमा जगत की बेहद लोकप्रिय और शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार कियारा आडवाणी ने हाल ही में महिलाओं के जीवन से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू पर खुलकर अपने विचार साझा किए हैं। एक विशेष साक्षात्कार के दौरान उन्होंने मातृत्व यानी मदरहुड के उस सफर पर बात की, जिसके दौरान महिलाओं को अक्सर समाज और सोशल मीडिया के कड़े और असहज करने वाले मानदंडों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि कैसे एक महिला के मां बनने के खूबसूरत सफर को लोग केवल उसकी शारीरिक बनावट, वजन और लुक्स के चश्मे से देखना शुरू कर देते हैं, जिससे महिलाओं पर एक अदृश्य और मानसिक दबाव बनने लगता है।
एक्ट्रेस के अनुसार, हमारे समाज की सोच में एक अजीब तरह का विरोधाभास देखने को मिलता है जो महिलाओं के प्रति बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है। जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो पूरा समाज उसकी देखभाल में जुट जाता है, उसकी हर इच्छा का सम्मान किया जाता है और उसे एक बेहद पवित्र या 'देवी' जैसा दर्जा देकर उस पल का जश्न मनाया जाता है। हालांकि, यह पूरा उत्सव और सकारात्मक माहौल तब अचानक गायब हो जाता है जब बच्चा इस दुनिया में आ जाता है। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद, लोगों का ध्यान महिला के स्वास्थ्य और उसकी मानसिक स्थिति से हटकर पूरी तरह से इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि उसने कितना वजन बढ़ा लिया है और वह शारीरिक रूप से कैसी दिख रही है।
इस तरह के रवैये को उन्होंने सामाजिक ताने-बाने की एक बेहद कड़वी सच्चाई बताया, जहां महिलाओं की योग्यता और उनके अस्तित्व को केवल उनके बाहरी स्वरूप से मापा जाने लगता है। बच्चे को जन्म देने के बाद एक महिला का शरीर कई तरह के हार्मोनल, शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरता है, जिसे सामान्य होने में एक लंबा समय लगता है। इसके बावजूद, प्रसव के कुछ ही दिनों बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और पारिवारिक चर्चाओं में महिलाओं को उनके बढ़े हुए वजन के लिए 'मोटी' या 'अनफिट' जैसे शब्दों से संबोधित किया जाने लगता है, जो किसी भी नई मां के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक और संवेदनहीन व्यवहार है। एक बच्चे को जन्म देना और उसका पालन-पोषण करना अपने आप में एक बेहद थका देने वाली और जिम्मेदारी भरी प्रक्रिया है। इस दौरान महिलाओं को नींद की कमी, शारीरिक कमजोरी और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन समाज इन वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर केवल उनके शारीरिक ढांचे पर अपनी टिप्पणियां केंद्रित रखता है।
इसके साथ ही, कामकाजी महिलाओं और अभिनेत्रियों के संदर्भ में इस दबाव का एक और सिरा देखने को मिलता है, जिसका संबंध उनके करियर और काम पर लौटने की समय-सीमा से जुड़ा होता है। समाज एक तरफ तो महिला से यह उम्मीद करता है कि वह हर समय अपने बच्चे के पास मौजूद रहे, और दूसरी तरफ लगातार यह सवाल भी दागता रहता है कि वह अपने काम या पेशेवर जिंदगी में कब वापसी कर रही है। यदि कोई महिला अपने करियर को प्राथमिकता देते हुए जल्दी काम पर लौटती है, तो उसे एक लापरवाह मां के रूप में देखा जाता है, और यदि वह बच्चे के लिए लंबा ब्रेक लेती है, तो उसके करियर के खत्म होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है।
इस तरह की दोहरी और विरोधाभासी उम्मीदें महिलाओं के भीतर एक निरंतर चलने वाले अपराध बोध (Guilt) को जनम देती हैं, जहां उन्हें हर समय ऐसा महसूस कराया जाता है कि वे चाहे जो भी निर्णय लें, वे कहीं न कहीं कमतर ही साबित हो रही हैं। कियारा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हर महिला का मातृत्व का अनुभव पूरी तरह से व्यक्तिगत और अनूठा होता है, इसलिए किसी को भी यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उसे कब काम पर लौटना है या उसे अपने शरीर को किस तरह से प्रबंधित करना है। महिलाओं को यह पूरी आजादी मिलनी चाहिए कि वे बिना किसी बाहरी दबाव के अपने जीवन के इस सबसे खूबसूरत दौर का आनंद ले सकें।
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