Special Article: राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की धमक
ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने दोहरी सफलता प्राप्त की, जहाँ एक ओर पदक तालिका में भारत ने अपना स्थान
लेखक: मृत्युंजय दीक्षित
ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने दोहरी सफलता प्राप्त की, जहाँ एक ओर पदक तालिका में भारत ने अपना स्थान बनाए रखा वहीं दूसरी ओर अगले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की मेजबानी भी भारत को प्राप्त हुई । वर्ष 2030 में होने वाले आगामी राष्ट्रमंडल खेल भारत के शहर अहमदाबाद में संपन्न होंगे। अहमदाबाद में इन खेलों के आयोजन से भारत को अपनी खेल अवस्थापना तथा प्रबंधन कौशल विश्व के समक्ष रखने का अवसर मिलेगा। भारत पिछले 24 वर्षों से खेलों की इस प्रतियोगिता में चौथे स्थान पर बना हुआ है और वर्ष 2030 में इससे ऊपर चढ़ने का प्रयास करेगा, स्वाभाविक रूप से अपनी धरती पर खेलना भारत के खिलाड़ियों को नया जोश और उत्साह देगा।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में खेल और खिलाड़ी दोनों ही कम थे, फिर भी भारत के होनहार युवा खिलाड़ियों अद्भुत प्रदर्शन के बल पर 39 बार तिरंगा फहरा और भारत का राष्ट्रगान बजा। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भारत 13 स्वर्ण पदक, 17 रजत और 9 कांस्य पदक के साथ चौथे नंबर पर रहा। ग्लासगो खेलों में भारत की बेटियों का डंका बजा। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने केवल 125 सदस्यीय दल भेजा था। इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में केवल 10 खेलों को शामिल किया गया था जबकि पिछली बार इसमें कुल 19 खेल थे। क्रिकेट, बैडमिंटन, हॉकी, निशानेबाजी, स्क्वाश, टेबल टेनिस और कुश्ती जैसे खेल इस राष्ट्रमंडल खेल में शामिल नहीं थे। इन महत्वपूर्ण खेलों के न होने के कारण यह आशंका जताई जा रही थी कि भारत के लिए इस बार राष्ट्रमंडल खेल बहुत कठिन होंगे किंतु तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत चौथे स्थान पर कायम रहा। भारत के खिलाड़ियों ने यह बता दिया कि अब भारत किसी एक खेल के सहारे नहीं रहा वरन हर खेल में प्रगति कर रहा है।
खेलों में भारत का प्रदर्शन - ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में मुक्केबाजाी और एथलेटिक्स में भारत का डंका बजा, वहीं भारोत्तोलन में आठ, जूडो में चार तथा पैरा खेलों में भी सात पदक जीतने में सफलता प्राप्त हुई है। आर्टिटिक्स जिमनास्टिक, ट्रैक साइकिलिंग, लॉन बाल्स और तैराकी में भारत के खिलाड़ी फिर खाली हाथ रहे। 32 सदस्यीय एथलेटिक्स दल में सर्वेश कुवांरे (उंची कूद), गुलवीर सिंह (1000 मीटर ), श्रीशंकर मुरली (लंबी कूद), नीरज चोपड़ा (भालाफेंक), प्रवीण चित्रवेल (ट्रिपल जंप), ने चांदी जबकि गुलबीर सिंह (5000मीटर), सेल्वा प्रभु (ट्रिपल जंप) ने चांदी,यशवीर सिंह (भालाफेंक) तेजस्विन शंकर (डिकेथलान) और सीमा कालीरमण (चक्का फेंक) ने कांस्य पदक जीते। 14 मुक्केबाजों में से साक्षी चौधरी, प्रीति पंवार, जेसिमन लंबोरिया, प्रिया घंघस , अरुंधती चौधरी, सचिन सिवाच, अकुश पंघाल ने सोना जीतकर इतिहास रच दिया जबकि नरेंदर बरवाल, जादुमणि सिंह, लवलीना बोरगोहाई ने चांदी जीती और उन्नति शर्मा ने कांस्य पदक अपने नाम किया। 12 सदस्यों वाले भरोतत्तन दल में मीराबाई चानू और रिषिकांत सिंह ने स्वर्ण जबकि राजू मुतुपांडी, ज्ञानेश्वरी यादव, अजय बाबू ,हरजिंदर कौर, लवप्रीत सिंह ने रजत पदक और विद्यारानी देवी ने कांस्य पदक जीता।इनके अलावा पैरा एथलेटिक्स मे शर्मिला धनखड़ ने शॉटपुट एफ 57, दिलीप गावित ने 100 मीटर टी 47, सोमन राणा ने पुरुष शॉटपुट एफ 57 में स्वर्ण जबकि मोहम्मद बासिल 100 मीटर टी-47 में रजत पदक जीतने में सफल रहे। पैरापॉवर लिफ्टर झंडू कुमार और महिला शॉटपुट एफ -57 में शिल्पा शाएला ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा।
बेटियों का कमाल - ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों को भारत की बेटियो की अभूतपूर्व सफलता के लिये याद किया जाएगा। भारोत्तोलन में मीराबाई चानू की स्वर्णिम सफलता से बात बढ़ी और फिर इसमें शर्मिला, अस्मिता, प्रीति पंवार, साक्षी चौधरी ,प्रिया धंघास, अरुंधती चौधरी, जैस्मिन जैसे नाम जुड़ते चले गये। इन महिला खिलाड़ियों का पोडियम पर खड़ा होना अत्यंत गौरवशाली है।
भारत की महान बेटी मीराबाई चानू की जीत - मणिपुर की स्टार महिला भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने राष्ट्रमंडल खेलों में 48 किलोग्राम भार वर्ग में लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। मीराबाई की उपलब्धियां देश की नई खेल संस्कृति को अभिव्यक्त कर रही हैं। ग्रामीण, गरीब परिवेश से बाहर निकलकर मीराबाई ने अपनी प्रतिभा का कई बार अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रदर्शन किया है। मीरा भविष्य की उभरती हुई महिला खिलाडियों के लिए एक प्रेरक उदाहरण व मार्गदर्शक हैं। वह टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक भी जीत चुकी हैं।
जीवन की हर चुनौती को हराकर चैपियन बनी शर्मिला- हरियाणा के रेवाड़ी की शर्मिला की कहानी अत्यंत प्रेरक है। महज 2 साल की आयु में ही पोलियो ने उनका एक पैर प्रभावित कर दिया। गरीबी ने बचपन छीन लिया और शादी में घरेलू तानों का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 34 वर्ष की उम्र में पैरा एथलेटिक्स की शुरुआत करने वाली शर्मिला ने राष्ट्रमंडल खेलों की शॉटपुट एफ -57 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर न सिर्फ हरियाणा अपितु पूरे भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
नालंदा के झंडू ने गाड़ा झंडा - भारत के झंडू कुमार ने पुरुषों की हैवीवेट पैरा पॉवर शिफ्टिंग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। कभी परिवार पालने के लिए ई - रिक्शा चलाने वाले नालंदा के हैवीवेट पैरा पॉवर लिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लासगो में देश का परचम लहरा दिया। आर्थिक रूप से बहुत ही कमजोर परिवार के झंडू का यह पदक उनकी लगन और लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रतीक है। बेटे की सफलता पर मां कमला देवी और पिता रामानंद पासवान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। झंडू की उपलब्धियों के आधार पर वर्ष 2024 से उनके सभी खर्च भारत सरकार उठा रही है। बिहार सरकार ने भी उनकी सहायता की है। उन्हें बिहार सरकार की ओर से पुरस्कार खेलवृति भी मिलती रही है।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल इस बात का प्रमाण हैं कि खेलो इंडिया जैसी पहल वास्तव में देश के खेल परिदृश्य को बदल रही है। भारत नए खेलों को अपना रहा है। पुराने खेलों में और मजबूत हो रहा है। छोटे शहरों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे आगे बढ़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत के खिलाड़ियों में जीतने की ललक बढ़ी है, प्रतिस्पर्धा का सामर्थ्य बढ़ा है। स्वाभाविक रूप से अहमदाबाद में भारत नयी आशाओं- अपेक्षाओं के साथ मैदान में उतरेगा।
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