सरकारी फाइलों में विकास की चमक, पंडित उमाकांत की टपकती छत बयां कर रही ग्रामीण योजनाओं की असली तस्वीर, क्या अब जागेगा प्रशासन?

हरदोई के सैतियापुर में पंडित उमाकांत का परिवार टपकती छत के नीचे रातें काटने को मजबूर है। यह स्थिति सामाजिक धारणाओं और ग्रामीण विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

By INA News Desk
Oct 4, 2026 - 23:47
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सरकारी फाइलों में विकास की चमक, पंडित उमाकांत की टपकती छत बयां कर रही ग्रामीण योजनाओं की असली तस्वीर, क्या अब जागेगा प्रशासन?

हरदोई की ग्राम पंचायत सैतियापुर से सामने आई एक तस्वीर इस समय प्रशासनिक तंत्र और समाज में दशकों से बनी रूढ़िवादी धारणाओं पर कड़ा तंज कस रही है। यहां के निवासी पंडित उमाकांत का परिवार इन दिनों जिस बदहाली में दिन-रात गुजारने को मजबूर है, वह यह साफ दिखाती है कि गरीबी किसी जाति का पट्टा देखकर नहीं आती। लगातार हुई बारिश के बाद उमाकांत के मकान की हालत इतनी खस्ता हो चुकी है कि घर के भीतर छत से पानी लगातार टपक रहा है। आलम यह है कि परिवार के सामने सूखे स्थान पर सिर छिपाने तक का संकट खड़ा हो गया है।

सार्वजनिक विमर्श में अक्सर एक आम धारणा दोहराई जाती है कि तथाकथित उच्च वर्ग या सवर्ण तबके को सरकारी योजनाओं अथवा विशेष राहत की दरकार नहीं होती, क्योंकि वे स्वतः संपन्न होते हैं। सैतियापुर में पंडित उमाकांत की पारिवारिक स्थिति इस ढर्रे को पूरी तरह खारिज करती नजर आती है। यहां संपन्नता का सच यह है कि बारिश का पानी रोकने के लिए न तो घर की मरम्मत कराने के संसाधन हैं और न ही सिर पर एक सुरक्षित पक्की छत। परिवार बारिश के दौरान घर के अंदर गिरते पानी को बर्तनों और नालियों के सहारे बाहर निकालने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है।

फाइलों की प्रगति बनाम धरातल का अंधकार

हरदोई जिले को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों और विभिन्न शासकीय रैकिंग्स में अक्सर बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों की सूची में गिनाया जाता है। कागजों पर ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की फेहरिस्त लंबी दिखाई जाती है, स्वच्छता से लेकर ग्रामीण आवास तक के आंकड़े चमकते रहते हैं। जब जमीनी हकीकत का सामना सैतियापुर जैसी चौखटों पर होता है, तो सवाल उठता है कि ये तमाम आंकड़े किसके लिए तैयार किए जा रहे हैं।

यदि जनपद के आंकड़े इतने ही आदर्श हैं, तो पंडित उमाकांत जैसे जरूरतमंद परिवार तक बुनियादी ग्रामीण आवास योजनाएं क्यों नहीं पहुंच पाईं? जिस वक्त समीक्षा बैठकों में विकास की प्रगति पर मुहर लगाई जा रही होती है, उसी वक्त एक असहाय परिवार अपनी टपकती छत के नीचे रात कटने का इंतजार कर रहा होता है। यह विरोधाभास प्रशासनिक तंत्र की उस कार्यशैली को रेखांकित करता है, जहां कागजी लक्ष्यों को पूरा मान लिया जाता है मगर जरूरतमंदों का सर्वे कागजों से बाहर छूट जाता है।

क्या जाति देखकर तय होगी लाचारी?

इस पूरे मामले ने नीति-नियंताओं और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले मैदानी अमले की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े किए हैं। वर्षों से सरकारी मशीनरी में एक ऐसी जड़ परिपाटी हावी रही है, जिसमें यह मान लिया जाता है कि खास जातियों से आने वाले लोग किसी आर्थिक तंगी का शिकार नहीं हो सकते। इसी प्रशासनिक अंधी परिपाटी का खामियाजा उमाकांत जैसे भूमिहीन या सीमित आय वाले गरीब परिवारों को भुगतना पड़ता है।

गरीबी और लाचारी किसी पहचान की मोहताज नहीं होती। छत से टपकता पानी यह नहीं देखता कि नीचे बैठने वाले का उपनाम क्या है। वह केवल यह देखता है कि छत कच्ची है, कमजोर है और मरम्मत की बाट जोह रही है। जब जनकल्याणकारी योजनाओं का मूल उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को संबल देना है, तो फिर स्थानीय स्तर पर सत्यापन के दौरान ऐसे परिवार योजनाओं की परिधि से बाहर कैसे छूट जाते हैं?

स्थानीय स्तर पर सत्यापन और जवाबदेही की दरकार

ग्रामीण विकास योजनाओं के नियम स्पष्ट हैं कि जो भी व्यक्ति जर्जर, कच्चे या आवास विहीन स्थिति में रह रहा है, उसे पात्रता सूची में दर्ज कर आवास की सुविधा मिलनी चाहिए। ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम विकास अधिकारी, ग्राम प्रधान और सर्वेक्षण दल की यह जिम्मेदारी होती है कि वे प्रत्येक टोले-मुहल्ले का भौतिक सत्यापन निष्पक्ष भाव से करें।

सैतियापुर के इस मामले में सवाल उठता है कि जब आवास प्लस या अन्य ग्रामीण आवास सर्वेक्षण संचालित किए गए, तब क्या इस घर की स्थिति का आकलन किया गया था? यदि सर्वे हुआ, तो किन मानकों के आधार पर इस परिवार को छोड़ दिया गया? क्या सिर्फ इसलिए कि इनका नाम उस पारंपरिक श्रेणी में दर्ज है जिसे बिना देखे संपन्न मान लिया जाता है?

तिरपाल और बर्तनों के सहारे कट रही रातें

बारिश के दिनों में इस घर की दशा देखकर कोई भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि यह परिवार किसी भी दृष्टि से साधन-संपन्न है। कमरों में पानी भरने से घरेलू सामान खराब हो रहा है, अनाज को भीगने से बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए रात बिताना जोखिम भरा हो गया है, क्योंकि सीलन भरी दीवारों और लगातार टपकती छत से किसी भी समय प्लास्टर या ईंट गिरने का खतरा बना रहता है।

पड़ोसियों और स्थानीय ग्रामीणों का भी मानना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय से कमजोर रही है। मेहनत-मजदूरी या सीमित संसाधनों पर आश्रित यह परिवार अपने बूते पक्का निर्माण कराने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में यदि सरकार की कल्याणकारी योजनाएं यहां तक नहीं पहुंचतीं, तो फिर 'सबका साथ, सबका विकास' का संकल्प जमीनी धरातल पर अधूरा प्रतीत होता है।

प्रशासनिक हस्तक्षेप की उम्मीद

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर उजागर हुई इस हकीकत के बाद जिला प्रशासन सैतियापुर की इस चौखट का संज्ञान लेगा? क्या खंड विकास अधिकारी और संबंधित जांच अधिकारी मौके पर जाकर निष्पक्ष सत्यापन करेंगे? कागजों के चमचमाते रिकॉर्ड अपनी जगह हैं, लेकिन असल सुशासन वही है जो उस गरीब की छत की मरम्मत का जरिया बने, जिसका घर बारिश की पहली फुहार में ही सिस्टम की पोल खोलकर रख देता है।

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