रणवीर सेना संस्थापक की पोती ने UPSC में हासिल की 301वीं रैंक, परिवार में जश्न का माहौल।
बिहार के भोजपुर जिले के आरा शहर में रहने वाली आकांक्षा सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 301वीं रैंक हासिल करके
- आकांक्षा सिंह की सफलता: विवादित इतिहास से निकलकर सिविल सेवा की ऊंचाइयों तक पहुंची बिहार की बेटी
- ब्रह्मेश्वर मुखिया का सपना साकार, पोती ने दूसरे प्रयास में रचा इतिहास
बिहार के भोजपुर जिले के आरा शहर में रहने वाली आकांक्षा सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में 301वीं रैंक हासिल करके पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है, और यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि वह रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती हैं, जिनका जीवन जातिगत संघर्षों और कानूनी लड़ाइयों से भरा रहा। आकांक्षा पवना थाना क्षेत्र के खोपिरा गांव की मूल निवासी हैं, और उनके पिता इंदुभूषण सिंह तथा मां रिंकू सिंह हैं, जो इस सफलता से बेहद खुश हैं। आकांक्षा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आरा के एक स्कूल से प्राप्त की, जहां उन्होंने मैट्रिक परीक्षा में 80 प्रतिशत अंक हासिल किए, और गणित में पूरे 100 अंक प्राप्त करके अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इंटरमीडिएट स्तर पर भी उन्होंने 81 प्रतिशत अंकों के साथ उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, और उसके बाद स्थानीय विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में स्नातक पूरा किया। 2022 से उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की, और प्रतिदिन 8 से 10 घंटे की कठिन मेहनत के साथ अध्ययन किया। उनका पहला प्रयास प्रारंभिक परीक्षा में असफल रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे प्रयास में सफलता प्राप्त की। आकांक्षा ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, गुरुजनों और परिवार को दिया है, और कहा कि उनके दादा ब्रह्मेश्वर मुखिया का सपना था कि परिवार से कोई सदस्य सिविल सेवा में आए। वह विराट कोहली को अपना आदर्श मानती हैं, क्योंकि वह अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हैं। इस सफलता से परिवार में उत्सव का वातावरण है, और मां रिंकू सिंह ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने बेटी की पढ़ाई के लिए हर संभव प्रयास किया। आकांक्षा का लक्ष्य भारतीय विदेश सेवा में जाना है, हालांकि 301वीं रैंक के आधार पर उन्हें भारतीय राजस्व सेवा मिलने की संभावना है। इस उपलब्धि ने न केवल परिवार बल्कि पूरे गांव और जिले में गर्व की भावना पैदा की है, क्योंकि यह एक ऐसे परिवार से आती है जो लंबे समय से विवादों में रहा है।
ब्रह्मेश्वर मुखिया, जिन्हें लोग बरमेश्वर नाथ सिंह या मुखिया जी के नाम से भी जानते थे, 1990 के दशक में बिहार की जातिगत हिंसा के केंद्र में थे, और उन्होंने 1994 में रणवीर सेना का गठन किया जो मुख्य रूप से नक्सली संगठनों के खिलाफ सवर्ण जातियों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी। इस निजी सेना ने कई मुठभेड़ों में हिस्सा लिया, और बिहार के ग्रामीण इलाकों में खूनी संघर्षों का हिस्सा बनी, जिसमें खोपिरा गांव जैसे क्षेत्र कई बार हिंसा की चपेट में आए। ब्रह्मेश्वर पर 277 हत्याओं के आरोप लगे, और सरकार ने उनके सिर पर 5 लाख रुपये का इनाम रखा था। उन्होंने 9 साल जेल में बिताए, और 22 मामलों में से 16 में बरी हो गए जबकि 6 में जमानत मिली। 2011 में जेल से रिहा होने के बाद, 2012 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसका आरोप नक्सली संगठनों पर लगा। ब्रह्मेश्वर खुद पढ़ाई में काफी तेज थे, और मैट्रिक परीक्षा में गणित में पूरे 100 अंक प्राप्त किए थे, जो उनकी पोती आकांक्षा ने भी दोहराया। उन्होंने अपने परिवार को शिक्षित बनाने के लिए गांव से शहर की ओर रुख किया, और विभिन्न किराए के मकानों में रहते हुए पोते-पोतियों की पढ़ाई पर ध्यान दिया। उनके जीवन का एक हिस्सा भूमिगत रहा, और परिवार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें आकांक्षा के पिता इंदुभूषण की पहली शादी से जुड़ी हिंसा भी शामिल है। रणवीर सेना को बिहार की जातीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जो भाकपा माले जैसे संगठनों के खिलाफ खड़ी थी, और इस संघर्ष में कई निर्दोष लोगों की जान गई। ब्रह्मेश्वर के जीवन ने बिहार की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया, और उनकी मौत के बाद भी उनकी विरासत चर्चा में बनी रही। आकांक्षा की सफलता इस पृष्ठभूमि में एक नई दिशा दिखाती है, जहां परिवार हिंसा के चक्र से निकलकर शिक्षा और सेवा की ओर बढ़ रहा है।
आकांक्षा की शैक्षणिक यात्रा
आकांक्षा ने मैट्रिक में 80% अंक, इंटर में 81% और स्नातक में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। दूसरे प्रयास में UPSC क्लियर किया, प्रतिदिन 8-10 घंटे पढ़ाई की। विराट कोहली को आदर्श मानती हैं। आकांक्षा की सफलता की खबर जैसे ही फैली, पूरे बिहार में चर्चा शुरू हो गई, और सोशल मीडिया पर इसे साझा किया जाने लगा, लेकिन जल्द ही एक विवाद भी उभर आया जब वाराणसी की एक अन्य आकांक्षा सिंह ने दावा किया कि 301वीं रैंक उनकी है। वाराणसी की आकांक्षा ने अपना एडमिट कार्ड, इंटरव्यू लेटर और अन्य दस्तावेज सार्वजनिक किए, जिनमें रोल नंबर मैच कर रहा है, जबकि बिहार की आकांक्षा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक सबूत नहीं पेश किया गया। इस दावे ने पूरे मामले को जटिल बना दिया, और लोग अब असली सफल उम्मीदवार की पहचान पर सवाल उठा रहे हैं। बिहार की आकांक्षा के परिवार में जश्न मनाया जा रहा था, लेकिन इस विवाद ने उस खुशी पर पानी फेर दिया। संघ लोक सेवा आयोग ने अभी तक इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नाम और रैंक के समान होने से भ्रम पैदा हो सकता है, और आधिकारिक रोल नंबर से ही सत्यापन संभव है। इस घटना ने सिविल सेवा परीक्षा की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी है, जहां उम्मीदवारों के नाम समान होने पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। बिहार की आकांक्षा ने मीडिया से बातचीत में अपनी सफलता पर जोर दिया, लेकिन दस्तावेजों की कमी ने संदेह बढ़ाया। वाराणसी की आकांक्षा का कहना है कि वह असली उम्मीदवार हैं, और उनका रोल नंबर रिजल्ट में दर्ज है। इस विवाद से प्रभावित होकर कई लोग सोशल मीडिया पर अपनी राय दे रहे हैं, और मामला अभी अनसुलझा है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह एक बड़ा फर्जीवाड़ा होगा, लेकिन यदि नहीं, तो नाम की समानता से उत्पन्न भ्रम होगा।
रणवीर सेना का गठन बिहार में 1990 के दशक की शुरुआत में हुआ, जब नक्सली आंदोलन ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत की, और सवर्ण भूमि मालिकों पर हमले बढ़े। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने इसे एक प्रतिरोधी सेना के रूप में स्थापित किया, जो मुख्य रूप से भूमिहार और अन्य सवर्ण जातियों से जुड़ी थी, और इसका उद्देश्य नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना था। सेना ने कई हमलों में हिस्सा लिया, जिसमें 1997 में 58 लोगों की हत्या जैसी घटनाएं शामिल हैं, जो बिहार की इतिहास की सबसे खूनी घटनाओं में से एक हैं। इस सेना और भाकपा माले जैसे संगठनों के बीच संघर्ष ने हजारों लोगों की जान ली, और खोपिरा गांव जैसे इलाके कई बार खून से सने। सेना को 2005 में प्रतिबंधित किया गया, लेकिन इसका प्रभाव बिहार की राजनीति पर आज भी दिखता है। ब्रह्मेश्वर की मौत के बाद सेना की गतिविधियां कम हुईं, लेकिन उनकी स्मृति में कई कार्यक्रम आयोजित होते हैं। आकांक्षा की सफलता इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाती है कि परिवार अब हिंसा के बजाय शिक्षा पर फोकस कर रहा है। ब्रह्मेश्वर ने खुद गरीबों और किसानों के लिए कार्य किए, और आकांक्षा ने कहा कि वह महिलाओं के लिए काम करना चाहती हैं। इस सफलता ने बिहार की बेटियों को प्रेरित किया है, और दिखाया है कि कठिन परिस्थितियों से भी ऊपर उठा जा सकता है।
- विवाद की वजह
वाराणसी की आकांक्षा ने एडमिट कार्ड और इंटरव्यू लेटर दिखाए, रोल नंबर मैच कर रहा है। बिहार की आकांक्षा की ओर से कोई दस्तावेज नहीं। UPSC से स्पष्टीकरण की मांग। इस पूरी घटना ने बिहार की सामाजिक गतिशीलता पर प्रकाश डाला है, जहां जातिगत संघर्षों से निकलकर नई पीढ़ी शिक्षा और प्रशासन की ओर बढ़ रही है, लेकिन नाम की समानता से उत्पन्न विवाद ने इसे जटिल बना दिया। यदि बिहार की आकांक्षा का दावा सही साबित होता है, तो यह एक प्रेरणादायक कहानी होगी, लेकिन यदि नहीं, तो यह फर्जी दावों की समस्या को सामने लाएगा। परिवार ने इस सफलता को ब्रह्मेश्वर के सपने की पूर्ति बताया, और गांव में जश्न मनाया गया। आकांक्षा ने महिलाओं और गरीबों के लिए काम करने की इच्छा जताई, जो उनके दादा की विरासत से जुड़ी है। इस मामले पर संघ लोक सेवा आयोग की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि रोल नंबर से सत्यापन आवश्यक है। इस विवाद ने सोशल मीडिया को गर्म कर दिया, जहां लोग दोनों पक्षों पर अपनी राय दे रहे हैं। कुल मिलाकर, यह घटना बिहार की बदलती तस्वीर को दर्शाती है। आकांक्षा की सफलता की खबर ने पूरे देश में ध्यान आकर्षित किया है, और यह बिहार की बेटियों के लिए एक मिसाल बनी है, लेकिन विवाद ने इसे एक नया मोड़ दे दिया। यदि यह दावा गलत साबित होता है, तो परिवार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यदि सही, तो यह नाम की समानता का संयोग होगा। ब्रह्मेश्वर की विरासत अब शिक्षा से जुड़ रही है।
Also Read- Bihar: समस्तीपुर के अभिषेक सिंह चौहान ने UPSC में हासिल की 102वीं रैंक, जिले का बढ़ाया मान।
What's Your Reaction?











