होर्मुज स्ट्रेट का संकट: 33 किमी का यह रास्ता दुनिया के 20% तेल का मार्ग, ईरान युद्ध से बंदी का खतरा बढ़ा।
होर्मुज स्ट्रेट, जो फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है, दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से रोजाना करीब 20 मिलियन
- वैश्विक ऊर्जा संकट: तेल कीमतें 100 डॉलर पार, भारत के 50% आयात पर सीधा असर
- भारत की अर्थव्यवस्था पर बोझ: होर्मुज बंदी से इंफ्लेशन बढ़ेगा, रूस से आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश
होर्मुज स्ट्रेट, जो फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है, दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत है। इस स्ट्रेट की चौड़ाई सबसे संकरी जगह पर मात्र 33 किलोमीटर है, जहां दो यातायात लेन हैं, प्रत्येक दो किलोमीटर चौड़ी, और ये लेन ईरान तथा ओमान के बीच बंटी हुई हैं। 2026 में ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद इस रास्ते पर गंभीर संकट मंडरा रहा है, क्योंकि ईरान ने जहाजों पर हमलों की चेतावनी दी है, जिससे प्रमुख शिपिंग कंपनियां इस मार्ग से परहेज कर रही हैं। परिणामस्वरूप, वैश्विक तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, और यह संकट एशियाई देशों, खासकर भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। भारत, जो अपनी 88 प्रतिशत से अधिक तेल आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है, इस स्ट्रेट से अपने कुल क्रूड आयात का लगभग 50 प्रतिशत प्राप्त करता है, जो रोजाना 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल के बराबर है। मुख्य स्रोत इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत हैं, जहां से तेल टैंकर इसी मार्ग से गुजरते हैं। संकट की शुरुआत फरवरी 2026 में हुई, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए, और ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों और इजराइल पर मिसाइल दागे, जिससे क्षेत्रीय युद्ध छिड़ गया। अपडेट्स के अनुसार, मार्च 2026 तक स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में 90 प्रतिशत की गिरावट आई है, और कई टैंकरों पर हमले की खबरें हैं, जिसमें चालक दल के सदस्य घायल हुए हैं।
इस संकट का सबसे बड़ा असर एशियाई बाजारों पर पड़ा है, जहां स्ट्रेट से गुजरने वाला 84 प्रतिशत क्रूड तेल एशिया के लिए होता है, जिसमें चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया मुख्य आयातक हैं। भारत के लिए स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि न केवल क्रूड तेल, बल्कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की आपूर्ति भी इस मार्ग से होती है। भारत के कुल एलएनजी आयात का 60 प्रतिशत और एलपीजी का लगभग सारा हिस्सा स्ट्रेट से गुजरता है, मुख्यतः कतर से। अगर यह बंदी लंबे समय तक जारी रही, तो भारत में ईंधन कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है, जो पहले ही 7 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं। अपडेट्स से पता चलता है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर से अधिक हो गई हैं, और हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का आयात बिल 1.8 से 2 बिलियन डॉलर बढ़ सकता है। इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी, रुपये पर दबाव पड़ेगा, और व्यापार घाटा चौड़ा होगा। भारत की रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व्स मात्र 10 से 20 दिनों की हैं, जो चीन की छह महीने की रिजर्व्स की तुलना में बहुत कम हैं। मार्च 2026 तक, भारत ने रूस से आयात बढ़ाने की योजना बनाई है, जहां से 9.5 मिलियन बैरल क्रूड पहले से ही भारतीय जलक्षेत्र के पास खड़े जहाजों पर हैं, और इन्हें तुरंत डाइवर्ट किया जा सकता है। अमेरिका ने भारत को रूसी तेल आयात पर 30 दिनों की छूट दी है, ताकि संकट से निपटा जा सके।
भारत सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए विविधीकरण की रणनीति अपनाई है, जिसमें अमेरिका, रूस और पश्चिम अफ्रीका से अतिरिक्त क्रूड खरीदना शामिल है। फरवरी 2026 में भारत ने इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर से 2.8 मिलियन बैरल प्रति दिन आयात किया, जो कुल आयात का 53 प्रतिशत था, लेकिन अब इन स्रोतों से आपूर्ति प्रभावित है। रिफाइनरियां अतिरिक्त क्रूड स्टॉक रख रही हैं, और सरकारी स्टोरेज में 100 मिलियन बैरल उपलब्ध हैं, जो भूमिगत रिजर्व्स, टैंकों और जहाजों पर हैं। हालांकि, लंबे संकट में ये अपर्याप्त साबित हो सकते हैं। अपडेट्स के अनुसार, भारत ने 27 से बढ़ाकर 40 देशों से आयात शुरू किया है, लेकिन मध्य पूर्व पर निर्भरता अभी भी 55 प्रतिशत है। तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बाजारों को आश्वस्त किया है कि विविधीकरण जारी है, लेकिन संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। अगर बंदी एक सप्ताह से अधिक चली, तो उर्वरक आपूर्ति, निर्माण सामग्री और हीरा निर्यात जैसे क्षेत्र भी प्रभावित होंगे, क्योंकि 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से 70 बिलियन डॉलर का क्रूड और उत्पाद आयात किया था।
होर्मुज स्ट्रेट की भौगोलिक महत्वता
होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, और इसकी सबसे संकरी चौड़ाई 33 किमी है। यहां से सऊदी अरब, यूएई, इराक और कतर का तेल निकलता है। 2024 में 84% क्रूड एशिया के लिए था, और संकट में वैकल्पिक रास्ते जैसे केप ऑफ गुड होप से दूरी दोगुनी हो जाती है, जिससे लागत बढ़ती है। भारत के लिए, यह मार्ग 50% क्रूड, 60% एलएनजी और सारे एलपीजी का स्रोत है।
संकट ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को हिला दिया है, जहां एशियाई देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। जापान, जो 95 प्रतिशत क्रूड मध्य पूर्व से आयात करता है, ने आपातकालीन योजनाएं शुरू की हैं, जबकि दक्षिण कोरिया के पास 200 दिनों की रिजर्व्स हैं। भारत की स्थिति ज्यादा नाजुक है, क्योंकि स्टोरेज सीमित है और रूसी आयात पर अमेरिकी दबाव था, लेकिन अब छूट मिली है। अपडेट्स से पता चलता है कि भारत रूस से 40-45 प्रतिशत क्रूड खरीदने की ओर लौट रहा है, और पश्चिम अफ्रीका से आपूर्ति बढ़ा रहा है। हालांकि, अगर युद्ध लंबा चला, तो तेल कीमतें 100 डॉलर से ऊपर बनी रहेंगी, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी, परिवहन लागत चढ़ेगी, और अर्थव्यवस्था में मंदी आ सकती है। सरकारी रिफाइनरियां जैसे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम अतिरिक्त स्टॉक जमा कर रही हैं, और ईंधन कीमतों को स्थिर रखने के लिए सब्सिडी बढ़ाने की चर्चा है। भारत पर पड़ने वाला आर्थिक असर बहुआयामी है, जहां तेल कीमतों की वृद्धि से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, और निर्यात क्षेत्र जैसे बासमती चावल, हीरा और निर्माण सामग्री प्रभावित होंगे। पश्चिम एशिया से उर्वरक आयात भी बाधित है, जो कृषि को प्रभावित कर सकता है। अपडेट्स के अनुसार, संकट के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और रुपये की कीमत गिर सकती है। सरकार ने आवश्यक सेवाओं को छूट दी है, लेकिन आम उपभोक्ता पर बोझ बढ़ेगा। रूस से आपूर्ति बढ़ाने से कुछ राहत मिली है, लेकिन वैकल्पिक रास्तों से दूरी दोगुनी होने से लागत 20 प्रतिशत बढ़ गई है।
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