हे विराट वृक्ष दो क्षमा...

दृष्टि हम उठा नहीं सके। शीश हम उठा नहीं सके। प्रश्न हम उठा नहीं सके।

By INA News Desk
Dec 18, 2024 - 13:53
81 Views
हे विराट वृक्ष दो क्षमा...

लेखक- धीरज मिश्र 'शाण्डिल्य'

हे विराट वृक्ष दो क्षमा

दृष्टि हम उठा नहीं सके।
शीश हम उठा नहीं सके।
प्रश्न हम उठा नहीं सके।
शस्त्र हम उठा नहीं सके।
हे विराट वृक्ष..! दो क्षमा,
हम तुम्हें बचा नहीं सके।।

तेज़ धूप, धूल, बारिशें,
आँधियाँ बड़ी बड़ी सहीं।
आसमान की मुसीबतें,
बिजलियाँ बड़ी बड़ी सहीं।।

रात दिन डटे रहे सदा,
छाँव ही लिए हुए मिले।
अनकही कहानियाँ कई,
बाँचते हुए सुए मिले।।

सैकड़ों बरस गुज़र गए,
पीर तुम सुना नहीं सके।
हे विराट वृक्ष..! दो क्षमा,
हम तुम्हें बचा नहीं सके।।

जीव-जन्तु रह रहे जहाँ,
वैरभाव भूल-भाल कर।
देहयष्टि में रखे रहे,
एक सृष्टि तुम सम्हालकर।।

घर बने हरेक डाल पर,
घोसले कई प्रकार के।
शुद्ध वायु बाँटते रहे,
तुम बिना किसी प्रचार के।।

मौन क्यों खड़े रहे सदा,
शोर क्यों मचा नहीं सके..?
हे विराट वृक्ष..! दो क्षमा,
हम तुम्हें बचा नहीं सके।।

पत्तियाँ सिहर उठीं सभी,
काँपता हुआ तना गिरा।
निर्दयी विकास हँस पड़ा,
किन्तु दृष्टि ली स्वयं फिरा।।

नीड़ अनगिनत उजड़ गए,
मुस्कराहटें गुज़र गयीं।
सुरमयी किलोल थम गया,
चहचहाहटें गुज़र गयीं।।

ज़िन्दगी पुकारती रही,
मौत से छुड़ा नहीं सके।
हे विराट वृक्ष..! दो क्षमा,
हम तुम्हें बचा नहीं सके।।

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