125 छात्राओं के कपड़े उतरवाए गए, वॉशरूम में खून के धब्बों की तस्वीरें प्रोजेक्टर पर दिखाई, पढ़ें पूरा मामला।

Maharashtra News: महाराष्ट्र के ठाणे जिले के शहापुर में स्थित रतनबाई दमानी स्कूल में 8 जुलाई 2025 को एक ऐसी घटना घटी, जिसने शिक्षा...

Jul 16, 2025 - 17:07
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125 छात्राओं के कपड़े उतरवाए गए, वॉशरूम में खून के धब्बों की तस्वीरें प्रोजेक्टर पर दिखाई, पढ़ें पूरा मामला।
125 छात्राओं के कपड़े उतरवाए गए, वॉशरूम में खून के धब्बों की तस्वीरें प्रोजेक्टर पर दिखाई। 

Maharashtra News: महाराष्ट्र के ठाणे जिले के शहापुर में स्थित रतनबाई दमानी स्कूल में 8 जुलाई 2025 को एक ऐसी घटना घटी, जिसने शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्कूलों की गरिमा को तार-तार कर दिया। स्कूल के शौचालय में खून के धब्बे मिलने के बाद कक्षा 6 से 10 तक की लगभग 125 छात्राओं को मासिक धर्म की जांच के लिए कपड़े उतारने को मजबूर किया गया। स्कूल की प्रिंसिपल मधुरी गायकवाड़ और एक महिला कर्मचारी ने छात्राओं के निजी अंगों की जांच की, जिसके बाद माता-पिता में आक्रोश फैल गया। इस घटना ने न केवल स्थानीय समुदाय को हिलाकर रख दिया, बल्कि पूरे देश में मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक दृष्टिकोण और स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं। पुलिस ने प्रिंसिपल और एक कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया है, और आठ लोगों के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

8 जुलाई 2025 को शहापुर के रतनबाई दमानी स्कूल में शौचालय की दीवार और फर्श पर खून के धब्बे मिलने के बाद स्कूल प्रशासन ने असंवेदनशील और अनैतिक कदम उठाया। स्कूल की प्रिंसिपल मधुरी गायकवाड़ ने कक्षा 5 से 10 तक की छात्राओं को स्कूल के सभागार में बुलाया। वहां, शौचालय में मिले खून के धब्बों की तस्वीरें प्रोजेक्टर पर दिखाई गईं, जो कथित तौर पर सफाई कर्मचारी ने ली थीं। छात्राओं से पूछा गया कि क्या वे मासिक धर्म से गुजर रही हैं। इसके बाद, उन्हें दो समूहों में बांटा गया—जिन्होंने मासिक धर्म होने की बात स्वीकारी और जिन्होंने नहीं।

जिन छात्राओं ने कहा कि वे मासिक धर्म से नहीं गुजर रही थीं, उन्हें एक-एक करके शौचालय में ले जाया गया, जहां एक महिला कर्मचारी ने उनके कपड़े उतारकर उनके निजी अंगों की जांच की। इस दौरान एक छात्रा के अंडरगारमेंट में सैनिटरी पैड मिला, जिसके बाद प्रिंसिपल ने उसे अन्य छात्राओं और कर्मचारियों के सामने डांटा और अपमानित किया। पुलिस के अनुसार, कम से कम 10 से 15 छात्राओं को इस अमानवीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यह पूरी घटना सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच हुई।

घटना के बाद, जब छात्राओं ने घर जाकर अपने माता-पिता को इस अपमानजनक अनुभव के बारे में बताया, तो माता-पिता में गुस्सा भड़क उठा। 9 जुलाई 2025 को सैकड़ों माता-पिता स्कूल परिसर में इकट्ठा हुए और स्कूल प्रशासन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रिंसिपल और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। एक माता-पिता ने कहा, "यह शिक्षा का मंदिर है, लेकिन यहां हमारी बेटियों को अपमानित किया गया। यह पूरी तरह अस्वीकार्य है।"

माता-पिता की शिकायत के आधार पर, शहापुर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। प्रिंसिपल मधुरी गायकवाड़ और एक महिला कर्मचारी को 9 जुलाई की रात को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने आठ लोगों—प्रिंसिपल, एक कर्मचारी, चार शिक्षकों, और दो ट्रस्टियों—के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 (महिला की शील भंग करने के इरादे से हमला), धारा 76 (कपड़े उतारने के लिए बल प्रयोग), और POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। बाकी चार आरोपियों की जांच चल रही है, और उनके खिलाफ सबूत जुटाए जा रहे हैं। शहापुर के पुलिस इंस्पेक्टर मुकेश ढागे ने कहा, "हम इस मामले की गहन जांच कर रहे हैं। सभी दोषियों को सजा मिलेगी।"

प्रिंसिपल मधुरी गायकवाड़ ने इन आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि कोई स्ट्रिप-सर्च नहीं हुआ। हालांकि, माता-पिता और छात्राओं के बयानों के आधार पर, स्कूल प्रशासन ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। स्कूल के एक प्रवक्ता ने कहा, "हम इस घटना की गंभीरता को समझते हैं। प्रिंसिपल को बर्खास्त कर दिया गया है, और मामले की आंतरिक जांच शुरू की गई है।" स्कूल, जो अर्चना एजुकेशनल ट्रस्ट द्वारा संचालित है और जिसमें 660 छात्र पढ़ते हैं, ने इस घटना पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

इस घटना ने पूरे देश में मासिक धर्म के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण और स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चकनकर ने स्कूल का दौरा किया और माता-पिता, शिक्षा विभाग, और पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की। उन्होंने कहा, "यह घटना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। स्कूल की मान्यता रद्द होने पर भी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए।"

कांग्रेस नेता नाना पाटोले ने इसे महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में शर्मनाक बताया, जबकि एनसीपी (एसपी) विधायक जितेंद्र अव्हाड ने इस बात पर हैरानी जताई कि इस घटना में शामिल प्रिंसिपल खुद एक महिला थीं। कांग्रेस विधायक ज्योति गायकवाड़ ने स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और पानी की सुविधा अनिवार्य करने की मांग की। सोशल मीडिया पर भी इस घटना की तीखी आलोचना हुई। एक एक्स यूजर ने लिखा, "यह घटना सामाजिक जागरूकता की कमी और कुंठित मानसिकता को दर्शाती है।"

यह घटना मासिक धर्म को लेकर भारत में मौजूद सामाजिक वर्जनाओं और गलत धारणाओं को उजागर करती है। मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन कई जगहों पर इसे शर्मिंदगी का विषय माना जाता है। इस मामले में, स्कूल प्रशासन ने न केवल छात्राओं को अपमानित किया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से आहत भी किया। माता-पिता ने बताया कि उनकी बेटियां इस घटना के बाद स्कूल जाने से डर रही हैं।

पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। 2017 में उत्तर प्रदेश के एक स्कूल में 70 छात्राओं को मासिक धर्म की जांच के लिए कपड़े उतारने को कहा गया था। 2020 में गुजरात के एक कॉलेज हॉस्टल में 68 छात्राओं की स्ट्रिप-सर्च की गई थी, ताकि उनकी मासिक धर्म स्थिति का पता लगाया जा सके। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि मासिक धर्म के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी अभी भी एक बड़ी समस्या है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता और जागरूकता पर शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर, पर्याप्त पानी, और स्वच्छ शौचालयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस मामले में, माता-पिता ने आरोप लगाया कि स्कूल में पानी की कमी के कारण एक छात्रा ने खून से सने हाथ को दीवार पर पोंछा, जिसके बाद यह पूरी घटना शुरू हुई।

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